वसंत
जय प्रकाश कुवंरईश्वर ने वसंत बनाया है,
लगता कोई अदृश्य मूरत है।
मकसद है उन्हें इसे बनाने का,
क्योंकि इसका,
हरेक को बेहद जरूरत है।।
ईश्वर की हर रचना के पीछे,
कुछ गुप्त रहस्य रहता है।
संयोग जब तक बने नहीं,
अंजान आदमी ढूँढते रहता है।।
आदमी केवल अच्छा खोजता है,
पर अच्छा कम ही नजर आता है।
कभी कभी वसंत भी,
पतझड़ में उलझा रह जाता है।।
पतझड़ चिरस्थायी नहीं,
उसे अपने आप गुजर जाने दो,
फिर ईश्वर की श्रेष्ठ कीर्ति,
सुंदर वसंत का आलिंगन करो।।
वसंत रितुराज है,
यह पावन है, मनभावन है।
हर रितुओं की अपेक्षा यह,
सबके लिए अत्यंत सुहावन है।।
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