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पतझड़ में होती,रिश्तों की परख

पतझड़ में होती,रिश्तों की परख

कुमार महेंद्र
मानव जीवन अबूझ पहेली,
सतत धूप छांव परिवर्तन ।
दुःख कष्ट सुख वैभव क्षणिक ,
आशा निराशा शाश्वत नर्तन ।
परिवार समाज कटु सत्य,
स्वार्थ सीमित संबंध चरख ।
पतझड़ में होती,रिश्तों की परख ।।

आर्थिक सामाजिक अन्य समस्या,
प्रायः मनुज सहन अकेला ।
लुप्त स्नेह प्रेम भाईचारा,
जीवन वास्तविक ज्ञान नवेला ।
चक्षु आतुर अनुग्रह आशा,
पर परिणाम संकट जन्य तरख ।
पतझड़ में होती,रिश्तों की परख ।।

ज्ञात अज्ञात कारण वश,
मनुष्य बाधा समस्या शिकार ।
विचलित धैर्य बुद्धि विवेक,
हर पल नकारात्मक विचार ।
सर्वत्र आधारहीन आलोचना,
हाव भाव व्यवहार शत्रु सरख ।
पतझड़ में होती,रिश्तों की परख ।।

संबंध अंतर सहयोग अपेक्षित,
विपरित स्थिति हल प्रयास ।
समय काल सदैव बलवान,
आरोह अवरोह प्रकृति खास ।
हर व्यक्ति परम नैतिक कर्तव्य ,
नित सहभागी पीड़ा हरख ।
पतझड़ में होती,रिश्तों की परख ।।

कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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