मनुस्मृति और भारतीय संविधान
अध्याय 5 ( ख)
भारतीय संविधान की प्रस्तावना पर बार्कर क्या कहते हैं ?
डॉ राकेश कुमार आर्य
भारतीय संविधान की इस प्रस्तावना पर बार्कर को उद्धृत करते हुए यह दिखाने का प्रयास किया जाता है कि हमने इन शब्दों का प्रयोग बहुत ही निष्ठा के साथ किया है और यदि हम अपने भारतीय गणराज्य के नवजीवन का शुभारंभ पश्चिम की राजनीतिक परंपरा और उसके सिद्धांतों को अपना कर कर रहे हैं तो यह हमारे लिए गर्व की बात है। अपने उच्चतम वैदिक आदर्श को विस्मृत कर हमने पश्चिम के पीछे दौड़ना आरंभ कर दिया। एक झटके में हमने अपने वैदिक अतीत को विस्मृत कर दिया। हमारी ऐसी मानसिकता को देखकर पश्चिम के अनेक राजनीतिशास्त्रियों को आश्चर्यजनक प्रसन्नता की अनुभूति हुई। संभवत: उनको आशा थी कि भारत ने अपने जिन वैदिक आदर्शों की स्थापना के लिए स्वामी दयानंद जी महाराज जैसे महान क्रांतिकारी,दूरदर्शी, समाज सुधारक, वेदोद्धारक नेता के विचारों से प्रभावित होकर 1857 की क्रांति का शुभारंभ किया था, वह भारत अपने उसी आदर्श पर चलेगा, जो स्वामी दयानंद ने उसे दिखाया था।
तभी तो अपनी प्रसन्नता को प्रकट करते हुए भारतीय संविधान की प्रस्तावना पर बार्कर ने कहा था कि " जब मैं उसे पढ़ता हूं तो मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि मेरी इस पुस्तक में जो तर्क दिए गए हैं, उन्हें उद्देश्यिका संक्षिप्त और सारभूत रूप में प्रस्तुत करती है... । मैं उसे उद्धृत करना चाहता हूं क्योंकि मुझे गर्व है कि भारत के लोग अपना स्वतंत्र जीवन प्रारंभ करते समय उस राजनीतिक परंपरा के सिद्धांतों को मान्यता दे रहे हैं जिन्हें हम पश्चिम की परंपरा कहते हैं, किंतु जो पश्चिम तक ही सीमित नहीं है।"
बार्कर की प्रसन्नता का का
यह विदेशी लेखक भारत के संविधान की इस प्रस्तावना से इतना प्रसन्न क्यों हुआ ? इसका कारण यह है कि उसे इस बात की प्रसन्नता हुई कि भारत के क्रांतिकारी स्वाधीनता आंदोलन के जिन नेताओं ने और विशेष रूप से स्वामी दयानंद जी जैसे महापुरुष ने भारत को " वेदों की ओर लौटने " का संकेत और संदेश दिया था, उनका वह सपना पूर्ण न हो करके भारत पश्चिम की ओर देख रहा है। जिसे अपने गौरवपूर्ण अतीत पर इतराना चाहिए था ,वह पश्चिम की नकल करने में अपने आपको गौरवान्वित अनुभव कर रहा है। पश्चिम को अपना वैचारिक मार्गदर्शक ,पथ प्रदर्शक अथवा नेता मानने को तैयार है। बार्कर इस बात पर बल्लियों उछल गया था कि आज का भारतवर्ष स्वाधीनता आंदोलन के दौरान लिए गए अपने संकल्प को भूलकर अपने स्वतंत्र जीवन का शुभारंभ पश्चिम के विचारों को अपने लिए आदर्श मानकर कर रहा है।
इसका अर्थ है कि भारत अपने गौरवपूर्ण अतीत को अपने लिए अनुकरणीय नहीं मान रहा है। वह पश्चिम के विचारों पर जीना चाहता है और उन्हीं को अपना आदर्श मान रहा है। जिसका लाभ भविष्य में पश्चिमी विचारों को भारत पर थोपने के लिए मिलना निश्चित है अर्थात भविष्य का स्वतंत्र भारत भी पश्चिम के साथ मिलकर रहेगा और इस शर्त पर मिलकर रहेगा कि वह अपना स्वर्णिम अतीत भूलने को तैयार है। इस प्रकार बार्कर भविष्य के भारत में ईसाई मत के प्रचार प्रसार के लिए बहुत संभावनाएं देख रहा था। स्वतंत्र भारत के रूप में उसे एक विशाल और उपजाऊ खेत के दर्शन हो रहे थे। जिसमें वह मनचाही फसल उगा पाएगा। भारत को लेकर वह इसीलिए प्रसन्न था कि पश्चिम के साथ वह मिलकर काम करने में गर्व की अनुभूति करता है। इससे पश्चिमी जगत को भारत पर बौद्धिक नेतृत्व स्थापित करने में सहायता मिलेगी और आने वाले भारत की युवा पीढ़ी जैसे-जैसे अपने अतीत को भूलती जाएगी, वैसे-वैसे ही वह पश्चिम की ओर झुकती चली जाएगी। जिसका लाभ ईसाई मत के प्रचार-प्रसार में मिलेगा....और यही हुआ भी।
किसके विरुद्ध था भारत का राष्ट्रीय आंदोलन?
प्रत्येक परिवार, प्रत्येक समाज व प्रत्येक राष्ट्र के अपने कुछ जीवन मूल्य होते हैं। सबकी अपनी एक विशिष्ट पहचान होती है। अपनी निजता और अस्मिता होती है। जिनके लिए वह जीना मरना चाहता है। भारत अपने जीवन मूल्यों के लिए , अपनी पहचान, अपनी निजता और अस्मिता के लिए स्वाधीनता का दीर्घकालिक आंदोलन लड़ता रहा था। इसका अभिप्राय था कि वह उस पश्चिमी जगत से और अरबी जगत से मुक्ति चाहता था, जिनके विचार, जीवन मूल्य, सोच और चिंतन उसके अनुकूल नहीं थे। उसकी लड़ाई उन लोगों के या उस व्यवस्था के विरुद्ध थी जो उसे सामाजिक रूप से ही नहीं, आध्यात्मिक रूप से भी मार देना चाहती थी।
भारत ने अपने स्वाधीनता आंदोलन का लक्ष्य ' मुक्ति ' रखा था। मुक्ति का अभिप्राय था उन सारे जंजालों से भारत की आत्मा को मुक्त करना जो उसके विकास में बाधक सिद्ध हो रहे थे। इसका अभिप्राय था भारत रूपी जंगल में उग आए उस सारे खरपतवार को, झाड़ झंखाड़ों को उखाड़ फेंकना जो भारत की आध्यात्मिक परंपरा की उपजाऊ भूमि को विचारधाराओं के टकराव से बीहड़ जंगल में परिवर्तित कर रहे थे। परंतु जब स्वाधीनता प्राप्त हुई तो हम उन्हीं कथित जीवन मूल्यों की ओर स्वयं ही चले गए, जिनके विरुद्ध हम लड़ते आ रहे थे। इसे हम भारतीयता की जीत नहीं, पराजय मानते हैं।
नेहरू इंदिरा का समाजवाद की ओर झुकाव
हमारे देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी का देहांत संदिग्ध परिस्थितियों में हुआ। उनके देहांत को लेकर कई लोगों ने कांग्रेस की तत्कालीन नेता इंदिरा गांधी की ओर भी संदेह की उंगली उठाई है। यहां पर हम किसी प्रधानमंत्री को मरवाने में किसी नेता या अगले प्रधानमंत्री पर कोई शंका नहीं कर रहे हैं। परंतु इतना अवश्य कहना चाहते हैं कि इंदिरा गांधी के पिता पंडित जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी स्वयं रूस के समाजवाद से प्रभावित थे। जब इंदिरा गांधी ने 1975 की 25 जून को देश में आपातकाल घोषित किया तो उस समय उन्होंने देश का संविधान बदलने का राष्ट्रघाती प्रयास किया।
प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करते हुए संविधान की उद्देशिका का 1976 में संशोधन किया । इस संवैधानिक संशोधन के माध्यम से श्रीमती इंदिरा गांधी ने भारतीय संविधान के पहले पैरा में दो शब्द " समाजवादी और पंथनिरपेक्ष " अंतःस्थापित किये, जबकि छठे पैरा में " और अखंडता " शब्द जोड़े गए।
हम सभी जानते हैं कि रूस का समाजवाद आज असफल सिद्ध हो चुका है। मार्क्सवाद और लेनिनवाद चाहे कहीं दिखाई दे रहे हैं, परंतु उनके प्रति लोगों का आकर्षण समाप्त हो चुका है। क्योंकि लोगों को अब भली प्रकार यह ज्ञात हो गया है कि मार्क्सवाद और लेनिनवाद ने किस प्रकार लाखों करोड़ों लोगों का जीवन छीन लिया था। यदि जीवन छीनने वाली किसी विचारधारा का नाम ही समाजवाद है तो यह भारत की आत्मा को कदापि स्वीकार नहीं हो सकता। क्योंकि भारत का राजनीतिक सामाजिक आदर्श तो केवल मानवतावाद है । जिसे वह धर्म कहकर संबोधित करता है। इसी प्रकार का समाजवाद अर्थात मानवतावाद भारत की आत्मा का प्रतिनिधि बनकर संसार को मोहित करता आया है। वेद के इसी चिंतन को लेकर हम आगे बढ़ते रहे हैं। इसी को लेकर महर्षि मनु ने मनुस्मृति की रचना की । जिसमें उन्होंने संसार को सुंदर और सुव्यवस्थित व्यवस्था देने का सराहनीय प्रयास किया।
पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा में समाजवाद का समर्थन करते हुए कहा था " मैं समाजवाद का पक्षधर हूं और आशा करता हूं कि भारत समाजवाद का पक्ष लेगा और भारत एक समाजवादी राज्य के गठन के लिए कदम उठाएगा।"
( द कॉन्स्टिट्यूशन एंड कांस्टीट्यूएंट असेंबली, लोक सभा सचिवालय , 1990 पृष्ठ 19 )
पंजाब राज्य बनाम दीवान मॉडर्न ब्रूअरीज लिमिटेड 2004 11 एसीसी, 26 पैरा 307 न्यायमूर्ति एस.बी. सिन्हा में उच्चतम न्यायालय ने निर्णय देते हुए कहा कि " समाजवाद हमारे इतिहास में एक आकर्षक शब्द रहा होगा। यह हमारे संविधान की उद्देशिका में भी विद्यमान है । किंतु नब्बे के दशक से केंद्रीय सरकार ने जो उदार नीति अपनाई है,उससे यह बात तो समाप्त हो चली है कि भारतीय समाज समाजवाद से जुड़ा है।"
राष्ट्रवाद और वेद का आदर्श
राष्ट्र किसी की नकल से अथवा अंधानुकरण करने से महान नहीं बनता। राष्ट्र को महान बनाने के लिए सबसे पहले सात्विक राष्ट्रवाद की भावना का होना आवश्यक होता है। सात्विक राष्ट्रवाद में मौलिकता होती है। जिसका संबंध राष्ट्र की आत्मा से होता है। राष्ट्रवाद की भावना का अभिप्राय है कि हम सबको मिलकर सामूहिक प्रयास करना है। संगठन की एकता स्थापित करनी है और अपना सामूहिक लक्ष्य बनाकर एक दिशा में आगे बढ़ना है। इस प्रकार राष्ट्र का अभिप्राय जोड़ना है, तोड़ना नहीं।
राष्ट्र निर्माण के लिए संकल्पित होकर अपने संविधान की प्रस्तावना में हमें अथर्ववेद के इस मंत्र पर विचार करना अपेक्षित था :-
सत्यं बृहदृतमुग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञः पृथिवीं धारयन्ति ।
सा नो भूतस्य भव्यस्य पत्न्युरुं लोकं पृथिवी नः कृणोतु ॥ अथर्व12.1.1॥
भावार्थ:- (सत्यं बृहत्) सत्य पालन करने का ऊंचा आदर्श (ऋतम्) सृष्टि संचालन के नियमों का दृढ़ता से पालन (उग्रं तप:) कठोर तप –परिश्रम- से उद्यमी जीवन शैली से (दीक्षा) बाल्यकाल की शिक्षा से शुभ कार्यों के प्रति प्रवृत्ति (ब्रह्म) वेदाध्ययन (यज्ञ:) अग्निष्टोमादि यज्ञ और त्याग भावना अर्थात पर्यावरण की सुरक्षा (पृथिवीम् धारयन्ति)ये सब तत्व पृथिवी को धारण करते हैं, अर्थात इनको शासन की नीतियों का अंग बनाकर चलने से राष्ट्र महान बनता है अर्थात् भूमि पर प्राकृतिक आपदाओं को दूर करने में सहायता मिलती है । (भूतस्य भव्यस्य पत्नी) हमारे भूत और भविष्य का निर्माण करने वाले व्यवहार से समस्त जनों को पालन करने वाली (सा पृथिवी) वह पृथ्वी (न:उरुं लोकं कृणोतु) हम सब जनों के निवासादि के लिए विस्तृत स्थान प्रदान करे।"
तब क्या हो सकती है भारतीय संविधान की प्रस्तावना ?
इस वेद मंत्र के आलोक में भारत के संविधान की प्रस्तावना कुछ इस प्रकार बनाई जा सकती थी :-
" हम सत्य सनातन वैदिक धर्मी भारत के लोग भारत को दिव्य और भव्य बनाकर संपूर्ण वसुधा को अपना परिवार मानकर उसके कल्याण के लिए
सत्य पालन करने का ऊंचा आदर्श अपनाकर
सृष्टि संचालन के नियमों का दृढ़ता से पालन करते हुए कठोर तप –परिश्रम- से उद्यमी जीवन शैली से
बाल्यकाल की शिक्षा से शुभ कार्यों के प्रति प्रवृत्ति वेदाध्ययन अग्निष्टोमादि यज्ञ और त्याग भावना अर्थात पर्यावरण की सुरक्षा को अपनाकर और संपूर्ण संसार में परमपिता परमेश्वर के साम्राज्य का विस्तार करने का संकल्प लेकर संपूर्ण भूमंडल को श्रेष्ठ नागरिकों का निवास स्थल बनाने का ऊंचा आदर्श लेकर
अपने राष्ट्र को महान बनाने के प्रति संकल्पित इन सभी तत्वों को अपने शासन की नीतियों का अंग बनकर चलने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ होते हैं। परमपिता परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं कि वह हमारी भूमि पर प्राकृतिक आपदाओं को दूर करे।
हमारे भूत और भविष्य का निर्माण करने वाले व्यवहार से समस्त जनों को पालन करने वाली वह पृथ्वी हम सब जनों के निवासादि के लिए विस्तृत स्थान प्रदान करे।"
भारतीय जनमानस का चिंतन आज भी अपने इस मौलिक विचार के आसपास ही घूमता है कि :-
अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम् ।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥”
(महोपनिषद् 4.71)
अर्थात “यह मेरा है, यह पराया है,” ऐसी संकुचित सोच छोटे मन वाले लोग रखते हैं, जबकि उदार हृदय वाले लोगों के लिए पूरी धरती ही एक परिवार है।"
विश्व बंधुत्व की भावना: भारत काआदर्श
जिस विश्व बंधुत्व की बात गांधी जी करते थे या और कुछ पश्चिमी विचारक करते रहे हैं, उसे केवल भारत की इस परंपरागत सोच से ही स्थापित किया जा सकता है। उदारता मानवता का मूल्य है। उसका आधार है। उसे भुलाया नहीं जा सकता। उसे संवारा जाना चाहिए और वह भारतीय मूल्यों से ही संवारी जा सकती है। भारत की इसी प्रकार की मौलिक चेतना को भारत के संविधान की प्रस्तावना में स्थापित करना अपेक्षित था। इसे आज भी यदि भारतीय संविधान की प्रस्तावना में स्थापित किया जाए तो यह भारत के लिए नहीं मानवता के लिए भी उपयोगी सिद्ध होगा।
महर्षि मनु का उपकार
महर्षि मनु ने मनुस्मृति में चारों वर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और चारों आश्रमों ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास के कर्तव्य कर्मों पर विस्तार से प्रकाश डाला है। इस प्रकार के कर्तव्य कर्मों को ही इन चारों आश्रमों के लोगों का धर्म निश्चित किया गया है। इस प्रकार के कर्तव्य कर्मों से मनुष्य धार्मिक बनता है। उसकी आत्मा में सात्विक आनंद की अनुभूति होती रहती है। उसका चित्त सदैव प्रसन्न रहता है। मनु महाराज ने यह भी स्पष्ट किया है कि देश का शासक वर्ग अथवा राजा कैसा होना चाहिए ? इस पर हमारी प्रस्तावना का कोई भी शब्द यह संकेत नहीं करता कि हम किस प्रकार के शासनाध्यक्ष की अपेक्षा करते हैं ? कौन सी आदर्श शासन व्यवस्था हमारे राष्ट्र का कल्याण कर सकती है ? और किस आदर्श व्यवस्था को अपनाकर हम संसार का बौद्धिक नेतृत्व कर सकते हैं ?
महर्षि मनु लिखते हैं कि " जैसा परम विद्वान् ब्राह्मण होता है वैसा ही सुशिक्षित विद्वान क्षत्रिय को होना योग्य है कि जिससे कि वह सब राज्य वा देश की रक्षा यथावत् करें। "
इसका अर्थ है कि शासन व्यवस्था चाहे लोकतांत्रिक अर्थात संसदीय प्रणाली ही क्यों ना हो, उसमें भी योग्यतम को वरीयता दिया जाना आवश्यक है। कूड़े कबाड़ में से कूड़े कबाड़ को छांटकर कूड़े को सर्वोच्च शिखर पर बैठाना लोकतंत्र के लिए अशोभनीय है। कूड़े में से कूड़ा छांटकर आप योग्यता का चयन नहीं कर सकते। कूड़े को कितना ही साफ करें आप, कूड़ा ही हाथ आएगा। क्योंकि वह है ही कूड़ा। जब राजनीति स्वार्थ की लड़ाई लड़ रही हो और स्वार्थ में डूबे लोगों के हाथों में जाकर वेश्या की भूमिका निभा रही हो, तब उसमें से हीरा छांटना बड़ा कठिन होता है। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो राजनीति इसी कूड़े का नाम बन गई है।
मनु का हो गया था वर्णन परिवर्तन
हमारे संविधान में इस प्रकार की स्पष्ट व्यवस्था होनी चाहिए थी कि हम जैसा परम विद्वान ब्राह्मण होता है, वैसा ही सुशिक्षित विद्वान क्षत्रिय को अपने देश का शासक बनाएंगे। जिस समय महर्षि मनु देश के प्रथम शासक बने उस समय वह ब्राह्मण वर्ण में थे। जैसे ही उन्होंने राज्य कार्य संभाला तुरंत उनका वर्ण परिवर्तित हो गया और वह ब्राह्मण से क्षत्रिय हो गए। इस प्रकार भारत के मूल संस्कार में ही ब्राह्मण को क्षत्रिय वर्ण में आकर राजकाज संभालने का संस्कार अंतर्निहित है।
ऋग्वेद के मण्डल 3 सूक्त 38 मन्त्र 6 में कहा गया है कि :-
‘त्रीणि राजाना विदथे पुरूणि परि विश्वानि भूषथः सदांसि।।’
अर्थात " ईश्वर सृष्टि के आरम्भ में अग्नि नाम के ऋषि को इस मन्त्र द्वारा यह उपदेश करते हैं कि राजा और प्रजा के पुरुष अर्थात देश के सभी नागरिक मिल कर सुख प्राप्ति और विज्ञान वृद्धिकारक राजा-प्रजा के सम्बन्धरूप व्यवहार के लिए तीन सभा प्रथम विद्यार्यसभा, द्वितीय धर्मार्यसभा तथा तृतीय राजार्यसभा नियत वा गठित करें। "
ये तीनों सभाएं और समग्र प्रजा मिलकर क्या करेंगी ? इस पर भी वेद ने हमारा मार्गदर्शन किया है। वेद की स्पष्ट आज्ञा है कि राजा, प्रजा व तीनों सभायें समग्र प्रजा वा मनुष्यादि प्राणियों को बहुत प्रकार की विद्या, स्वातन्त्र्य, धर्म, सुशिक्षा और धनादि से अलंकृत करें।
अर्थववेद काण्ड 15 के मन्त्र ‘तं सभा च समितिश्च सेना च।’ और अथर्ववेद के ही काण्ड 16 के मन्त्र ‘सभ्य सभां मे पाहि ये च सभ्याः सभासदः।’ में कहा है कि इस प्रकार से राजा व तीन सभाओं द्वारा निर्धारित राजधर्म का पालन तीनों सभायें सेना के साथ मिलकर करें व संग्राम आदि की व्यवस्था करें। राजा तीनों सभाओं के सभासदों को आज्ञा करे कि " हे सभा के योग्य मुख्य सभासदों ! तुम मेरी सभा व सभाओं की धर्मयुक्त व्यवस्था का पालन करो।"
इस प्रकार की व्यवस्था से स्पष्ट होता है कि राजा तीनों सशस्त्र सेनाओं का सर्वोच्च सेनापति होता था। वेद के इस कथन को हमारे आज के संविधान में राष्ट्रपति में समाविष्ट किया गया है। वेद की स्पष्ट घोषणा है कि तीनों सभाओं के सभासदों को सभेश राजा की धर्मयुक्त आज्ञाओं का सहर्ष पालन करना चाहिये।
( लेखक डॉ राकेश कुमार आर्य सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं)
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