Advertisment1

यह एक धर्मिक और राष्ट्रवादी पत्रिका है जो पाठको के आपसी सहयोग के द्वारा प्रकाशित किया जाता है अपना सहयोग हमारे इस खाते में जमा करने का कष्ट करें | आप का छोटा सहयोग भी हमारे लिए लाखों के बराबर होगा |

कांग्रेस के राष्ट्रवाद की हवा निकल गई

वंदे मातरम पर बवाल क्यों ?

अध्याय १३

कांग्रेस के राष्ट्रवाद की हवा निकल गई

डॉ राकेश कुमार आर्य
७ नवंबर १८७५ को ' वंदे मातरम' की रचना की गई और उसके सहित १३ वर्ष पश्चात अर्थात १८८८ में सर सैयद अहमद खान जैसे मुस्लिम नेता ने द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत की वकालत करनी आरंभ की। क्या यह सब केवल एक संयोग था या इसके पीछे किसी अन्य व्यक्ति, संस्था, संगठन अथवा तत्कालीन व्यवस्था का मस्तिष्क काम कर रहा था ?
आज हम सभी को इन प्रश्नों पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। यदि हम इनका सही उत्तर प्राप्त करना चाहते हैं तो हमें तत्कालीन व्यवस्था अर्थात ब्रिटिश सरकार की नीतियों पर भी विचार करना चाहिए। स्पष्ट है कि ब्रिटिश सरकार की नीति दोगली के साथ-साथ स्वार्थ पूर्ण भी थी अर्थात " फूट डालो और राज करो " की नीति थी। ब्रिटिश सरकार कभी यह नहीं चाहती थी कि भारत में मुसलमान और हिंदू एक होकर स्वाधीनता आंदोलन को चलाएं। इसलिए उसे इन दोनों के बीच में डंडा डालना ही था। डंडा डालने में एक पक्ष को धोखे में रखना था और वह पक्ष था- हिंदू पक्ष। जबकि दूसरे पक्ष को कुछ लाभ देना था और वह पक्ष था मुस्लिम पक्ष। स्पष्ट है कि जिसे धोखे में रखा जा रहा था उसे डंडा डालने की नीति के बारे में कुछ बताना नहीं था और जिसे लाभ दिया जाना था उसे सब कुछ बता कर चलना था।
अब सिक्के के दूसरे पक्ष पर विचार करते हैं जो कहीं ब्रिटिश सरकार की " फूट डालो और राज करो " की नीति से भी अधिक महत्वपूर्ण है। सिक्के का दूसरा पक्ष है - मुसलमानों का स्वयं का अलगाववादी आचरण। वह स्वयं नहीं चाहते कि गैर मुसलमानों के साथ मिलकर चलें। यहां तक कि गैर मुसलमानों के जीवन का अस्तित्व भी उन्हें असहनीय है। वे उनके देश पर, उनके धन सम्पदा पर, पशुओं पर और महिलाओं पर दृष्टि रखते हैं और अवसर आते ही इन पर गिद्ध की भांति टूट पड़ते हैं। मुसलमानों का इस प्रकार का आचरण उन्हें गैर मुसलमानों से दूर करता है।
यह दूरी ही उनकी सांप्रदायिकता है। संप्रदाय की विशेषता भी यही होती है कि वह मनुष्य को मनुष्य से दूर करता है।


सर सैयद अहमद खान और भारत का राष्ट्रवाद


जिस समय ७ नवंबर १८७५ को ' वंदे मातरम' की रचना की गई थी, उससे कुछ समय पहले ही स्वामी दयानंद जी महाराज ने आर्य समाज की स्थापना मुम्बई में की थी। आर्य समाज का चिंतन पूर्णतया राष्ट्रवादी चिंतन था। इसके कुछ समय पश्चात सर सैयद अहमद खान ने ' द्विराष्ट्रवाद ' पर बोलना आरंभ किया। सर सैयद अहमद खान को इतिहास में एक ' मुस्लिम स्कॉलर ' के रूप में जाना जाता है। कई लोगों की दृष्टि में वे हिंदू - मुस्लिम एकता के पक्षधर भी माने जाते हैं। यद्यपि सच्चाई यह है कि वह हिंदू - मुस्लिम एकता के पक्षधर नहीं थे। उनकी दृष्टि में मुस्लिम हित पहले था। उनको इस बात का डर था कि यदि भविष्य में जाकर भारत स्वाधीन हुआ और सत्ता हिंदुओं के हाथों में चली गई तो मुसलमानों से उनके द्वारा किए गए पापों का चुन-चुनकर प्रतिशोध लिया जाएगा। इसलिए पहले ही ब्रिटिश शासकों के साथ मिलकर अपने लिए अलग भूभाग प्राप्त कर लिया जाए। इसको कहते हैं - ' चोर की दाढ़ी में तिनका।' सर सैयद अहमद खान यह भी भली प्रकार जानते थे कि यदि स्वाधीनता मिलने के पश्चात अलग देश की बात की गई तो हिंदुओं का एक स्वाभाविक और सबसे प्रबल तर्क यह आएगा कि भारत की भूमि उनकी अपनी है। जिसे किसी विदेशी मजहब को नहीं दिया जा सकता। जिसकी कोई काट उनके पास नहीं होगी। ऐसे में यह आवश्यक है कि अब जबकि अंग्रेज उनका हर कदम पर साथ दे रहे हैं तो उनसे ही क्यों न हिंदुओं की भूमि ले ली जाए ?


ब्रिटिश सरकार की चिन्ता


उधर ब्रिटिश सरकार ने जब देखा कि ' वंदे मातरम' के कारण लोगों का तेजी से ध्रुवीकरण हो रहा है और उनके विरुद्ध चारों ओर बगावत के सुर उभरते जा रहे हैं तो उनको भी यह चिन्ता हुई कि इस प्रकार के ध्रुवीकरण को रोका जाए। उस ध्रुवीकरण को रोकने के लिए उन्होंने सर सैयद अहमद खान जैसे लोगों को थपकी मारना आरंभ किया। यह थपकी ऐसे ही नहीं मारी गई थी ? इस थपकी का भी अंग्रेजों ने ' बहुत बड़ा पुरस्कार' मुसलमानों को देने का मन बना लिया था। यहां पर यह भी उल्लेखनीय है कि मुसलमानों ने भी किसी बड़े ' पुरस्कार ' की इच्छा से ही अंग्रेजों की ओर बढ़ना आरंभ किया था। यही वह काल था जब देश की अस्मिता का सौदा किया जा रहा था। उस सौदे में ऐसी दो शक्तियां एक दूसरे के साथ उठना - बैठना आरंभ कर रही थीं जिनका इस पवित्र भूमि से दूर-दूर का भी कोई संबंध नहीं था। यह दोनों शक्तियां ही भारत से द्वेष रखती थीं। जिन हिन्दुओं का संबंध था - उनसे सारा सौदा गुप्त रखा जा रहा था।
आर्य समाज का आंदोलन तत्कालीन हिंदू समाज का और देश की स्वाधीनता का पक्षधर बनकर मैदान में उतर चुका था। कांग्रेस आर्य समाज के इस प्रकार के दृष्टिकोण से पूर्णतया असहमत थी। आर्य समाज क्रांतिकारी आंदोलन के साथ था । आर्य समाज का स्पष्ट चिंतन था कि भारत और भारतीय राष्ट्र के लिए इस्लाम और ईसाइयत दोनों का ही चिंतन विनाशकारी है। उधर कांग्रेस इस क्रांतिकारी आंदोलन की हवा निकालने का काम कर रही थी। इसी प्रकार मुस्लिम पक्ष भी क्रांतिकारी आंदोलन की हवा निकालने वालों में ही सम्मिलित था। क्योंकि वह जानता था कि उसके आका का क्या दृष्टिकोण हो सकता है और उसका स्वयं का हित किसके साथ खड़े होने में है ?


पर्दे के पीछे पक रही थी खिचड़ी


जब कांग्रेस के मंचों से ' वंदे मातरम ' गूंजता था तो अंग्रेजों को यह अच्छा नहीं लगता था। इसलिए उन्होंने धीरे-धीरे मुसलमानों को उकसाना आरंभ किया। उनके कानों में फूंक मारना आरंभ किया कि यदि आप किसी ' बड़े पुरस्कार' की इच्छा रखते हो तो हिंदुओं का हर पग पर विरोध करना सीखो। इस बात की चिंता मत करो कि हिंदू तुम्हारा कुछ बिगाड़ सकते हैं ? क्योंकि तुम्हारे साथ हमारी पूरी व्यवस्था ( सरकार ) खड़ी है। हमारे रहते हिन्दू पक्ष तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा। पर्दे के पीछे पकने वाली इस खिचड़ी ने राष्ट्र के सम्मान का सौदा निरंतर जारी रखा।
पर्दे के पीछे पकने वाली इसी खिचड़ी ने सही उस समय मुस्लिम लीग की स्थापना कराई। जिस समय पूरा देश ' वंदे मातरम' के क्रांतिकारी आह्वान और नारे से गूंज रहा था।
कुल मिलाकर ' वंदे मातरम ' के राष्ट्रवाद की हवा निकालने के लिए मुस्लिम लीग की स्थापना अंग्रेजों की सहायता से १९०६ में ढाका में की गई। इसका अपना खुला एजेंडा था कि हमें मुसलमानों के अधिकारों की मांग करनी है और धीरे-धीरे उसे अपना अलग भूभाग मांगने तक ले जाना है।
इस प्रकार १८८८ में सर सैयद अहमद खान जिस द्विराष्ट्रवाद की वकालत कर रहे थे, उस बीज का अंकुरण १९०६ में आकर मुस्लिम लीग के रूप में हुआ। चेहरा चाहे कोई भी हो, हाथ भी चाहे कोई हो और मंच भी चाहे कोई हो परंतु सोच नियत और नीति वही थी जो १८८८ में सर सैयद अहमद खान ने मुसलमानों के हितों की पैरवी करते हुए निश्चित की थी।
मुस्लिम लीग की स्थापना पर्दे के पीछे की उस खिचड़ी का साकार रूप था, जिसे मुस्लिम और अंग्रेज भारतीय हितों के विरुद्ध जाकर पका रहे थे। जब हिंदू समाज ' वंदे मातरम' की गरम चाशनी को पकाकर उससे स्वाधीनता को साध लेना चाहता था, तब उसमें कड़वा विष घोलने का काम मुस्लिम नेता और अंग्रेज मिलकर कर रहे थे। जिसमें कांग्रेस का भी साथ था। हिंदू समाज देश में ही नहीं, देश के बाहर भी अपने क्रांतिकारियों को भेजकर स्वाधीनता आंदोलन को गति देना चाहता था। जबकि मुस्लिम पक्ष अंग्रेजों के साथ मिलकर अपने हितों के लिए काम करना आरंभ कर चुका था। मुस्लिम लीग की स्थापना को इसी दृष्टिकोण से समझने की आवश्यकता है।


बंग भंग और मुस्लिम नेता


१९०५ में अंग्रेजों ने बंगाल का सांप्रदायिक आधार पर विभाजन किया। मुस्लिम सांप्रदायिकता में विश्वास रखने वाले अनेक मुस्लिम नेता इस बात से सहमत थे कि बंगाल का सांप्रदायिक आधार पर विभाजन होना पूर्णतया उचित और न्यायसंगत है। यह सांप्रदायिक विभाजन ही आगे चलकर सांप्रदायिक आधार पर देश के विभाजन का कारण बना। एक प्रकार से बंग-भंग सांप्रदायिक आधार पर देश के विभाजन की आधारशिला थी। सांप्रदायिक आधार पर बंग भंग मुसलमानों के लिए एक प्रयोग था। कांग्रेस की ढुलमुल नीति के कारण मुस्लिम लीग ने इस बंग-भंग को आधार बनाकर नई तैयारी करनी आरंभ की। इसीलिए उसने अपनी स्थापना के दिन से ही देश के विभाजन की तैयारी करनी आरंभ कर दी। यही कारण है कि मुस्लिम लीग के लिए ' वंदे मातरम' एक सांप्रदायिक नारा था। क्योंकि उसकी सोच में कहीं पर भी भारत माता के लिए कोई स्थान नहीं था। उसे आम मुसलमान को सांप्रदायिक आधार पर भड़काना था। जिससे वह हिंदू समाज से दूरी बनाकर चले और सांप्रदायिक आधार पर मुस्लिम लीग का समर्थन करना आरंभ करे। प्रारंभ में इसी प्रकार की नीति अपनानी थी । धीरे-धीरे माहौल गर्म करके कालांतर में उसे नए देश के लिए तैयार कर लेना था। घटनाओं ने बताया कि यही हुआ भी। घटनाओं के अध्ययन से हमें पता चलता है कि यह सब कुछ सुनियोजित ढंग से हो रहा था। यद्यपि इसको बहुत गोपनीय ढंग से चालू किया गया था।


मिंटो-मार्ले सुधार अधिनियम


मुस्लिम लीग ने माहौल को गर्माना आरंभ किया। अंग्रेजों ने भी अपनी कुटिल चालों को और तेजी से चलना आरंभ किया। जितना ही अधिक माहौल ' वंदे मातरम' से देश की स्वाधीनता के लिए तैयार हो रहा था, उतनी ही तीव्रता से मुस्लिम लीग और ब्रिटिश सरकार कांग्रेस के समर्थन से उसे बिगाड़ने की तैयारी कर रही थीं। इसी समय ' मिंटो-मार्ले सुधार अधिनियम १९०९' लागू किया गया। यह अधिनियम मुस्लिम लीग और ब्रिटिश सरकार दोनों की मिलीभगत का परिणाम था। जिसने देश के विभाजन के लिए नई भूमिका तैयार करने का काम किया। ' वंदे मातरम' की ओर से मुसलमान का ध्यान हटाने के लिए अंग्रेजों ने उन्हें अलग निर्वाचक मंडल की सुविधा प्रदान की। इसका अभिप्राय यह था कि हम आपको विधानमंडलों में पृथक निर्वाचक मंडलों के माध्यम से अधिक अधिकार प्रदान करेंगे और तुम्हें इसके बदले में ' वंदे मातरम' से दूर रहना होगा अर्थात भारत की स्वाधीनता के लिए चल रहे आंदोलन से अपने आप को दूर करना होगा।
मुसलमानों ने इस गुप्त समझौते पर अपनी सहमति प्रदान की। इसका परिणाम यह निकला कि भारत में मुस्लिम सांप्रदायिकता मुखर होती चली गई। जिसने हिंसा का मार्ग अपना लिया। दु:ख की बात यह रही कि गांधी जी मुस्लिम लीग की इस मुखर सांप्रदायिक नीति का विरोध नहीं कर पाए। वह तुष्टीकरण करते हुए मुसलमानों और मुस्लिम लीग की पीठ पर प्यार से हाथ फेरते रहे और मनाने का प्रयास करते रहे। यद्यपि मुस्लिम लीग ने यह स्पष्ट कर दिया कि उस पर गांधी जी की इस पुचकारने की नीति का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। लॉर्ड मिंटो ने भारत में सांप्रदायिक आधार पर निर्वाचक मंडलों की स्थापना कर भारत को विभाजन के मार्ग पर डाल दिया।


कांग्रेस और क्रांतिकारी आंदोलन


यदि कांग्रेस हमारे क्रांतिकारी आंदोलन के उद्देश्य को समझ कर उसका साथ देने का निर्णय लेती और सांप्रदायिक आधार पर किसी भी वर्ग का तुष्टिकरण नहीं करती तो इतिहास दूसरा होता। उसे ' वंदे मातरम' से बने गर्म माहौल को अपने पक्ष में भुनाने का प्रयास करना चाहिए था। ऐसा न करके कांग्रेस ने धीरे-धीरे ' वंदे मातरम ' से अपना पल्लू छुड़ाना आरंभ कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि मुस्लिम लीग और मुस्लिम नेता निरंतर' वंदे मातरम ' का विरोध करने पर उतर आए। १९२३ ईस्वी में जब कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन आंध्र प्रदेश के काकीनाडा शहर में आयोजित किया गया तो वहां पर मोहम्मद अली जौहर नाम के मुस्लिम नेता को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया। यह अधिवेशन २८ दिसंबर १९२३ से १ जनवरी १९२४ तक आयोजित किया गया था। इस अधिवेशन के अध्यक्ष मोहम्मद अली जौहर ने ' वंदे मातरम ' का पहली बार कांग्रेस के मंच पर मुखर होकर विरोध किया।
पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर कांग्रेस के इस अधिवेशन में वंदे मातरम गीत गा रहे थे। तभी मोहम्मद अली जौहर ने कार्यक्रम स्थल पर प्रवेश किया। वंदे मातरम के शब्द कानों में पड़ते ही मोहम्मद अली जौहर केतन-बदन में आग लग गई। उन्होंने पलुस्कर जी को वंदे मातरम गाने से रोकने का प्रयास किया लेकिन परंतु पलुस्कर जिस मिट्टी के बने हुए थे उसमें झुकना कहीं दूर-दूर तक भी सम्मिलित नहीं था, इसलिए उन्होंने कांग्रेस के अध्यक्ष मोहम्मद अली जौहर को ही शांत रहने का संकेत कर दिया और पूरा गीत गाकर ही बैठे। ऐसी स्थिति में मोहम्मद अली जौहर ने कांग्रेस के इस अधिवेशन का बहिष्कार कर मंच छोड़ दिया।
ये मोहम्मद अली जौहर वही मुस्लिम नेता थे, जिनका हिंदुओं के विरुद्ध किए गए मोपला कांड से सीधा संबंध रहा था। वह खिलाफत आंदोलन के एक बड़े नेता के रूप में ही जाने जाते हैं। हम सभी जानते हैं की खिलाफत आंदोलन गांधी जी के द्वारा किस प्रकार हिंदुओं के और विशेष रूप से भारत के हितों की नीलामी चढ़ाने में काम आया था ? गांधी जी ने तुर्की के सुल्तान को लगभग भारत का सुल्तान मान लिया था। तुर्की का सुल्तान उन दिनों मुसलमानों का धार्मिक गुरु होता था। जिसे खलीफा के नाम से जाना जाता था। इस खलीफा के पद अर्थात खिलाफत को अंग्रेजों ने समाप्त कर दिया था। इस प्रकार खलीफा या खिलाफत का भारत से कोई संबंध नहीं था, परंतु गांधी जी ने भारत के मुसलमानों को प्रसन्न करने के लिए खिलाफत को अपने सिर पर ओढ लिया। वे देश के लोगों को बलात खिलाफत आंदोलन में सम्मिलित होने का दबाव बनाने लगे। गांधी जी की इसी प्रकार की नीतियों से मोहम्मद अली जौहर को पंख लग गए। वह इतने उड़ने लगे कि वंदे मातरम को कांग्रेस के मंच पर गाने से रोकने की भी हिमाकत कर बैठे। गांधी जी सहित किसी भी कांग्रेसी नेता ने मोहम्मद अली जौहर के इस कृत्य की निंदा नहीं की। परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस के इस मौन को उसका मोहम्मद अली जौहर के सामने समर्पण मान लिया गया।


कांग्रेस का आत्म समर्पण


यह समर्पण देश के लिए घातक सिद्ध हुआ। कांग्रेस के रीढ़विहीन नेता वस्तुस्थिति का सही प्रकार से सामना नहीं कर पाए और उपस्थित चुनौती के सामने आत्मसमर्पण को ही अपनी विजय मान लिया। उपस्थित प्रश्न का समाधान देने के स्थान पर उन्होंने उसे बीजगणित का सवाल बना दिया।
जिसमें फैलाने के लिए तो लंबी चौड़ी बीज रकम फैलाई जाती है,परंतु उसका उत्तर शून्य ही आता है। कांग्रेस के नेता यह भूल गए थे कि चुनौती के सामने आत्मसमर्पण करना आत्महत्या के समान होता है और प्रश्न का समाधान देना ही वीरों का कार्य होता है। चुनौती हमसे तभी पराजित होती है जब हम चुनौती के लिए स्वयं चुनौती बन जाते हैं। किसी के सामने दांत निकालने से अथवा याचना करने से वह पराजित नहीं होता है, इसके विपरीत ऐसी स्थिति में वह आप पर और अधिक हावी हो जाता है। दूसरों को दबाकर रखने के लिए आवश्यक होता है कि उसके हर दांव पर ध्यान रखा जाए और अपने दांव को उससे छुपा कर रखा जाए।
कांग्रेस के काकीनाडा अधिवेशन ने कांग्रेस के कथित राष्ट्रवाद की हवा निकाल दी। विवेकशील लोगों को भली प्रकार ज्ञात हो गया कि कांग्रेस किसी चुनौती के सामने सीना तानकर खड़ी नहीं होगी। विशेष रूप से तब जब मुस्लिम सांप्रदायिकता से जुड़ा हुआ कोई प्रश्न सामने उपस्थित हो। मुस्लिम नेताओं के सामने कांग्रेस के नेताओं का आभाहीन होना राष्ट्र के लिए कष्टप्रद सिद्ध हुआ। कोई भी ऐसा नेता जो अपने समक्ष उपस्थित किसी व्यक्तित्व के सामने या उपस्थित किसी चुनौती के सामने आत्म समर्पण कर दे, वह कभी नेता कहे जाने के योग्य नहीं होता। कांग्रेस की इस अभाहीन छवि के कारण ही मोहम्मद अली जौहर जैसे लोगों के चरित्र की कभी समीक्षा नहीं की गई। इतिहास में उन्हें हिंदू मुस्लिम एकता का समर्थक लिख दिया गया। इस एक पंक्ति ने ही कांग्रेस के इस अध्यक्ष के जीवन के सारे पापों को मानो क्षमा कर दिया।
इतिहास के होंठ सिल दिए गए। मां भारती के हृदय पर पत्थर रख दिया गया। कांग्रेस के नेताओं ने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली और जिनको कुछ सुनाई दे रहा था ,उनके कानों में रूई ठूंस दी गई। इस प्रकार भारत के क्रांतिकारी इतिहास के साथ क्रूर उपहास करते हुए कांग्रेस ने अपने वास्तविक चरित्र का परिचय दिया। गांधी जी और नेहरू जी की छत्रछाया में रहकर कांग्रेसी लोगों ने भारत का इतिहास लिखा, जिसे पूर्णतया विकृत कर दिया गया।

( लेखक डॉ राकेश कुमार आर्य सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं )
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews #Divya Rashmi News, #दिव्य रश्मि न्यूज़ https://www.facebook.com/divyarashmimag

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ