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प्रेम का उत्सव या संवेदना का अवसान?

प्रेम का उत्सव या संवेदना का अवसान?

दिव्य रश्मि के उपसम्पादक जितेन्द्र कुमार सिन्हा की कलम से |

सृष्टि में यदि किसी तत्व को ईश्वरीय शुभाशीष का सर्वोच्च उपहार कहा जाए, तो वह निःसंदेह प्रेम है। प्रेम जो सर्वतो भावेन अनन्य समर्पण है। प्रेम जो ब्रह्मरस की साकार अनुभूति है। प्रेम जो करुणा, क्षमा और सहअस्तित्व की चरम अभिव्यक्ति है।


प्रेम कोई क्षणिक आकर्षण नहीं, कोई देहप्रधान अनुभूति नहीं, कोई बाजारू उत्पाद नहीं, बल्कि वह आत्मा से आत्मा का संवाद है। भारतीय दर्शन में प्रेम को काम नहीं, बल्कि प्रेम कहा गया है जहाँ काम वासना है, वहीं प्रेम साधना।


लेकिन आज का समय इस मूल अवधारणा से विमुख होता प्रतीत हो रहा है। प्रेम, जो कभी साध्य था, अब साधन बनता जा रहा है। भारतीय परंपरा में प्रेम को चार स्तरों पर समझा गया है । प्रीत यानि आत्मीय लगाव। नीति यानि कर्तव्यनिष्ठ स्नेह। मित्रता (मित) यानि समानता और विश्वास। रीति यानि सामाजिक और सांस्कृतिक मर्यादा। इन चारों का समन्वय ही प्रेम को पूर्ण बनाता है।


यह प्रेम माता-पिता और संतान के बीच है, गुरु और शिष्य के बीच है, पति-पत्नी के बीच है, और सबसे ऊपर ईश्वर और भक्त के बीच है। यही कारण है कि भारतीय परंपरा में प्रेम को पूजा का रूप दिया गया है, न कि प्रदर्शन का।


पिछले कुछ दशकों में भारतीय समाज में एक विचित्र द्वंद्व दखा जा रहा है। आधुनिकता अपनाना चाहते हैं, लेकिन विवेक त्यागकर। वैश्विक बनना चाहते हैं, परंतु अपनी जड़ों को काटकर। वेलेंटाइन डे इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। यह दिन मूलतः पाश्चात्य समाज की ऐतिहासिक-धार्मिक पृष्ठभूमि से उपजा है, परंतु भारत में इसे प्रेम के सार्वभौमिक प्रतीक के रूप में प्रस्तुत कर दिया गया है बिना यह समझे कि भारतीय समाज में प्रेम की अभिव्यक्ति पहले से कहीं अधिक गहन और व्यापक रही है।


आज प्रेम को मापा जाता है महंगे उपहारों से। सोशल मीडिया पोस्ट से। रेस्तरां बुकिंग से। ब्रांडेड गुलाब और चॉकलेट से। प्रेम अब अनुभूति नहीं, प्रदर्शन है। जहाँ पहले प्रेम त्याग सिखाता था, वहीं अब वह अपेक्षा सिखाता है। जहाँ पहले प्रेम मौन में जीया जाता था, वहीं अब वह कैमरे के सामने सिद्ध किया जाता है। यह व्यावसायीकरण केवल प्रेम को नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं को ही वस्तु में बदल रहा है।


यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि एक ओर गुलाब दिवस, चॉकलेट दिवस, वेलेंटाइन दिवस मनाते हैं और दूसरी ओर छह वर्ष पूर्व देश के 40 वीर जवानों की शहादत स्मृति-पटल से ओझल होती जा रही है। यह प्रश्न केवल एक घटना का नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय चेतना का है। जब समाज स्मरण से कटता है, तो उसका भविष्य दिशाहीन हो जाता है।


आज प्रेम परिवार से बाहर खोजा जा रहा है, जबकि परिवार स्वयं प्रेम की प्रथम पाठशाला है। माँ-पिता का प्रेम अब मदर्स डे और फादर्स डे तक सीमित होता जा रहा है। बच्चे प्रेम नहीं, कंटेंट उपभोग कर रहे हैं। संवाद नहीं, नोटिफिकेशन बढ़ रहे हैं। यह स्थिति केवल सामाजिक नहीं, बल्कि मानसिक और नैतिक संकट का संकेत है।


आधुनिक समाज ने प्रेम को देह से जोड़ दिया है। लेकिन भारतीय दर्शन प्रेम को आत्मा से जोड़ता है। देह आकर्षण चाहती है, आत्मा समर्पण। देह उपभोग चाहती है, आत्मा स्थायित्व। जब प्रेम देह तक सीमित होता है, तो वह टूटता है। जब आत्मा तक पहुँचता है, तो वह शाश्वत बनता है।


आज दुख, शोक, प्रेम, करुणा, सब ब्रेकिंग न्यूज बन चुका है। संवेदना अब अनुभूति नहीं, बल्कि हेडलाइंस है। यही कारण है कि शहादत पर दो मिनट का मौन रखते हैं, और प्रेम पर सात दिन का उत्सव।


आज आवश्यकता है प्रेम को पुनः समझने की। प्रेम को बाजार से मुक्त करने की। प्रेम को देह से ऊपर उठाने की। प्रेम को परिवार, समाज और राष्ट्र से जोड़ने की। प्रेम केवल प्रेमी-प्रेमिका का विषय नहीं है, वह मानवता का आधार है।


प्रेम कोई दिवस नहीं है, प्रेम कोई ट्रेंड नहीं है, प्रेम कोई उत्पाद नहीं है। प्रेम निरंतर साधना है। यदि प्रेम है तो शहीदों का सम्मान होगा। माता-पिता की सेवा होगी। समाज में करुणा होगी और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व होगा। यही प्रेम का भारतीय स्वरूप है। यही प्रेम का शाश्वत सत्य है। --------------
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