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मातृ सा स्वर्ग नहीं

मातृ सा स्वर्ग नहीं


माॅं के चरण आचरण निहित ,
माॅ का पल्लू जीवन छाया है ।
माॅं के कर में कर्म यह निहित ,
जिससे जन्म हमने पाया है ।।
माॅं के बाल में बल है निहित ,
माॅं का सर यह सरस्वती है ।
माॅं का मत ये मात देनेवाला ,
जिससे मिलता हमें मति है ।।
मातृ कपाल यह कपालिनी
इनके नैन से मिला चैन है ।
मातृ नाक ब्रह्मांड से ऊॅंची ,
चाहे हिन्दू इस्लाम जैन है ।।
माॅं के मुॅंह में है मोह निहित ,
मातृ जिह्वा मिलता प्रसाद है ।
माॅं को चाहे बालि कंस मिले ,
या पुत्र मिला भक्त प्रह्लाद है ।।
मातृ गले में कोई गिला नहीं ,
मातृ सीने से ये शान मिला है ।
माॅं का मन अति मनभावन ,
माॅं के मन से शान खिला है ।।
मातृ धड़ में निज धर्म निहित ,
माॅं के चर्म यह शर्म बसा है ।
मातृ बिन हो जाता अधूरा ,
माता में ये मातृ मर्म बसा है ।।
माॅं से बेहतर स्वर्ग भी नहीं
माॅं बिन बदतर नर्क नहीं है ।
अधमों का जीवन है अधम ,
माॅं हो या न हो फर्क नहीं है ।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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