सुहानी शाम
अरुण दिव्यांशसूर्यागमन से उषा किरण की ,
हुई धरती पे किरण बरसात ।
दिन भर बहीं धूप की नदियाॅं ,
जल पानी की धारा बहे रात ।।
सूर्यागमन से सूर्य गमन तक ,
सूर्य का ही अपना पहरा है ।
आ जाए जब काल निशा की ,
पता न तम कितना गहरा है ।।
जैसी होती सुहानी उषाकाल ,
वैसी सुहानी शाम मस्त है ।
उषाकाल सूर्य होता है उदय ,
सुहानी शाम होता अस्त है ।।
एक सूर्य की जब हो बिदाई ,
तब दिवस हो जाता त्रस्त है ।
सुबह आना शाम को जाना ,
दिवाकर इसी में अभ्यस्त है ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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