“अनाम भय की पाठशाला”
पंकज शर्माविश्वविद्यालय के गलियारों में
अब शब्द नहीं गूँजते—
गूँजती है चुप्पी।
ब्लैकबोर्ड पर लिखे सूत्र
अचानक
अभियोग में बदल सकते हैं,
और प्रश्न पूछने वाला छात्र
अपने ही प्रश्न से डरने लगता है।
स्वर्ण कहलाने का बोझ
अब विशेषाधिकार नहीं,
एक अदृश्य अपराध-सा है—
जैसे जन्म प्रमाणपत्र
जेब में नहीं
छाती पर टँगा हो,
और हर दृष्टि पूछती हो—
“तुम किस अधिकार से यहाँ हो?”
न्याय की भाषा
जब परिभाषा खो देती है,
तो अनुभूति ही साक्ष्य बन जाती है।
तब शिक्षक का मौन,
प्रशासन का विवेक
और छात्र का परिश्रम—
तीनों
एक ही कटघरे में खड़े कर दिए जाते हैं।
सबसे भयावह
वह शिकायत नहीं
जो सच से उपजती है,
बल्कि वह है
जो सत्य का मुखौटा पहन
दुर्भावना से जन्म लेती है।
जहाँ दंड नहीं,
वहाँ आरोप
सबसे सस्ता हथियार हो जाता है।
समता की इस नई भाषा में
कुछ प्रश्न अनुवादित नहीं हो पाते—
यदि उत्पीड़क भी
कभी उत्पीड़ित रहा हो,
तो उसके हाथों का अन्याय
किस शब्दकोश में दर्ज होगा?
नियम चुप हैं,
और चुप्पी पक्षपाती।
पहचान की राजनीति
कैंपस में
विचार नहीं,
मोर्चे खड़े करती है।
छात्र अब सहपाठी नहीं,
संभावित शिकायतकर्ता हैं—
और मित्रता
एक जोखिम भरा प्रयोग।
संघीय नक्शे पर
जब अधिकारों की रेखाएँ काँपती हैं,
तो शिक्षा
राजनीति की प्रयोगशाला बन जाती है।
यहाँ ज्ञान
उत्तर नहीं देता,
सिर्फ़ बचाव करता है।
फिर भी,
इस भय के बीच
एक प्रश्न बचा रहता है—
क्या न्याय वही है
जो डर पैदा करे?
या वह,
जो सबको
निडर होकर
सोचने का साहस दे?
कविता यहीं नहीं रुकती—
क्योंकि असुरक्षा
अब भी
क्लासरूम में
पहली पंक्ति में बैठी है।
. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️ "कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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