
अब पाकिस्तानी खोज रहे हैं अपने गै़र-मुस्लिम पूर्वज
सुरेन्द्र बांसलइन दिनों पाकिस्तान के बुद्धिजीवियों में एक नया रूझान तेज़ी से उभर रहा है। गत कुछ वर्षों से वे अपने हिंदू और बौद्ध पूर्वजों को न सिर्फ तलाश कर रहे हैं, बल्कि उन्हें महिमामंडित करने का अभियान भी चला रहे हैं।
इसी कड़ी में पिछले सप्ताह इस्लामाबाद की क़ायद-ए-आज़म विश्वविद्यालय के भाषा विभाग द्वारा महर्षि पाणिनि और उनकी कालजयी कृति ‘अष्टाध्यायी’ के संबंध में एक अंतरराष्ट्रीय गोष्ठी का आयोजन किया गया। इस गोष्ठी में विश्वभर के चोटी के 100 से अधिक भाषाविदों ने भाग लिया। गोष्ठी को संबोधित करते हुए विश्वविद्यालय के भाषा विभाग के प्रमुख डाॅ. अली अहमद ने कहा कि हर पाकिस्तानी को भाषा विज्ञान और व्याकरण के आदि पुरुष महर्षि पाणिनि पर गौरवान्वित होना चाहिए। क्योंकि वे आज जहां एक बलात मुल्क पाकिस्तान है ,वे वहां के मूल निवासी थे। उनके ज्ञान का लोहा आज विश्वभर में माना जा रहा है। उन्होंने कहा कि हम पाकिस्तानियों को अपने उन पूर्वजों को नजर अंदाज नहीं करना चाहिए जिनकी उपलब्धियों पर विश्वभर गौरव का अनुभव करता है। उन्होंने कहा कि ज्ञान और संस्कृति एक निरंतर प्रवाह है। उसे धर्म के आधार पर विभाजित नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि पाणिनि और उनकी कृति ‘अष्टाध्यायी’ पर पाकिस्तान के विश्वविख्यात इतिहासकार प्रो. रहमत अली ने तीन पुस्तकें लिखी थीं, जो विश्वभर में चर्चित हुईं।
महर्षि पाणिनि का पाकिस्तान में जन्म स्थान कौन सा था इसके बारे में विभिन्न विद्वानों में विवाद भी उभर कर आया। डाॅ. अहमद ने दावा किया कि इस महान विद्वान का जन्म अटक ज़िला में शलातुर गांव में 520 ई.पू. में हुआ था।
जबकि एक अन्य विद्वान डाॅ. गोहद यूसुफ़ज़ई ने दावा किया कि इस महान विद्वान का जन्म ख़ैबर पख्तूनख्वा के स्वाबी ज़िला में काबुल नदी और सिंध नदी के संगम पर स्थित पानीवांड नामक गांव में हुआ था। जबकि एक अन्य विद्वान हिमायतुल्लाह ने कहा कि उनका जन्म सिंधु नदी के किनारे शलातुर में हुआ था। गोष्ठी में पाकिस्तान के पुरातत्व विभाग से अुनरोध किया गया कि वह तीनों जगहों पर तुरंत उत्खनन परियोजना की शुरुआत करे ताकि यह पुष्टि हो सके कि इस महान विद्वान का जन्म कहां पर हुआ था।
डाॅ. इकरामुद्दीन ने कहा कि विश्वभर के व्याकरण के विद्वानों ने अपनी-अपनी भाषा के व्याकरण को महर्षि पाणिनि द्वारा निर्धारित सिद्धांतों के अनुसार ही किया है। उन्होंने कहा कि पाणिनि रचित ‘अष्टध्यायी’ में आठ अध्याय और 3996 सूत्र हैं। उनका यह ग्रंथ सिर्फ संस्कृत व्याकरण तक ही सीमित नहीं है, बल्कि उन्होंने अपने इस ग्रंथ में तत्कालीन समाज के विभिन्न पहलुओं का भी विस्तृत अनुसंधान करने के बाद वर्णन किया है। इस ग्रंथ में भूगोल, सामाजिक व आर्थिक व्यवस्था, शिक्षा आदि के बारे में तत्कालीन समाज का विस्तृत चित्रण है।
डाॅ. चौधरी फैज़ी ने कहा कि पाणिनि ने कश्मीर की विख्यात शारदा विश्वविद्यालय और तक्षशिला में अध्यापक के रूप में कार्य किया था। विश्व में पहली बार उन्होंने शब्दों का संकलन करके उनका वर्गीकरण किया और अनेक सूचियां बनाईं। उन्होंने कहा कि इस बात पर हर पाकिस्तानी को फख़्र करना चाहिए कि हमारे सप्त सिंधु क्षेत्र में विश्व के प्राचीनतम ग्रन्थ ऋगवेद और अनेक ग्रंथों की रचना हमारे विद्वानों द्वारा की गई।
पाणिनि ने इस क्षेत्र के 500 से अधिक गांवों का पैदल भ्रमण करके उनके भूगोल और वहां बोली जाने वाली बोलियों एवं आर्थिक व सामाजिक ढांचे का अन्वेषण करके उसका समावेश किया।
ग़ौरतलब है कि इससे पहले ख़ैबर पख़्तूनबा विश्वविद्यालय में आचार्य विष्णु गुप्त चाणक्य के बारे में पांच साल पहले एक गोष्ठी का आयोजन किया गया था। इसमें 20 विद्वानों ने उनसे संबंधित शोधपत्र प्रस्तुत किए थे। पाकिस्तानी पुरातत्व विभाग के अनुसार आचार्य चाणक्य का जन्म ख़ैबर पख्तूनख्वा के मोदड़ा नामक गांव में हुआ था और उन्होंने दो दशक तक तक्षशिला विश्वविद्यालय में अध्यापन किया। यहीं मौर्य वंश के संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य ने उनसे शिक्षा प्राप्त की।
विश्वविद्यालय के उपकुलपति मीर क़ासिम ने कहा कि यह महान विद्वान कूटनीति के जनक थे। उनके मार्गदर्शक सिद्धांतों का विश्वभर में अनुसरण किया जाता है।इससे पूर्व लाहौर में पंजाबी सभा द्वारा सम्राट पुरु दिवस का आयोजन भी किया जा चुका है।
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