वंदे मातरम पर बवाल क्यों ?
अध्याय १२
विदेशों में क्रांतिकारी आंदोलन और वंदे मातरम
डॉ राकेश कुमार आर्य
भारत के अनेक क्रांतिकारी ऐसे थे जिन्होंने विदेशों में रहकर भारत का क्रांतिकारी आंदोलन जारी रखा था। उन लोगों को भी ' वंदे मातरम' ने बहुत अधिक प्रेरित किया था। ऐसे क्रांतिकारियों में से ही एक मदनलाल ढींगरा भी थे। मातृभूमि की वंदना अर्थात राष्ट्र वंदना में उनका कोई तोड़ नहीं। उन्होंने अपने क्रांतिकारी विचारों से इतिहास में जिस प्रकार अपनी आभा उत्कीर्ण की उससे स्पष्ट हो गया कि उन्हें अपनी मातृभूमि से अधिक प्रिय कोई चीज नहीं थी।
उनका जन्म १८ सितंबर १८८३ को अमृतसर में हुआ था। बचपन से ही उनके ऊपर देशभक्ति हावी हो गई थी। ब्रिटिश राजभक्त परिवार में जन्म लेने के उपरांत भी उन्होंने कभी अंग्रेजों के गीत नहीं गए। वह भारत के उदगाता थे , भारत के व्याख्याता थे और भारत के ही निर्माता थे। ब्रिटिश सरकार की चरण वंदना में उनका तनिक भी विश्वास नहीं था।इसलिए उन्होंने परिवार की ब्रिटिश राजभक्त की सोच से अलग हटकर देशभक्त क्रांतिकारियों के साथ उठना - बैठना आरंभ कर दिया था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा लाहौर से प्राप्त की थी। उसके पश्चात उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए वह लंदन गए। वहां पर श्याम जी कृष्ण वर्मा और विनायक दामोदर सावरकर जैसे महान क्रांतिकारी पूर्व से ही मां भारती की सेवा करने के लिए अपने खम्भ गाड़े हुए थे।
जहां चाह वहां राह
ये सभी क्रांतिकारी पहले से ही ' वंदे मातरम' के पुजारी थे। श्याम जी कृष्ण वर्मा पहले से ही विदेश में रहकर मातृभूमि की सेवा कर रहे थे। इसी प्रकार राष्ट्र चिंतन और वीरता से अभिभूत सावरकर जी भी अपनी राष्ट्र आराधना में लगे हुए थे। मातृभूमि उन्हें प्राणों से प्यारी थी। कहा जाता है कि जहां चाह होती है वहां राह मिल ही जाती है। मदनलाल ढींगरा के हृदय में पहले से ही देशभक्ति रची- बची थी। इसलिए वह स्वयं ही ऐसे लोगों से जा मिले,जिनकी उन्हें खोज थी। उधर श्याम जी कृष्ण वर्मा और विनायक दामोदर सावरकर भी ऐसे युवाओं की खोज में थे जो ' वंदे मातरम' की पवित्र भावना को हृदय में लेकर देश के लिए कुछ करने की चाह रखते हों। आग दोनों ओर से थी , इसलिए जब मिलन हुआ तो दोनों पक्षों ने एक दूसरे का स्वागत किया। परिणाम यह हुआ कि विदेश की धरती पर चल रहा क्रांतिकारी आंदोलन और भी अधिक प्रचंड हो उठा। मदनलाल ढींगरा ने ' इंडिया हाउस ' में अपने अन्य क्रांतिकारी साथियों के साथ रहकर क्रांतिकारी गतिविधियों को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया।
'इंडिया हाउस' में रहकर क्रांतिकारी गतिविधियों को आगे बढ़ाना बहुत साहसिक कार्य था। यह कुछ उसी प्रकार था, जैसे शेर की मांद में रहकर कोई शेर से वैर पाल ले। परंतु जो स्वयं ही शूरवीर हों और जिनके स्वयं का निवास स्थल किसी शेर की मांद से कम न हो , उनके लिए उन क्रूर , हिंसक और पाशविक प्रवृत्ति के मनुष्यों के रूप में घूम रहे कायर लोगों की मांद में अथवा उनके घर में जाना कोई बड़ी बात नहीं है,
जो मनुष्य का शिकार करते हों। मदनलाल ढींगरा जैसे क्रांतिकारी ऐसे क्रूर और हिंसक कायरों की ' मौत के वारंट' लेकर उनके घर पहुंचे थे। ऐसे कार्य को कोई ' वंदे मातरम' का उपासक ही कर सकता था,वही शूरवीर कर सकता था जिसे अपनी मातृभूमि से अपने प्राणों से भी अधिक प्यार था।
कुछ समय पश्चात ही ' वंदे मातरम' के उपासक मदन लाल ढींगरा को यह आभास हो गया कि वह यहां पर शिक्षा प्राप्ति के अतिरिक्त एक ऐसे अत्याचारी ब्रिटिश अधिकारी के मौत के 'वारंट' लेकर भी आए हैं, जिन्हें केवल वही निपटा सकते हैं।
ब्रिटिश सरकार को दिया कड़ा संदेश
हम सभी जानते हैं कि ब्रिटिश सरकार ने उन दिनों भारत में 'वंदे मातरम' के गान पर रोक लगा दी थी। परंतु भारत के क्रांतिकारी थे कि उन पर ब्रिटिश सरकार के इस प्रकार के अत्याचारों का कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था। इसी समय हमारे क्रांतिकारियों ने एक ब्रिटिश अधिकारी कर्जन वायली की हत्या करने का निर्णय लिया। इस हत्या के माध्यम से हमारे क्रांतिकारी न केवल उस ब्रिटिश अत्याचारी अधिकारी के पापों का दंड उसे देना चाहते थे, अपितु ब्रिटिश सरकार को उसके घर में रहकर ही यह भी बता देना चाहते थे कि यदि तुम हमें ' वंदे मातरम ' बोलने से रोकोगे और हमारे स्वराज्य की प्राप्ति के उद्देश्य में किसी प्रकार से बाधक बनोगे तो हम तुम्हें तुम्हारे घर में मारने के लिए भी तैयार हैं।
१ जुलाई, १९०९ को भारत के इस महान क्रांतिकारी मदनलाल ढींगरा ने सर विलियम कर्जन वायली को उसके पापों का दंड देते हुए सदा-सदा के लिए मृत्यु की नींद सुला दिया। कर्जन वाली और उसके देशवासियों को यह पता चल गया कि भारत शूरवीरों और देशभक्तों का देश है। उसके शेर अभी जिंदा हैं। यदि कोई उनसे शत्रुता मोल लेगा तो वह घर में आकर भी मार सकते हैं।
हमारे क्रांतिकारियों का यह कृत्य किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध किया गया कृत्य नहीं था, यह उस दूषित और दुर्गन्धित व्यवस्था के विरुद्ध खुला विद्रोह था जो अत्याचार की प्रतीक बन चुकी थी। यह उस तानाशाही के विरुद्ध किया गया कार्य था जिसने हमारी स्वाधीनता को हड़प लिया था और जिसका भारत में रहना हमारे आत्मसम्मान को अखरता था। यह उस गली सड़ी व्यवस्था के विरुद्ध किया गया विडियो था जिसमें रहना किसी भी आत्मसम्मान रखने वाले व्यक्ति के लिए संभव नहीं था।
न्यायालय के समक्ष मदनलाल ढींगरा ने अपने इस कृत्य को उचित और न्याय संगत सिद्ध करने का प्रयास किया, परंतु अत्याचारी ब्रिटिश सरकार ने उन्हें २४ वर्ष की आयु में ही फांसी पर लटका दिया। इस महान क्रांतिकारी युवा ने फांसी पर झूलते हुए भी अंतिम शब्द ' वंदे मातरम' ही बोला था।
जिनेवा से ' वंदे मातरम ' का प्रकाशन
मैडम भीकाजी कामा विदेश में रहकर भारत के क्रांतिकारी आंदोलन के लिए बहुत महत्वपूर्ण कार्य कर रही थीं। भारत के प्रति उनका विशेष लगाव था। ' वंदे मातरम ' के प्रति उनका समर्पण देखते ही बनता था। उन्होंने अपने कुछ अन्य क्रांतिकारी साथियों के साथ मिलकर जिनेवा से एक क्रांतिकारी पत्रिका का प्रकाशन आरंभ किया था। जिसका नाम उन्होंने " वंदे मातरम " रखा था। इससे पता चलता है कि ' वंदे मातरम' उस समय न केवल भारतवर्ष के भीतर अपितु भारतवर्ष के बाहर भी क्रांतिकारियों के लिए बहुत ही अधिक सम्मान और श्रद्धा का केंद्र बन गया था।
इस पत्रिका के माध्यम से भारत के क्रांतिकारी आंदोलन के संदेश विदेश में कार्यरत क्रांतिकारियों के पास पहुंचाने में बड़ी सुविधा होती थी। इसमें प्रकाशित होने वाले लेख लोगों को झकझोर डालते थे। इस पत्रिका का प्रकाशन १९०९ में आरंभ किया गया था। यह वही कालखंड था, जब भारत में अंग्रेज सरकार ' वंदे मातरम' गाने वालों पर कठोर कार्यवाही करती थी और उसे राजद्रोह समझा जाता था। जिस कालखंड में ' वंदे मातरम' के बारे में सोचना भी अपराध था, उस समय विदेश में रहकर किसी पत्रिका का प्रकाशन आरंभ करना सचमुच एक अनुकरणीय और साहसिक कार्य था।
यह और भी अधिक ध्यान देने योग्य तथ्य है कि इस पत्रिका को भारतवर्ष में जन्मे क्रांतिकारी नहीं बल्कि मैडम भीकाजी कामा जैसी भारत भक्त विदेशी वीरांगना चला रही थी।
इस पत्रिका के माध्यम से क्रांतिकारी बलिदानियों को भी स्मरण किया जाता था। विशेष रूप से मदनलाल ढींगरा जैसे उन क्रांतिकारियों पर विशेष लेख प्रकाशित होते थे, जिन्होंने देश के लिए बलिदान दिये थे। यह इसलिए किया जाता था कि ' वंदे मातरम' के माध्यम से देश का युवा वर्ग अपने देश की स्वाधीनता के लिए प्रेरणा प्राप्त करे और ' वंदे मातरम' के महत्व को भी ग्रहण करे। इस प्रकार ' वंदे मातरम' ( पत्रिका ) ' वंदे मातरम' अर्थात देशभक्त लोगों के द्वारा ' वंदे मातरम' अर्थात देशभक्त लोगों के लिए चलाया गया एक देशभक्ति पूर्ण अभियान था। इस पत्रिका ने विदेशों में भारत के क्रांतिकारी आंदोलन के विस्तार में महत्वपूर्ण योगदान दिया। लोग एक दूसरे के संपर्क में आए और बड़ी सहजता से एक दूसरे के भावों को समझ सके। इसके अतिरिक्त भारत के स्वाधीनता आंदोलन के लिए एक रोडमैप तैयार करने में भी उन्हें सुविधा अनुभव हुई।
श्यामजी कृष्ण वर्मा और ' वंदे मातरम '
१८५७ की क्रांति जब हमारे देश को आंदोलित कर रही थी और स्वाधीनता के लिए पूरा देश क्रांति-पथ पर नए-नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा था, तब ४ अक्टूबर १८५७ को गुजरात प्रान्त के माण्डवी कस्बे में श्याम जी कृष्ण वर्मा का जन्म हुआ। उनके पिता का नाम श्रीकृष्ण वर्मा था। पेशे से वह अधिवक्ता थे। हम सभी जानते हैं कि अधिवक्ता वर्ग ने भारत के स्वाधीनता संग्राम में बहुत महत्वपूर्ण योगदान दिया था। इसके कई कारण रहे। पहला तो यह कि अधिवक्ता वर्ग बहुत अधिक जागरूक होता है। दूसरे उसे कानून की भी जानकारी होती है। इसलिए वह बड़ी सहजता से आंदोलन की नीति, रणनीति और परिणति को समझ लेता है। अधिवक्ता होने के कारण श्याम जी कृष्ण वर्मा जी को ब्रिटिश प्रशासनिक व्यवस्था की भी जानकारी थी। तीसरे, जनसाधारण को ब्रिटिश अधिकारियों के सामने बोलने में हिचक होती थी, जबकि अधिवक्ता वर्ग उनके सामने बेहिचक होकर बोल सकता था। अधिकांश अधिवक्ताओं को जनसभाओं को संबोधित करने में भी किसी प्रकार का संकोच नहीं होता । स्वाधीनता आंदोलन के समय जनसभाओं को संबोधित करना और लोगों को सही मार्गदर्शन देना भी नेता की एक विशेष कला मानी जाती थी। जिसे अधिवक्ता वर्ग से जुड़ा हुआ हर व्यक्ति पूर्ण कर सकता था।
श्याम जी कृष्ण वर्मा अधिवक्ता और वक्ता दोनों ही थे। १८८८ में उन्होंने अजमेर से अपना विधि व्यवसाय आरंभ किया था। इसी समय उन्होंने देश के क्रांतिकारी आंदोलन के साथ जुड़कर देश की स्वाधीनता अर्थात स्वराज के लिए काम करने का भी निर्णय लिया। १८८८ से ३ वर्ष पहले ही कांग्रेस की स्थापना हुई थी, परंतु कांग्रेस अभी भी जन सामान्य के लिए एक अपरिचित संगठन था। देश की स्वाधीनता के लिए काम करने वाले अधिकांश युवाओं को यह विश्वास नहीं था कि ये संगठन देश की स्वाधीनता के लिए काम करने के लिए जन्मा है। इसलिए क्रांतिकारी उपायों के माध्यम से देश को स्वाधीनता दिलाने वाले क्रांतिकारी युवा कांग्रेस की ओर न देखकर क्रांतिकारी संगठनों की ओर देखते थे।
श्याम जी कृष्ण वर्मा और स्वामी दयानंद
श्याम जी कृष्ण वर्मा जैसा कर्मठ क्रांतिकारी कांग्रेस की ओर जाएगा - यह सोचा भी नहीं जा सकता था। यही कारण था कि उन्होंने कांग्रेस की विचारधारा में विश्वास न रखकर देश के क्रांतिकारी जननायक लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की क्रांतिकारी विचारधारा से जुड़ना अच्छा समझा। इससे भी बड़ी बात यह थी कि वे १८५७ की क्रांति के सूत्रधार स्वामी दयानंद जी महाराज के विचारों से और भी अधिक प्रभावित थे। स्वामी दयानंद जी महाराज के बारे में यह बात पूर्णतया सत्य है कि जो कोई उनके संपर्क में आया या उनकी विचारधारा से प्रभावित हुआ वह किसी भी प्रकार की दोगली विचारधारा को स्वीकार करने के लिए कदापि तैयार नहीं होता था। उसके भीतर स्पष्टवादिता और निर्भीकता का भाव कूट-कूटकर भरा होता था । यही साहसी व्यक्तित्व के स्वामी थे। ' वंदे मातरम' का पवित्र भाव उनके भीतर रच बस गया था। वह उसी के लिए जीते थे और उसी के लिए कार्य करते थे।
दो रियासतों के रहे दीवान
श्याम जी कृष्ण वर्मा मध्य प्रदेश की रतलाम और गुजरात की जूनागढ़ रियासत में दीवान के पद पर तैनात रहे थे। दीवान का पद उन दिनों बहुत महत्वपूर्ण होता था। उसके पास विशेष अधिकार भी होते थे। कोई सामान्य व्यक्ति उन अधिकारों के आकर्षण में स्वयं ही बंध जाता था। उस आकर्षण से फिर वह कभी बाहर नहीं निकल पाता था, परन्तु इस प्रकार के आकर्षण महापुरुषों पर कभी प्रभाव नहीं डाल पाते हैं। यही कारण था कि श्याम जी कृष्ण वर्मा दो रियासतों के दीवान होकर भी आजादी के दीवाने बने रहे। वह दीवान जी तो थे परंतु दीवानगी भी उन पर सवार थी और उस ' दीवानगी' ने ही उनको ' श्याम जी कृष्ण वर्मा' बनाया। यही कारण है कि अपने विशिष्ट व्यक्तित्व के कारण वह है भारतवर्ष के युवाओं के आज तक भी मार्गदर्शक हैं। यह वही दौर था, जब देश में अंग्रेजों के विरुद्ध ' वंदे मातरम ' का नारा सर्वत्र गूंजता था और उसकी गूंज से चारों ओर देशभक्ति का बसंती रंग बिखर जाता था।
इस बसंती रंग ने हमारे हजारों क्रांतिकारियों को देश धर्म पर मरने की और शत्रुओं को मारने की प्रेरणा दी थी। कुछ लोगों को इस बात पर आपत्ति होती है कि देश धर्म के लिए मरना तो ठीक है परंतु मारने की बात करना अहिंसा के देश भारत में उचित नहीं है। ऐसे लोगों से हम कहना चाहेंगे कि जिस प्रकार ब्राह्मण का धर्म दान लेना और दान देना दोनों है, उसी प्रकार देश- धर्म पर मिटने वाले वीर वीरांगनाओं का धर्म देश के लिए मरना भी है और देश के लिए किसी को मारना भी है। जो देश पर मरना जानता है, वह देश के लिए किसी को मारना भी जानता है। उसकी बुद्धि इतनी सूक्ष्म, पवित्र, निर्मल और निर्णय लेने में पारंगत हो जाती है कि 'किसको मारना है' - यह भी वह भली प्रकार जान जाता है। इसका बोध हर किसी को नहीं होता है, परंतु जिसको होता है वह कोई सामान्य व्यक्तित्व नहीं होता । हमारे इस महान क्रांतिकारी श्याम जी कृष्ण वर्मा ने कर्जन वायली को मारने के लिए चुना तो यह चुनाव ऐसे ही नहीं कर लिया था ,उनकी सूक्ष्म बुद्धि ने यह भली प्रकार जान लिया था कि यह ब्रिटिश अधिकारी किस प्रकार भारत के लिए शत्रुतापूर्ण कार्य कर रहा था ? हम सभी जानते हैं कि इस अधिकारी का काम तमाम मदनलाल ढींगरा ने किया था।
श्याम जी कृष्ण वर्मा जी ने दो रियासतों का दीवान रहते हुए भी जन कल्याण के अनेक कार्य किए थे। यह भी तभी संभव होता है , जब व्यक्ति के भीतर राष्ट्र प्रेम की भावना होती है। अपने समाज को,अपने राष्ट्र को और स्वदेश को उन्नति के पथ पर डालने का पवित्र भाव होता है। अपनी इसी पवित्र भावना के कारण वह क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग ले रहे थे। 'वंदे मातरम' ने उनके इस प्रकार के क्रांतिकारी विचारों में और तड़का लगा दिया था। जिससे उनका जीवन और भी अधिक निखर गया।
श्याम जी कृष्ण वर्मा का बौद्धिक भी बहुत ऊंचे स्तर का था। लोग उनकी विद्वत्ता का लोहा मानते थे। यही कारण था कि उन्होंने १९१८ के बर्लिन और इंग्लैंड में हुए विद्या सम्मेलनों में भारत देश का प्रतिनिधित्व करने का गौरव प्राप्त किया था।
विदेश में रहते हुए निकाला समाचार पत्र
उन दिनों सोशल मीडिया या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया नहीं होती थी। अपनी बात को दूसरों तक पहुंचाने का उचित माध्यम समाचार पत्र और पत्रिकाएं ही होती थीं। अधिकांश समाचार पत्र ऐसे थे, जिन पर ब्रिटिश सरकार का पहरा लगा रहता था। जिसके कारण क्रांतिकारियों के विचारों को जनता तक पहुंचने नहीं दिया जाता था। ब्रिटिश सरकार इस बात का पूर्ण प्रबंध करती थी कि किसी भी क्रांतिकारी का कोई समाचार या कोई लेख किसी समाचार पत्र में छपने ना पाए। यही कारण था कि हमारे अधिकांश स्वतंत्रता सेनानियों और विशेष रूप से क्रांतिकारियों ने अपनी बातों को और अपनी विचारधारा को जनसामान्य तक पहुंचाने के लिए समाचार पत्र - पत्रिकाओं का प्रकाशन स्वयं अपने स्तर पर करना उचित माना था। इसके लिए भी उन्हें विशेष परिश्रम करना पड़ता था , क्योंकि उनके पास अपने छापेखाने नहीं होते थे।
बहुत अधिक धन खर्च करके पत्र पत्रिकाएं प्रकाशित की जाती थीं।
अत: यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि हमारे क्रांतिकारियों को उस समय पत्र- पत्रिकाओं के प्रकाशन के लिए कितना संघर्ष करना पड़ता था ? इसके उपरांत भी अधिकांश क्रांतिकारियों ने अपने-अपने समाचार पत्र पत्रिकाएं प्रकाशित किये। श्याम जी कृष्ण वर्मा जी ने भी १९०५ में इंग्लैंड से अपना समाचार पत्र "द इंडियन सोशियोलॉजिस्ट " ( मासिक ) निकालना आरंभ किया था।
इस समाचार पत्र का उद्देश्य क्रांतिकारियों की गतिविधियों को दूर-दूर तक पहुंचाना था। कई बार अंग्रेजी सरकार हमारे क्रांतिकारियों को बदनाम करने के लिए उन पर झूठे आरोप लगा दिया करती थी। उनके विरुद्ध दुष्प्रचार किया करती थी और उनके चाटुकार समाचार पत्र - पत्रिकाएं उस दुष्प्रचार को और अधिक हवा दिया करते थे। उसका सामना करने के लिए भी हमारे क्रांतिकारियों के पास अपने समाचार पत्र- पत्रिकाओं का होना आवश्यक था। इन सब बातों के दृष्टिगत ही श्याम जी कृष्ण वर्मा जी ने अपना उपरोक्त समाचार पत्र प्रकाशित करना आरंभ किया था। जिसके बड़े सकारात्मक परिणाम आए। इसी समाचार पत्र को कालांतर में श्याम जी कृष्णा वर्मा जी ने जिनेवा से प्रकाशित करना आरंभ कर दिया था ।
इंग्लैंड में ' इंडिया हाउस' की स्थापना करने में भी उनका विशेष योगदान था। यहां पर अनेक भारतीय विद्यार्थी एकत्रित होकर भारत की स्वाधीनता पर चिंतन मंथन किया करते थे। इस प्रकाश श्याम जी कृष्ण वर्मा जी के परिश्रम, त्याग, तपस्या और पुरुषार्थ से विदेशों में भारतीय स्वाधीनता आंदोलन और ' वंदे मातरम' का जमकर प्रचार प्रसार हुआ।
( लेखक डॉ राकेश कुमार आर्य सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं )
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