पुनरुद्धार की बाट जोहती चंद्रभागा नदी

✍️ आर.के. सोनी
चंद्रभागा नदी—जिसे क्षेत्रीय स्तर पर चन्हा नदी के नाम से भी जाना जाता है—आज अपने अस्तित्व के सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। कभी जीवनदायिनी रही यह नदी आज अतिक्रमण, औद्योगिक प्रदूषण, घटती वर्षा और मानवीय उदासीनता के कारण विलुप्ति के कगार पर पहुँच चुकी है। बिहार, झारखंड और राजस्थान के विभिन्न हिस्सों में बहने वाली यह ऐतिहासिक नदी मानो अपने उद्धारक की राह देख रही है।
बिहार की चंद्रभागा : एक मरणासन्न धरोहर
यदि बिहार की बात करें तो चंद्रभागा नदी मुख्यतः बेगूसराय, समस्तीपुर और खगड़िया जिलों से होकर गुजरती है। कभी बखरी नगर की जीवनरेखा कही जाने वाली यह नदी आज पानी की भारी कमी और अतिक्रमण के कारण इतिहास बनने की ओर अग्रसर है। नदी के तल पर दर्जनों घर, खेत और स्थायी निर्माण खड़े हो चुके हैं, जिससे इसका प्राकृतिक प्रवाह पूरी तरह बाधित हो गया है।
गढ़पुरा और कुम्हारसों पंचायत क्षेत्रों में लगभग 50–60 बड़े मकान नदी के भीतर ही बना दिए गए हैं। परिणामस्वरूप, बरसात का पानी भी नदी में समुचित रूप से प्रवाहित नहीं हो पाता। हालांकि, कुछ गहरे हिस्सों में आज भी पानी जमा रहता है, जो इस बात का संकेत है कि यदि समय रहते प्रयास किए जाएँ तो नदी को पुनर्जीवित किया जा सकता है।
पर्यावरणीय असंतुलन और जैव विविधता पर संकट
चंद्रभागा नदी के मृतप्राय होने से न केवल स्थानीय जनजीवन प्रभावित हुआ है, बल्कि क्षेत्रीय पर्यावरण संतुलन और जैविक विविधता को भी गंभीर क्षति पहुँची है। नदी के सूखने से भूजल स्तर गिरा है, खेती प्रभावित हुई है और पारंपरिक जीवनशैली धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है।
पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व
चंद्रभागा नदी का महत्व केवल भौगोलिक ही नहीं, बल्कि पौराणिक और सांस्कृतिक भी है। सर्वमंगला अध्यात्म योग विद्यापीठ, सिमरियाधाम (बेगूसराय) के संस्थापक संत करपात्री अग्निहोत्री परमहंस स्वामी चिदात्मन जी महाराज के अनुसार, ब्रह्मवैवर्त पुराण में चंद्रभागा नदी का उल्लेख मिलता है। ग्रंथों में वर्णित है कि कमल दलों से भरे सरोवर के मध्य जयमंगला माता का स्थान है और उसके उत्तर दिशा में चंद्रभागा नदी प्रवाहित होती है।
गढ़पुरा में चंद्रभागा नदी के तट पर स्थित बाबा हरिगिरी धाम का पौराणिक शिव मंदिर इस नदी की प्राचीनता का जीवंत प्रमाण है। स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, इसका इतिहास नटुवा दयाल सिंह और बहुरा मामा के कालखंड से भी जुड़ा हुआ है। वैदिक काल के ग्रंथों और पंचांगों में भी इस नदी की विस्तृत चर्चा मिलती है। कभी यही नदी अंतिम संस्कार जैसे धार्मिक कार्यों का प्रमुख स्थल हुआ करती थी।
नदी-जोड़ो परियोजना : आशा की किरण
यदि समाधान की दिशा में दृष्टि डालें, तो तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा परिकल्पित नदी-जोड़ो परियोजना आज भी आशा की एक मजबूत किरण बन सकती है। इसी योजना के तहत कावर झील के माध्यम से गंडक नदी से चंद्रभागा को जोड़ने का प्रस्ताव था, ताकि इसमें निरंतर जल प्रवाह सुनिश्चित किया जा सके। दुर्भाग्यवश, वर्षों बीत जाने के बावजूद यह योजना आज तक धरातल पर उतरती नहीं दिख रही है।
अटल बिहारी वाजपेयी का यह दूरदर्शी सपना—देश की नदियों को आपस में जोड़कर जल संकट और बाढ़ की समस्या का समाधान—आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में मूर्त रूप लेता दिखाई दे रहा है। मध्यप्रदेश में केन–बेतवा नदी जोड़ो परियोजना का शिलान्यास इसी दृष्टिकोण का प्रमाण है। ऐसे में समस्तीपुर, बेगूसराय और खगड़िया के लोगों की निगाहें केंद्र और राज्य सरकार पर टिकी हैं कि चंद्रभागा नदी के पुनरुद्धार की दिशा में भी ठोस कदम उठाए जाएँ।
जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी
चंद्रभागा नदी चार संसदीय क्षेत्रों—समस्तीपुर, उजियारपुर, बेगूसराय और खगड़िया—से होकर गुजरती है। इन क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व भाजपा और लोजपा (रामविलास) के सांसद कर रहे हैं, जिनमें केंद्रीय मंत्री भी शामिल हैं। ऐसे में यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि जनप्रतिनिधि केंद्र और राज्य स्तर पर समन्वित पहल कर इस ऐतिहासिक नदी को पुनर्जीवित करने के लिए गंभीर प्रयास करें।
कावर झील और चंद्रभागा का संबंध
बेगूसराय स्थित कावर झील-एशिया की सबसे बड़ी मीठे पानी की गोखुर झील और 2020 में घोषित रामसर स्थल भी आज जल संकट और अतिक्रमण से जूझ रही है। यह झील बूढ़ी गंडक नदी की पुरानी धारा से बनी अवशिष्ट जलराशि मानी जाती है। यदि कावर झील और चंद्रभागा नदी को वैज्ञानिक ढंग से जोड़ा जाए, तो दोनों का संरक्षण संभव है।
अब भी बच सकती है चंद्रभागा
मानसून के बाद बिहार की कई नदियों का सूखना चिंता का विषय बन चुका है। चंद्रभागा नदी भी इसी त्रासदी का शिकार है। आज भी बखरी क्षेत्र में यह नदी किसी तरह अपने अस्तित्व को बचाए हुए है, लेकिन उसे स्वयं एक उद्धारक की तलाश है।
निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि
संक्षेप में, चंद्रभागा नदी अपने हजारों वर्षों के इतिहास, पौराणिक महत्व और सामाजिक उपयोगिता के बावजूद आज मानवीय लापरवाही का शिकार बन चुकी है। यदि शीघ्र ही अतिक्रमण हटाने, जल स्रोतों के पुनर्भरण और नदी-जोड़ो परियोजना जैसे ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह नदी वास्तव में केवल इतिहास के पन्नों में सिमटकर रह जाएगी।
समय की मांग है कि सरकार, प्रशासन, जनप्रतिनिधि और समाज मिलकर इस ऐतिहासिक धरोहर को बचाने के लिए आगे आएँ—ताकि चंद्रभागा फिर से कल-कल बह सके और आने वाली पीढ़ियों को जीवन दे सके।
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