रिश्ते के रास्ते
अरुण दिव्यांशरिश्ते के रास्ते चलो रे प्राणी ,
निर्मल हृदय मृदुल ले वाणी ,
सद्भाव मिले इस राह मानव ,
श्वान सा मत बन तू घ्राणी ।
मानवता से रिश्ता तू जोड़ ले ,
कृतघ्नता से मुॅंह तू मोड़ ले ,
मानव बन जा तू मानव प्यारे ,
दुष्कर्मों से नाता तू तोड़ ले ।
बॅंध जा रिश्तों के ही डोर में ,
मत जा तू अहंकारी शोर में ,
मिटने दे तू यह मध्य निशा ,
फिर जग जाना तू भोर में ।
मानव का तुम मान रख लो ,
मानवता का ध्यान रख ले ,
सनातन में तू जन्म लिए हो ,
सनातन का तू भान रख ले ।
रिश्ते के रास्ते हैं हरि मिले ,
हरि बिन हीरे का क्या मोल ,
रिश्ते के रास्ते नहीं हैं रिसते ,
निज को पलड़े पे तू तोल ।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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