Advertisment1

यह एक धर्मिक और राष्ट्रवादी पत्रिका है जो पाठको के आपसी सहयोग के द्वारा प्रकाशित किया जाता है अपना सहयोग हमारे इस खाते में जमा करने का कष्ट करें | आप का छोटा सहयोग भी हमारे लिए लाखों के बराबर होगा |

तीर्थराज प्रयाग में माघ मास का आध्यात्मिक और ऐतिहासिक महाविस्तार

तीर्थराज प्रयाग में माघ मास का आध्यात्मिक और ऐतिहासिक महाविस्तार

सत्येन्द्र कुमार पाठक
प्रस्तावना: काल-गणना का सबसे पावन क्षण भारतीय वास्तुकला, दर्शन और अध्यात्म का यदि कोई एक केंद्र बिंदु ढूँढना हो, तो वह 'प्रयागराज का संगम' है। हिंदू पंचांग के अनुसार, ग्यारहवां चंद्रमास—माघ—केवल एक समयखंड नहीं है, बल्कि यह वह संधि-काल है जब आकाश से देवता स्वयं मृत्युलोक की ओर आकर्षित होते हैं। शास्त्रों में वर्णित 'माधव' मास का यह समय तप, त्याग और तितिक्षा की पराकाष्ठा है। 2025 का महाकुंभ इसी महान परंपरा की एक ऐसी कड़ी रहा है, जिसने आधुनिक विश्व को भारत की प्राचीन सनातन शक्ति से परिचय कराया।
मघा नक्षत्र और खगोलीय महत्व माघ मास का नामकरण पूर्णतः खगोलीय गणना पर आधारित है। जिस माह की पूर्णिमा को चंद्रमा 'मघा' नक्षत्र में स्थित होता है, वह माघ कहलाता है। मघा नक्षत्र के अधिष्ठाता देव 'पितृ' हैं। यही कारण है कि इस मास में संगम तट पर अपने पूर्वजों के निमित्त पिंडदान और तर्पण करने से उन्हें अक्षय तृप्ति प्राप्त होती है। उत्तरायण का प्रारंभ: मकर संक्रांति के साथ सूर्य उत्तरायण होता है। वैज्ञानिक दृष्टि से यह समय संक्रमण का होता है, जहाँ प्रकृति अपनी शीतलता त्यागकर नई ऊर्जा ग्रहण करती है। धार्मिक दृष्टि से इसे 'देवताओं का प्रभात' कहा जाता है, जिसमें किया गया कोई भी शुभ कार्य अनंत गुना फल प्रदान करता है।
भारतीय मनीषा ने चारों युगों में माघ मास की महिमा को अलग-अलग रूपों में स्वीकार किया है: सतयुग और त्रेता: इन युगों में मनुष्य की आयु और शक्ति अपार थी, अतः माघ में वर्षों तक जल में खड़े रहकर 'कठोर तप' का विधान था।
द्वापर युग: द्वापर में यह तपस्या 'माधव पूजा' और भक्ति में बदली। भगवान कृष्ण के सानिध्य में यमुना-गंगा के तटों पर आराधना का महत्व बढ़ा। कलियुग: वर्तमान युग में, जहाँ मनुष्य का जीवन संघर्षपूर्ण है, वहां ऋषियों ने इसे सुलभ बनाया। कलियुग में केवल 'नाम-संकीर्तन, दान और स्नान' को ही समस्त अश्वमेध यज्ञों के बराबर पुण्यदायी बताया गया है। "माघे निमग्ना: सलिले सुशीते..."—यह उक्ति इस युग का सबसे बड़ा सत्य है।
2025 का महाकुंभ केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि एक जीवंत इतिहास था। जब हम संगम घाट (गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के मिलन स्थल) पर खड़े होते हैं, तो वहां केवल जल नहीं बहता, वहां भारत का गौरव बहता है।
व्यक्तिगत अनुभव: 2025 के उस कड़ाके की ठंड में, जब पहली बार संगम के जल को छुआ, तो शरीर की सारी थकान एक पल में गायब हो गई। वह डुबकी केवल शारीरिक नहीं थी; वह मन के विकारों को धोने वाली थी। एक ओर गंगा की श्वेत धारा, दूसरी ओर यमुना का श्याम जल, और नीचे से उठती सरस्वती की ज्ञानमयी ऊर्जा। अमृत योग: 2025 में ग्रहों की वह विशेष स्थिति (गुरु का वृषभ राशि में और सूर्य का मकर में प्रवेश) ने संगम के जल को औषधीय और आध्यात्मिक रूप से 'अमृत' बना दिया था। माघ मेले की सबसे अनूठी परंपरा 'कल्पवास' है। यह 30 दिनों का एक ऐसा अनुष्ठान है जो मनुष्य को भीतर से बदल देता है। : कल्पवासी फूस की झोपड़ियों (पर्णकुटी) में रहते हैं। वे जमीन पर सोते हैं और दिन में केवल एक बार सात्विक भोजन करते हैं।।आध्यात्मिक मनोविज्ञान: एक महीने तक मोह-माया और भौतिक सुखों से दूर रहकर संगम तट पर निवास करना व्यक्ति को आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाता है। यह विश्व का सबसे बड़ा 'अनुशासित जीवन' का प्रयोग है।
प्रयागराज के मंदिरों का वैभव और पौराणिक साक्ष्य में संगम स्नान तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक प्रयाग के अधिष्ठाता देवों के दर्शन न कर लिए जाएं: लेटे हुए हनुमान जी (बड़े हनुमान): किले के पास स्थित यह मंदिर विश्व में अद्वितीय है। हनुमान जी की विश्राम मुद्रा यह संदेश देती है कि कठिन संघर्ष (लंका विजय) के बाद प्रभु की शरण में विश्राम ही वास्तविक शांति है। पातालपुरी और अक्षयवट: इलाहाबाद किले के भीतर स्थित ये स्थान रामायण काल के साक्षी हैं। अक्षयवट वह वृक्ष है जिसे प्रलय भी नष्ट नहीं कर सकता। अलोपी देवी: 51 शक्तिपीठों में से एक, जहाँ कोई मूर्ति नहीं बल्कि एक पालना पूजनीय है। यह देवी के उस स्वरूप का प्रतीक है जो 'अलोप' (अदृश्य) होकर भी सृष्टि का संचालन करती हैं। वेणी माधव: दारागंज में स्थित यह मंदिर प्रयाग के नगर देवता का है। माना जाता है कि बिना इनके दर्शन के माघ स्नान का पुण्य अधूरा रहता है।
आस्था के मील के पत्थर माघ मास पर्वों का एक ऐसा गुलदस्ता है जिसमें हर तिथि का अपना महत्व है: मकर संक्रांति: सूर्य का राशि परिवर्तन और खिचड़ी दान का पर्व। मौनी अमावस्या: 2025 में इस दिन संगम पर जो जनसैलाब उमड़ा, वह भक्ति की पराकाष्ठा थी। मौन रहकर अपनी आंतरिक शक्ति को पहचानना ही इसका मुख्य उद्देश्य है। बसंत पंचमी: ज्ञान की देवी सरस्वती का पूजन और वसंत के आगमन का उत्सव। माघी पूर्णिमा: कल्पवास की विदाई का दिन, जब भक्त भारी मन से लेकिन पवित्र आत्मा के साथ अपने घरों को लौटते हैं। सम्राट हर्षवर्धन से आधुनिक युग तक इतिहासकारों ने प्रयाग के माघ मेले को भारत की एकता का सूत्र माना है।
सम्राट हर्षवर्धन (7वीं शताब्दी): चीनी यात्री ह्वेनसांग ने लिखा था कि हर्षवर्धन हर पांच साल में यहां आते थे और अपना सर्वस्व—राजकोष से लेकर अपने पहने हुए वस्त्रों तक—दान कर देते थे। मुगलों ने इसे 'इलाहाबाद' नाम दिया लेकिन यहां की तीर्थ-चेतना को नहीं दबा सके। अंग्रेजों ने इस मेले को नियंत्रित करने के लिए 'चौकीदारी' और 'टैक्स' लगाए, लेकिन साधु-संतों और आम जनता की आस्था के आगे उन्हें झुकना पड़ा।माघ मास में दान केवल पुण्य के लिए नहीं, बल्कि समाज के प्रति हमारी जिम्मेदारी का प्रतीक है। तिल, गुड़, कंबल, खड़ाऊं और अन्न का दान यह सुनिश्चित करता है कि कड़ाके की ठंड में समाज का कोई भी व्यक्ति भूखा या वस्त्रहीन न रहे। यह 'नर सेवा ही नारायण सेवा' का साक्षात् उदाहरण है।।एक शाश्वत यात्रा 2025 के महाकुंभ में लगाई गई डुबकी आज भी मेरे भीतर हिलोरें मार रही है। संगम की चलने वाले प्रवचन और वह 'हर-हर गंगे' का उद्घोष—ये सब केवल यादें नहीं हैं, बल्कि एक जीवन जीने का तरीका हैं। माघ मास हमें सिखाता है कि जीवन बहती हुई नदी की तरह है; उतार-चढ़ाव आएंगे, लेकिन यदि हम अपनी संस्कृ और विश्वास के संगम पर टिके रहे, तो मोक्ष निश्चित है। 2025 का वह अनुभव मुझे यह विश्वास दिलाता है कि भारत की सनातन परंपरा कभी समाप्त नहीं हो सकती, क्योंकि यह हर साल संगम की रेती पर नए सिरे से पुनर्जीवित होती है। प्रयागराज का संगम घाट केवल एक भौगोलिक बिंदु नहीं है, यह भारत के हृदय की धड़कन है। यदि आपने यहाँ डुबकी लगाई है, तो आप उस विरासत के उत्तराधिकारी बन गए हैं जो हजारों वर्षों से अबाध चली आ रही है।


हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews #Divya Rashmi News, #दिव्य रश्मि न्यूज़ https://www.facebook.com/divyarashmimag

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ