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नथन कनवाई संग्राम

नथन कनवाई संग्राम

- मनोज कुमार मिश्र
देश मे सनातन के विरोध में जितनी भी आवाजें विपक्षी दल उठा रहे हैं उतना ही सनातन के प्रति देशवासियों की निष्ठा बढ़ रही है। हालिया मद्रास के हाई कोर्ट ने एक शानदार निर्णय सुनाते हुए कहा कि इस देश के नायकों का सम्मान होना ही चाहिए। बात *नथन कनवाई युद्ध* के नायकों की याद में एक स्तूप बनाने के विवाद में सरकार द्वारा अड़ंगा डालने के कारण हुआ। ठीक वैसे ही जैसे *थिरूपरान कुन्दरम* पर कार्तिक दीपोत्सव न होने देने के राजहठ के कारण हुआ। स्तूप एक निजि पट्टे की जमीन पर बनना था पर लोगों ने पटवारी से इजाजत मांग ली। फिर क्या था उधर से तुरत मनाही आ गयी। इस निर्णय के विरुद्ध शिव कलईमणि अम्बलम ने, जो पेशे से वकील हैं, एक याचिका मद्रास उच्च न्यायालय में डाल दी। उन्होंने नाथम के तहसीलदार द्वारा निजी पट्टा भूमि (patta land) पर स्तूप निर्माण की अनुमति न दिए जाने को चुनौती दी। हाईकोर्ट में मामला न्यायमूर्ति एस स्वामीनाथन की बेंच में लिस्ट हुआ। न्यायालय ने आदेश देते हुए कहा कि निजी पट्टा भूमि पर युद्ध नायकों को सम्मानित करने के लिए स्मारक बनाने हेतु किसी विशेष सरकारी अनुमति की आवश्यकता नहीं है। इतिहास के इस प्रसंग को किताबों में जगह नहीं दी गयी है और हम भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम जिसे अंग्रेज सिपाही विद्रोह कहते थे को ही अंग्रेजी शासन के विरुद्ध पहला युद्ध मानते है। अंग्रेजी शासन, तब ईस्ट इंडिया कंपनी की हुकूमत थी, को सनातन धर्म के देवालयों को तोड़ने और लूटने में असीम आनंद मिलता था। ऐसा ही एक मंदिर था - कोइलकुड़ का तिरुमोगुर मंदिर। इस मंदिर को कर्नल एलेक्जेन्ड़र हेरॉन ने सन 1755 में लूट लिया और अंदर की पीतल की मूर्तियां और अन्य कीमती सामानों को लेकर चल दिया। आग की तरह यह खबर चारों दिशाओं में फैल गयी। और तब हुआ वह ऐतिहासिक युद्ध जिसमें मेलूर कल्लार समुदाय के आदिवासियों ने अंग्रेजी सेना को बुरी तरह पराजित कर मूर्तियां वापस हासिल की। अदालत ने अपने निर्णय में युद्ध के ऐतिहासिक संदर्भ का उल्लेख करते हुए बताया कि 1755 में नाथम कनवाई की पहाड़ियों पर "मेलूर कल्लार समुदाय" (Melur Kallars) ने ब्रिटिश सैन्य टुकड़ी को पराजित किया था और लूटे गए मंदिर की मूर्तियों (idols) को वापस हासिल किया था। इस संघर्ष में हजारों लोगों के बलिदान की बात भी सामने आती है, जबकि ब्रिटिश पक्ष के केवल कुछ सिपाही ही जीवित बच पाए थे।
श्री एस स्वामीनाथन वही न्यायामूर्ति हैं जिनके खिलाफ विपक्षी दलों ने महाभियोग चलाने का निर्णय लिया है।
देश की सोच में सनातन को लेकर सुखद बदलाव आ रहा है जो स्वागतयोग्य है।
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