"लोक-अपवाद एवं आत्मसिद्धि का पथ"
पंकज शर्मा
आलोचना की भट्टी वह अग्नि है जिसमें व्यक्तित्व का कच्चा अयस्क तपकर स्वर्ण बनता है। लोक-अपवाद प्रायः हमें विचलित करने का प्रयास तो करता है, किंतु वही हमारी चेतना को परखने का माध्यम भी है। जो साधक आलोचना से पलायन नहीं करता, वह अपने भीतर छिपी दुर्बलताओं को पहचानकर आत्मविकास की दिशा में अग्रसर होता है। इस प्रक्रिया में अहंकार गलता है एवं विवेक निखरता है।
कर्मयोग की निर्बाध यात्रा में साधक का लक्ष्य लोक-स्वीकृति नहीं, आत्मसाक्षात्कार होता है। जब व्यक्ति अपवाद को बाधा नहीं, बल्कि अपने पथ की सार्थकता का उद्घोष मान लेता है, तब उसका कर्म साधना बन जाता है। यही दृष्टि उसे बाह्य शोर से मुक्त कर अंतःशांति एवं स्थायित्व प्रदान करती है
. "सनातन"
(एक सोच , प्रेरणा और संस्कार)
पंकज शर्मा (कमल सनातनी)
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