अब तो आ जाओ साजन,पायल बुला रही है
कुमार महेंद्रप्रीत मीत अटूट अनुपम,
हृदय अंतर बिछोह वेदना ।
विस्मृत कर निज पहचान,
शून्य ओर स्वभाव चेतना ।
छवि निहार आनंद अनुभूत,
नयनन अश्रु भुला रही है ।
अब तो आ जाओ साजन,पायल बुला रही है ।।
विश्रांति कक्ष गहन सन्नाटा,
दीपक लौ स्नेह स्नेह मंद ।
निशा जागृति स्वप्निल परे,
प्रति आहट प्रिय दर्श उमंग ।
प्रतीक्षा पल परीक्षा स्वरूप,
हिय मधुरिम स्मृति घुला रही है।
अब तो आ जाओ साजन,पायल बुला रही है ।।
अथाह धधक रहा तन मन,
वचन परिध हाव भाव ।
काया भटके गृह परिधि,
आत्मा मस्त प्रदेश छांव ।
सारे सौंदर्य श्रृंगार अधूरे,
विरह तपन रुला रही है ।
अब तो आ जाओ साजन,पायल बुला रही है ।।
विरह अंतर साधना ज्योत,
प्रिय वापसी मंगल कामना ।
हृदय पटल प्रणय निर्झर,
शीघ्र दर्शन हित आराधना ।
परिणय भावना असहज छोर,
यामिनी मिलन सेज झुला रही है ।
अब तो आ जाओ साजन,पायल बुला रही है ।।
कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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