मोह का किनारा और ज्ञान की धारा
सत्येन्द्र कुमार पाठक
शाम का समय था। डूबते हुए सूरज की लालिमा गंगा की लहरों पर झिलमिला रही थी। 8 वर्षीय डुग्गु बहुत गंभीर स्वभाव का था, जबकि 3 साल का पुच्चू और 2 साल की नन्हीं पुच्ची अपनी ही मस्ती में खोए थे। तट पर बैठे दादाजी हाथ में एक माला लिए जप कर रहे थे, लेकिन उनकी नज़रें बच्चों की गतिविधियों पर थीं। पुच्चू ने रेत का एक बहुत बड़ा ढेर बनाया और चिल्लाकर कहा, "यह मेरा महल है! कोई इसे छुएगा नहीं!" तभी नन्हीं पुच्ची ने अनजाने में अपना पैर उस पर रख दिया। पुच्चू ने उसे धक्का दिया और पुच्ची रोने लगी। डुग्गु ने बीच-बचाव किया तो पुच्चू उससे भी लड़ने लगा।।दादाजी ने जप रोका और तीनों को अपने पास बुलाया। उन्होंने पुच्चू के हाथ से रेत झाड़ते हुए कहानी शुरू की।
दादाजी बोले, "बच्चों, सामने देखो। यह नदी पहाड़ों से निकली है। इसकी वृत्ति (Natural Instinct) है—चलते रहना। यह जब तक चलती है, इसका जल मीठा है। यह प्यासे की प्यास बुझाती है, खेतों को सींचती है। यह नहीं पूछती कि पानी पीने वाला कौन है। इसकी पहचान इसका 'मीठापन' है। लेकिन जैसे ही यह सागर में मिलती है, इसका अस्तित्व खत्म हो जाता है। यह खारी हो जाती है। इंसान का स्वभाव भी ऐसा ही होना चाहिए—दूसरों के काम आना, जब तक कि वह अनंत में न मिल जाए।"
डुग्गु ने पूछा, "लेकिन दादाजी, नदी तो सागर में मिलकर खो जाती है, फिर मीठा रहने का फायदा क्या?" दादाजी ने मुस्कुराकर कहा, "यही तो त्याग है। मिटकर भी दूसरों को तृप्त करना ही सच्ची वृत्ति है।"
दादाजी ने पुच्चू की ओर देखा और कहा, "पुच्चू, अभी तुमने महल के लिए पुच्ची को धक्का दिया। यह तुम्हारी प्रवृत्ति (Tendency) है। आज की दुनिया में हर कोई 'अर्थ' (पैसा और सामान) के पीछे भाग रहा है। लोग परोपकार भूल गए हैं। सबको लगता है कि बस 'मैं' और 'मेरा' ही सब कुछ है। यहाँ तक कि लोग अपनों को भी दाँव पर लगा देते हैं। जब मन में केवल 'खुद के लिए जीने की चाह' होती है, तो इंसान दानव बन जाता है। जो प्रवृत्ति केवल स्वार्थ पर टिकी हो, वह अंत में दुःख ही देती है।"
पुच्चू ने सिर झुका लिया, उसे अपनी गलती का अहसास हो रहा था।
"दादाजी, लोग फिर दुखी क्यों होते हैं?" डुग्गु ने जिज्ञासा से पूछा। दादाजी का स्वर थोड़ा गंभीर हुआ, "बेटा, जब हम किसी से बहुत उम्मीद लगाते हैं और वह टूटती है, तब निवृत्ति (Detachment) का जन्म होता है। अक्सर लोग मोह के वशीभूत होकर अपनों के लिए जीते हैं, लेकिन जब वही अपने लोग स्वार्थ दिखाते हैं, तो मन खिन्न हो जाता है। इसे 'श्मशान वैराग्य' कहते हैं—जैसे श्मशान में जाकर लगता है कि सब मोह-माया है, वैसे ही दुनिया के कड़वे व्यवहार को देखकर मन संसार से हटने लगता है। इसे ही निवृत्ति कहते हैं—संसार में रहकर भी उससे निर्लिप्त रहना।"
दादाजी ने अंतिम बात कही, "समाज में कई लोग ऐसे मिलेंगे जिनकी वृत्ति उपदेश देना, धर्म और ज्ञान की बातें करना है। ऊपर से वे मसीहा लगते हैं, लेकिन पास जाकर देखो तो उनकी प्रवृत्ति भी स्वार्थ और धन (अर्थ) से भरी होती है। जो मोक्ष का रास्ता दिखाते हैं, कई बार वे खुद मोह के दलदल में फंसे होते हैं। इसलिए, किसी के बाहरी रूप पर नहीं, उसके कर्मों पर विश्वास करो।"
दादाजी ने बच्चों को समझाया कि जीवन का उद्देश्य केवल इकट्ठा करना नहीं, बल्कि साझा करना है। स्वभाव (वृत्ति) नदी सा निर्मल रखो। व्यवहार (प्रवृत्ति) में स्वार्थ को जगह मत दो।चेतना (निवृत्ति) ऐसी रखो कि संसार की माया तुम्हें दुखी न कर सके।
दादाजी की बातें सुनकर डुग्गु ने पुच्ची को गोद में उठा लिया और पुच्चू ने अपना रेत का महल तोड़कर सबको साथ मिलकर खेलने के लिए बुलाया। अब वह महल 'मेरा' नहीं, 'हमारा' था। नदी अपनी गति से बहती रही, यह सिखाते हुए कि पहचान खोने का डर उन्हें नहीं होता जिनका दिल मीठा होता है।
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