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"उत्तर का मौन"

"उत्तर का मौन"

पंकज शर्मा
मैं क्यों जी रहा हूँ—
यह प्रश्न कभी
मेरी शिराओं में
ठहरे हुए रक्त-सा
जम गया था।
न जिज्ञासा थी इसमें,
न विद्रोह—
बस एक ठंडा,
निर्विकार आश्चर्य।


दिनों की आवाजाही में
यह प्रश्न
मेरे साथ चलता रहा—
भीड़ में अकेला,
आईनों के सामने निर्वस्त्र,
और रात के अंधेरे में
अपने ही भार से
और गहरा।


मैंने जीवन से नहीं,
मृत्यु से प्रश्न किया—
कि तुम आई क्यों नहीं?
क्या मैं अयोग्य था
तुम्हारे स्पर्श के लिए,
या फिर अभी
कुछ अधूरा था
मेरे होने में?


उत्तर कहीं लिखा नहीं था—
न ग्रंथों में,
न प्रार्थनाओं में।
वह न तो वाणी था,
न संकेत।
वह बस
घटनाओं के क्रम में
चुपचाप घटता रहा।


मैं गिरा,
फिर उठा।
मैं टूटा,
पर बिखरा नहीं।
हर बार
जब लगा
अब अंत समीप है,
जीवन ने
एक और सुबह
मेरे हाथ पर रख दी।


तब समझा—
ईश्वर उत्तर नहीं देता,
वह स्थिति देता है।
वह हमें
मरने से नहीं रोकता,
बस जीते रहने का
एक और कारण
चुपचाप जोड़ देता है।


शायद मैं इसलिए जीवित हूँ
कि प्रश्न बना रहूँ,
और उत्तर
पूर्ण न हो।
क्योंकि पूर्णता
मृत्यु का ही
दूसरा नाम है,
और अपूर्णता—
जीवन की शर्त।


अब मैं नहीं पूछता
कि मैं क्यों जी रहा हूँ।
मैं बस देखता हूँ—
कि जीवन
मुझसे होकर
किस प्रश्न को
जीना चाहता है।
.
✍️ "कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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