"सार्थक जीवन का आधार: परोपकार"
पंकज शर्मा
मित्रों अर्जन एवं संचय की प्रवृत्ति मनुष्य की भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति कर उसे सामाजिक सुरक्षा तो प्रदान कर सकती है, किंतु हृदय की रिक्तता केवल सेवा से भरती है। जीविका का अर्थ मात्र अस्तित्व को बनाए रखना है, जिसके लिए सांसारिक वस्तुएँ अनिवार्य हैं। परंतु, जब हम स्वार्थ की परिधि से बाहर निकलकर दूसरों के जीवन में आशा का दीप जलाते हैं, तभी हमारा व्यक्तित्व 'जीविका' के स्तर से ऊपर उठकर 'जीवन' की सार्थकता को स्पर्श करता है।
दार्शनिक दृष्टि से देखें तो संचित साधन नश्वर हैं, जो अंततः काल के प्रवाह में विलीन हो जाते हैं। इसके विपरीत, परोपकार का सूक्ष्म प्रभाव आत्मा को वह आलोक प्रदान करता है जो मृत्यु के पश्चात भी यश रूपी शरीर से जीवित रहता है। सच्चा जीवन वह है जो मानवता के कल्याण के लिए समर्पित हो। यही वह पुण्य कर्म है जो नश्वर मनुष्य को लोक-स्मृति में अमरत्व प्रदान करता है।
. "सनातन"
(एक सोच , प्रेरणा और संस्कार) पंकज शर्मा (कमल सनातनी)
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