"क्रोध से पश्चाताप तक की यात्रा"
पंकज शर्मा
क्रोध मन की प्रथम ज्वाला है—क्षणिक, तीव्र एवं अंधी। जब विवेक इसका मार्गदर्शन नहीं करता, तब यही ज्वाला प्रतिशोध का आकार ले लेती है। प्रतिशोध न्याय का भ्रम रचता है, पर आत्मा को और अधिक बोझिल कर देता है। आध्यात्मिक दृष्टि से क्रोध अहं का विस्तार है, जो शांति को खंडित करता है एवं चेतना को संकुचित करता है।
समय के साथ प्रतिशोध अपनी ही आग में जलकर पश्चाताप बन जाता है। तब मन समझता है कि क्षमा ही वास्तविक शक्ति थी। दार्शनिक सत्य यही है कि आत्मविजय बाह्य विजय से श्रेष्ठ है। जो क्रोध को वहीं विराम दे देता है, वही जीवन को हल्का, पवित्र एवं अर्थपूर्ण बना लेता है।
. "सनातन"
(एक सोच , प्रेरणा और संस्कार) पंकज शर्मा (कमल सनातनी)
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