शरीर की वारान्टी
जय प्रकाश कुवंर
यह तन माटी का पुतला है,
कुछ बूंद पड़े गल जाएगा।
इसकी न कोई वारान्टी है,
जो फिर से बदला जाएगा।।
जिस फर्म ने इसे बनाया है,
उस फर्म की मोनोपोली है।
कुछ सूरत अद्भुत गढ़ी उसने,
कुछ चेहरे एकदम भोली है।।
जब वारान्टी गारंटी है ही नहीं,
फिर यह क्या बदला जाएगा।
घिसते पिटते कई रूप बदल,
फिर उसी फर्म में चला जाएगा।।
इस तन पर कोई गर्व न कर,
यही सत्य की इसको जाना है।
सत्कर्म कर तुम लो संवार इसे,
तन का यही विशुद्ध पैमाना है।
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