जनता का शासन - जनता के लिए - जनता द्वारा
दिव्य रश्मि के उपसम्पादक जितेन्द्र कुमार सिन्हा की कलम से |“जनता का शासन, जनता के लिए, जनता द्वारा”, यह केवल एक राजनीतिक परिभाषा नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा है। लोकतंत्र का मूल उद्देश्य सत्ता का हस्तांतरण नहीं है, बल्कि जनता को अधिकार, सम्मान और सहभागिता देना है। यदि सत्ता जनता की पीड़ा न सुने, उसकी आकांक्षाओं को न समझे और उसके समाधान के लिए संवेदनशील न हो, तो वह लोकतंत्र केवल कागजों तक सीमित रह जाता है।
लोकतंत्र को प्रायः एक शासन प्रणाली के रूप में समझा जाता है, जबकि वास्तव में यह राजनीतिक चरित्र और सत्ता की नैतिकता का प्रश्न है।“जनता का शासन, जनता के लिए, जनता द्वारा” कोई नारा नहीं है, बल्कि सत्ता के हर निर्णय पर टिकी हुई कसौटी है। आज जब लोकतंत्र दुनिया भर में संकट, ध्रुवीकरण और अविश्वास के दौर से गुजर रहा है, तब यह प्रश्न अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है कि क्या सत्ता सच में जनता को सुन रही है? क्या जनादेश के बाद भी जनता शासन का केंद्र बनी रहती है? या लोकतंत्र केवल चुनावी गणित बनकर रह जाता है?
भारत में लोकतंत्र की जड़ें आधुनिक काल की देन नहीं हैं। यह उस सभ्यता का परिणाम है, जिसने राजा से पहले समाज को, सत्ता से पहले व्यवस्था को और आदेश से पहले संवाद को महत्व दिया। इसी परंपरा का सबसे उज्ज्वल उदाहरण बिहार की धरती पर जन्मा लिच्छवी गणराज्य है।
लिच्छवी गणराज्य केवल ऐतिहासिक गौरव नहीं है, बल्कि सत्ता के केंद्रीकरण के विरुद्ध पहला राजनीतिक प्रतिरोध था। उस गणराज्य की सबसे बड़ी राजनीतिक विशेषता यह थी कि सत्ता किसी एक व्यक्ति की संपत्ति नहीं थी। निर्णय सार्वजनिक विमर्श से निकलते थे और शासक जवाबदेह था, सर्वशक्तिमान नहीं। आज के संदर्भ में यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आधुनिक लोकतंत्र में सबसे बड़ा खतरा सत्ता का केंद्रीकरण और व्यक्तिवाद है।
आज जब पश्चिमी दुनिया लोकतंत्र की जननी होने का दावा करती है, तब इतिहास साक्षी है कि लोकतांत्रिक शासन का पहला संगठित स्वरूप वैशाली में विकसित हुआ था। लिच्छवी गणराज्य में राजा नहीं, गण सर्वोच्च था। निर्णय एक व्यक्ति नहीं, सभा करती थी। सत्ता जन्म से नहीं, योग्यता से मिलती थी और शासन भय से नहीं, सम्मति से चलता था। यह व्यवस्था अपने समय से सदियों आगे थी। वहां नागरिक केवल शासित नहीं थे, बल्कि शासन के सहभागी थे।
भारतीय राजनीति में एक स्पष्ट प्रवृत्ति दिखाई देती है। चुनाव जीतना राजनीति का लक्ष्य बन गया है, शासन करना उसका दायित्व नहीं है। राजनीतिक दलों की ऊर्जा रणनीति, प्रचार, नैरेटिव, सोशल मीडिया और ध्रुवीकरण में खप जाती है, जबकि प्रशासनिक सुधार, जनसंवाद और नीति क्रियान्वयन पीछे छूट जाता है।
लोकतंत्र कोई स्थिर अवधारणा नहीं है। यह समय, समाज और स्थान के अनुसार संशोधित, परिष्कृत और विस्तारित होता रहता है। लिच्छवी गणराज्य से लेकर मौर्यकाल, गुप्तकाल, मुगल शासन, औपनिवेशिक युग, स्वतंत्र भारत और आज के डिजिटल युग तक, लोकतंत्र ने हर दौर में नया रूप धारण किया है। लेकिन एक बात स्थायी रही है जनता की सर्वोच्चता।
एक बड़ा जनादेश सत्ता को असीम शक्ति नहीं देता है, बल्कि कठोर परीक्षा में डाल देता है। राजनीतिक दृष्टि से बड़ा जनादेश तीन बातें तय करता है, जनता ने विकल्पों को परखा, उसने भरोसा जताया और उसने अपेक्षाओं का बोझ सौंपा। यदि यह बोझ संभाला नहीं गया, तो वही जनादेश सत्ता के लिए राजनीतिक संकट बन जाता है।
1947 के बाद भारत ने लोकतंत्र को केवल अपनाया नहीं है, बल्कि उसे संविधान में पिरोया है। भारतीय संविधान ने मताधिकार को सार्वभौमिक बनाया। सत्ता को सीमित किया। अधिकारों को संरक्षित किया और कर्तव्यों को परिभाषित किया है, लेकिन संविधान निर्माताओं ने यह भी समझा कि कानून तभी जीवित रहेगा जब प्रशासन संवेदनशील होगा।
बिहार केवल राजनीति का अखाड़ा नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक प्रयोगों की प्रयोगशाला रहा है। यहीं वैशाली का गणराज्य जन्मा, चाणक्य ने शासनशास्त्र लिखा, गांधी ने सत्याग्रह शुरू किया और जयप्रकाश नारायण ने “संपूर्ण क्रांति” का नारा दिया। बिहार की जनता सत्ता को केवल सहती नहीं है, बल्कि प्रश्न करती है, चुनौती देती है और दिशा तय करती है।
बिहार का हालिया जनादेश केवल संख्या का खेल नहीं था। यह स्पष्ट संकेत था कि जनता स्थिरता चाहती है, वह अराजक राजनीति से थक चुकी है और उसे परिणाम आधारित शासन चाहिए। यह जनादेश विपक्ष के लिए भी एक संदेश था कि केवल सरकार-विरोध से राजनीति नहीं चल सकती है।
एक माह पूर्व बिहार ने लोकतांत्रिक मूल्यों का ऐसा साक्ष्य प्रस्तुत किया है, जो अभूतपूर्व और ऐतिहासिक कहा जा सकता है। इतना बड़ा जनादेश केवल सत्ता समर्थन नहीं था, बल्कि विश्वास का प्रमाण, अपेक्षाओं का विस्तार और जवाबदेही की माँग भी थी। जब जनादेश बड़ा होता है, तो जनता की आकांक्षाएँ भी उतनी ही विशाल होती हैं।
लोकतंत्र में चुनाव जीतना अंतिम लक्ष्य नहीं होता है, बल्कि प्रारंभिक परीक्षा है। क्योंकि इसके बाद शुरू होती है जनता की अपेक्षाओं को समझने की प्रक्रिया। वादों को नीतियों में बदलने की चुनौती और सत्ता को सेवा में रूपांतरित करने का संघर्ष। इस पूरी प्रक्रिया की नैतिक जिम्मेदारी मुखिया पर होती है।
भारतीय संघीय ढांचे में मुख्यमंत्री की भूमिका केवल पार्टी नेता या चुनावी चेहरा भर नहीं होती है। वह होता है राज्य की प्रशासनिक रीढ़, जनता और नौकरशाही के बीच सेतु और लोकतंत्र का प्रथम संरक्षक। नीतीश कुमार की राजनीति को इसी संदर्भ में समझना होगा। नीतीश कुमार की राजनीति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह नारेबाजी से दूरी, भावनात्मक उभार से सावधानी और संस्थागत सुधार पर जोर देते रहे हैं। राजनीतिक आलोचक उन्हें अवसरवादी कह सकते हैं, लेकिन प्रशासनिक दृष्टि से उन्होंने हमेशा “राजनीति को शासन में बदलने” की कोशिश की है।
नीतीश कुमार की राजनीति की पहचान शोर से अधिक व्यवस्था, घोषणाओं से अधिक क्रियान्वयन और सत्ता से अधिक सेवा रही है। उनकी राजनीति का केंद्रीय तत्व रहा है प्रशासनिक सुधार, जवाबदेही और संस्थागत शासन। जनादेश के बाद नीतीश कुमार द्वारा की गई घोषणा केवल प्रशासनिक निर्देश नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक दर्शन का पुनर्पाठ है। सप्ताह में दो दिन, सोमवार और शुक्रवार को पंचायत से लेकर मुख्यमंत्री कार्यालय तक, जनता की समस्याओं के लिए दरवाजे केवल खुले ही नहीं रहेंगे बल्कि समाधान के साथ जनता का स्वागत होगा।
राजनीतिक विश्लेषण के स्तर पर यह घोषणा केवल शिकायत निवारण या प्रशासनिक निर्देश नहीं है। यह एक सत्ता संदेश है कि सरकार जनता से भागेगी नहीं। अफसरशाही को जनता के सामने झुकना होगा और सत्ता का चेहरा मानवीय बनेगा। भारत में लोकतंत्र और नौकरशाही के बीच हमेशा तनाव रहा है। नौकरशाही नियम देखती है। जनता समाधान चाहती है और राजनीति बीच में फंस जाती है। यह घोषणा इस संतुलन को जनता के पक्ष में झुकाने का प्रयास है।
यह घोषणा यदि सही अर्थों में लागू होती है, तो यह अफसरशाही की मानसिकता बदलेगी “फाइल संस्कृति” से “समाधान संस्कृति” की ओर ले जाएगी, जनता और प्रशासन के बीच भरोसे की खाई पाटेगी। अक्सर लोकतंत्र में अधिकारों की बात होती है, लेकिन सम्मान की बात छूट जाती है। यह निर्देश है कि “कर्मचारी जनता का स्वागत, आदर और सम्मान करेंगे”। यह लोकतंत्र के मानवीय पक्ष को पुनर्जीवित करता है।
यह व्यवस्था केवल शिकायत निवारण नहीं है, बल्कि सत्ता के विकेंद्रीकरण, ग्राम स्वराज और सहभागी लोकतंत्र का व्यावहारिक मॉडल है। रामराज्य का अर्थ धार्मिक शासन नहीं है, बल्कि न्याय, संवेदनशीलता, समानता और त्वरित समाधान होता है। यदि यह व्यवस्था सफल होती है, तो यह सचमुच रामराज्य की ओर पहला ठोस कदम होगा।
घोषणा जितनी ऐतिहासिक है, चुनौतियाँ उतनी ही वास्तविक कर्मचारियों की मानसिकता, जवाबदेही तंत्र, निगरानी व्यवस्था और राजनीतिक हस्तक्षेप की होगी। सफलता की शर्तें होगी स्पष्ट दिशा-निर्देश, डिजिटल ट्रैकिंग, समयबद्ध समाधान, दंड और प्रोत्साहन की व्यवस्था। लोकतंत्र केवल सरकार का दायित्व नहीं होता है। बल्कि जनता को भी समस्याएँ तथ्यात्मक रखनी होगी। व्यवस्था का दुरुपयोग नहीं करना होगा और धैर्य एव सहभागिता दिखानी होगी। यदि यह मॉडल सफल होता है, तो इसे अन्य राज्य अपनाएंगे। केंद्र सरकार भी सीख लेगी और भारत लोकतंत्र का नया मॉडल प्रस्तुत करेगा।
यदि यह प्रयोग सफल हुआ, तो बिहार “पिछड़े राज्य” की छवि तोड़ेगा, भारतीय राजनीति को नया प्रशासनिक मॉडल देगा और लोकतंत्र को फिर से जनता के करीब लाएगा।
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