"हृदय–समुद्र की अंतर्धारा"
पंकज शर्मा
मित्रों मनुष्य का हृदय वास्तव में समुद्र के समान है—असीम, रहस्यमय एवं चंचल। बाह्य परिस्थितियों, इच्छाओं एवं वासनाओं की तीव्र हवाएँ जब इसे झकझोरती हैं, तब भीतर तूफ़ान उठते हैं। भावनाओं के ज्वार-भाटे विवेक की सीमाओं को लाँघ जाते हैं और मनुष्य स्वयं से संघर्ष करने लगता है। किंतु यही संघर्ष आत्मचेतना का प्रथम सोपान भी है।
यदि मनुष्य धैर्यपूर्वक अंतर्मुखी हो, तो वह पाता है कि हृदय की गहराइयों में शांति का आलोक निहित है। संयम, करुणा एवं सौंदर्य वहाँ मोतियों की भाँति सुरक्षित रहते हैं। आत्मबोध की साधना से ये मोती उजागर होते हैं एवं जीवन को अर्थ, संतुलन तथा दिव्यता प्रदान करते हैं। यही हृदय–समुद्र की सच्ची प्रेरणा है।
. "सनातन" (एक सोच , प्रेरणा और संस्कार)
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