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कला–संस्कृति के प्रतिनिधित्व पर सवाल, अपने अवदान सार्वजनिक करने को मजबूर हुए हृदय नारायण झा

कला–संस्कृति के प्रतिनिधित्व पर सवाल, अपने अवदान सार्वजनिक करने को मजबूर हुए हृदय नारायण झा

पटना।
बिहार विधान परिषद में कला–संस्कृति के प्रतिनिधित्व की बात हो या मंत्रिपरिषद में कला–संस्कृति मंत्री पद की सुयोग्यता का प्रश्न—इन दोनों ही स्थितियों में दावेदारों के वास्तविक सांस्कृतिक अवदानों का निष्पक्ष मूल्यांकन अनिवार्य होना चाहिए। इसी भावना के साथ प्रसिद्ध लोक–सांस्कृतिक साधक, गीतकार और पत्रकार हृदय नारायण झा ने अपने दशकों के योगदान को सार्वजनिक किया है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि यह कोई व्यक्तिगत स्वार्थ या पद–लालसा का विषय नहीं है। उनका कहना है कि अब तक राज्य की कला–संस्कृति के हित में जिस प्रकार का सतत, जमीनी और शोधपरक कार्य उन्होंने दीन दशा में संघर्ष करते हुए किया है, वैसा अवदान न विधान परिषद के सदस्य के रूप में और न ही मंत्री के रूप में किसी ने समक्ष रखा है। किंतु जब कुछ लोगों द्वारा स्वयं को कला–संस्कृति मंत्री पद के लिए “सुयोग्य” बताया जाने लगा, तब उन्हें लगा कि राज्य हित में अपनी भूमिका और योगदान को सार्वजनिक करना आवश्यक है, ताकि सुशासन की प्रतिबद्ध सत्ता तक कला–सांस्कृतिक सुयोग्यता की न्यायपूर्ण समीक्षा पहुँच सके।
आकाशवाणी–दूरदर्शन से लेकर लोकगीतों के दस्तावेजीकरण तक

हृदय नारायण झा बिहार के ऐसे एकमात्र कलाकार हैं जिन्हें आकाशवाणी परना एवं दूरदर्शन केन्द्र पटना से गायक, लेखक, विषय–विशेषज्ञ, कवि, योग–विशेषज्ञ एवं योगाचार्य के रूप में अनुबंध प्राप्त हुआ।
उन्होंने आकाशवाणी पटना के लिए होली, वसंत, साक्षरता, क्रिसमस और कोसी गीत जैसे विषयों पर संगीत–रूपकों की रचना की, जिनका नियमित प्रसारण हुआ।

हृदय नारायण झा ने मैथिली और भोजपुरी लोकधारा का संरक्षण किया है ,वे आकाशवाणी पटना के एकमात्र लोकगीत कलाकार रहे, जिन्हें बिहार सरकार के शिक्षा विभाग द्वारा मैथिली लोकगीत विशेषज्ञ के रूप में अधिकृत किया गया। इस दायित्व के तहत उन्होंने लुप्तप्राय मैथिली लोकगीतों और धुनों का संकलन कर उनका दस्तावेज और ऑडियो (एमपी–3) तैयार किया—जो वर्तमान और भावी पीढ़ियों के लिए स्थायी धरोहर है।

भोजपुरी में भी उनका योगदान अद्वितीय है। भोजपुरी गीतकार के रूप में उन्होंने अनेक लोकप्रिय रचनाएँ दीं और छठ महापर्व पर लिखे गीत “पहिले पहिल हम कइनी” के माध्यम से छठगीत रचना का विश्वरिकॉर्ड स्थापित किया।
छठ पर्व से यूनेस्को तक की पहल

छठ महापर्व को यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल कराने की दिशा में, इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एण्ड कल्चरल हेरिटेज के आग्रह पर उन्होंने बिहार स्तर पर छठ पर्व की वैदिक, पौराणिक और लौकिक परंपराओं का दस्तावेजीकरण किया। इसमें मैथिली, भोजपुरी, मगही, अंगिका और बज्जिका की पारंपरिक छठगीत परंपराएँ सम्मिलित हैं।
हृदय नारायण झा ने महाकवि विद्यापति के भक्ति, श्रृंगार और वैराग्य प्रधान गीतों पर आधारित संकलन, भाव–नृत्य और नृत्य–नाटिकाओं की रचना उनके रचनात्मक व्यक्तित्व का महत्वपूर्ण पक्ष है।
इसके साथ ही, तथागत गौतम को खीर अर्पित करने वाली सुजाता पर आधारित नृत्य–नाटिका की रचना भी उन्होंने की, जिसकी प्रस्तुति बिहार दिवस 2025 के अवसर पर हुई।

बिहार से जुड़े योग–परंपरा के विश्वगुरुओं—याज्ञवल्क्य, कपिल, विश्वामित्र, पतंजलि, घेरंड, भगवान बुद्ध, महावीर और गुरु गोविंद सिंह—की परंपरा पर आधारित अष्टांग योग का उन्होंने शोधात्मक अध्ययन किया। बच्चों, युवाओं और महिलाओं के लिए पाठ्यक्रम–आधारित योग–पुस्तकों का लेखन भी उनके खाते में है।
पत्रकारिता में सर्वधर्म समभाव की मिसाल

पत्रकार के रूप में वे बिहार के एकमात्र ऐसे पत्रकार रहे जिन्होंने 1997 से आज तक दैनिक समाचार पत्र आज में धर्म, संस्कृति, साहित्य और कला संवाददाता के रूप में निरंतर सेवा दी। 1997 से 2005 के बीच उन्होंने सर्वधर्म समभाव की भावना से हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध और जैन धर्मस्थलों में जाकर उनके संदेशों का संकलन और प्रकाशन किया—जो सामाजिक सौहार्द की एक दुर्लभ मिसाल है।

हृदय नारायण झा का यह सार्वजनिक वक्तव्य किसी पद–प्राप्ति की मांग नहीं, बल्कि यह प्रश्न है कि क्या बिहार की कला–संस्कृति का प्रतिनिधित्व केवल राजनीतिक दावों से तय होगा या उन लोगों के वास्तविक अवदानों से, जिन्होंने दशकों तक लोक–संस्कृति, परंपरा और विरासत को संजोने का काम किया है। अब यह सत्ता और शासन से जुड़े निर्णायक तंत्र पर है कि वे राज्य हित में कला–सांस्कृतिक सुयोग्यता की निष्पक्ष समीक्षा करें।

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