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कितना भी लिखूं... ... ...

कितना भी लिखूं... ... ...

डॉ. अंकेश कुमार
कितना भी लिखूं कम ही लिखूंगा,
तुम्हारी खुशी में अपने ग़म को कम ही लिखूंगा।
लिखूंगा किसी की बेबसी, किसी की हंसी, पर
मजलूमों पर हो रहे प्रहार को कम ही लिखूंगा।
पूस की सर्द रात में बसर खुले आस्मां की ऐ जिंदगी,
दिशाओं को भेदती तुम्हारे चीत्कार को कम ही लिखूंगा
उस रोज सतरंगी बिसात पर लिखी गई जो तारीखें
सिसकियों से भरे अतरंगी मंज़र को कम ही लिखूंगा
काश ये मंज़र मेरे तुम्हारे अंगूठे के दम पर न होता
तुम्हारी चालाकियों को क्या ही लिखूं, कम ही लिखूंगा
एक जैसे काम हो पर हस्ती अलग सी जिंदगी,
तुम्हे मालिक लिखूं, अशराफ़ लिखूं कम ही लिखूंगा।
एहसास इतना भर है कि अब एहसास रहा नहीं लेकिन
तुम्हारी यातनाओं की कथाओं में तुम्हे कम ही लिखूंगा
कितना भी लिखूं कम ही लिखूंगा,
तुम्हारी खुशी में अपने ग़म को कम ही लिखूंगा।
@ डॉ.अंकेश कुमार पटना
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