यह इहलीला का अंतिम अध्याय
डॉ रश्मि प्रियदर्शनी
जिन राहों पर इच्छाओं से भरा शीश,
लेकर मैं नित्य चला करता था।
कर अनदेखा जन्म-मरण की सच्चाई को।
"मैं" को नित्य छला करता था।।
उसी राह पर श्वेत वस्त्र में लिपटी,
मेरी ही मृतकाया आज पड़ी है।
मेरे घर के बाहर स्वजनों की,
पड़ोसियों की, मित्रों की भीड़ खड़ी है।
सचमुच यह वियोग की वेला विकट बड़ी है।।
अपने बहा रहे हैं आँसू,
लोग विदाई देने आये।
कुछ अर्थी पर मुझे लिटाकर
अंतिम संस्कार में रत हैं।
कुछ हैं माता की गोदी में,
कुछ ने थामी हुई छड़ी है।।
यह वह घर है, जहाँ बिताया बचपन मैंने।
गलियाँ जिनमें खेलकूद कर यौवन पाया।
बसा गृहस्थी जीवन की हर रीत निभाया।
आज छोड़कर यह घर, इन गलियों को,
चला विष्णुपद अग्नि-समर्पित होने।
मेरे अपने और पराये, देख मुझे जाता;
हो विकल, लगे हैं रोने।
आज न आँसू उनके पोंछ सकूंगा मैं।
हे हरि, हूँ विवश, बड़ी ही भावुक, दुखद घड़ी है।।
अपने पीछे छोड़ चला कितनी ही यादें।
कितने ही सपने, कितनी आशाओं को मैं।
कभी लौट कर आना मुझे नहीं इस तन में।
सौंप दिया जाऊँगा शुचि ज्वालाओं को मैं।।
टूट गयी मेरे श्वासों की आज लड़ी है।
यह इहलीला का अंतिम अध्याय,
जन्म की अंत कड़ी है।।







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