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माघ आध्यात्मिक कायाकल्प, पुण्य का उदय और मोक्ष

माघ आध्यात्मिक कायाकल्प, पुण्य का उदय और मोक्ष

सत्येन्द्र कुमार पाठक
सत्येन्द्र कुमार पाठकAमाघ मास—प्रकृति और परमात्मा का मिलन भारतीय मनीषा में 'काल' (समय) को केवल गणितीय इकाई नहीं, बल्कि चेतना का विस्तार माना गया है। ऋतुचक्र के संधिकाल में आने वाला 'माघ मास' (जनवरी-फरवरी) हिंदू धर्म के सर्वाधिक पवित्र महीनों में से एक है। पद्म पुराण के उत्तर खंड में महर्षि वशिष्ठ और इक्ष्वाकु वंश के राजा दिलीप के बीच हुआ संवाद 'माघ महात्म्य' के रूप में प्रसिद्ध है। यह आलेख उसी पौराणिक ज्ञान की गहराइयों में उतरकर यह समझने का प्रयास है कि क्यों माघ मास को सभी महीनों का राजा और मोक्ष का द्वार कहा गया है। अनुशासन ही भक्ति है । माघ महात्म्य के प्रारंभिक अध्याय हमें एक अत्यंत गंभीर जीवन दर्शन की ओर ले जाते हैं। भृगु ऋषि के आश्रम में आए उस विद्याधर की कथा, जिसका शरीर तो देवतुल्य था परंतु मुख 'व्याघ्र' (बाघ) जैसा था, हमें कर्मों की बारीकी समझाती है। विद्याधर का अपराध कोई जघन्य पाप नहीं था, बल्कि माघ मास की एकादशी के व्रत के बाद 'द्वादशी आने से पूर्व ही शरीर पर तेल लगा लेना' था। हमें यह संदेश देती है कि धर्म केवल प्रदर्शन नहीं, बल्कि सूक्ष्म नियमों का पालन है। जिस प्रकार एक छोटी सी चिनगारी पूरे जंगल को जला सकती है, वैसे ही अनजाने में की गई एक छोटी सी असावधानी हमारे संचित पुण्यों का क्षय कर सकती है। भृगु ऋषि ने उसे हेमकूट पर्वत की कंदराओं में माघ स्नान करने का परामर्श दिया, जिससे वह पुनः दिव्य रूप को प्राप्त कर सका। यह सिद्ध करता है कि पश्चाताप और माघ स्नान का संयोग प्रारब्ध की लकीरों को भी बदलने की शक्ति रखता है।
. प्रयागराज और त्रिवेणी संगम: ब्रह्मांडीय ऊर्जा का केंद्र है। माघ मास का वर्णन तीर्थराज प्रयाग के बिना अधूरा है। सातवें और बारहवें अध्याय में प्रयाग की जो महिमा गाई गई है, वह अद्भुत है। वशिष्ठ जी कहते हैं कि माघ मास में सूर्य जब मकर राशि में प्रवेश करते हैं (मकर संक्रांति), तब ब्रह्मांड की समस्त सकारात्मक ऊर्जाएँ संगम के जल में समाहित हो जाती हैं। पौराणिक मान्यता है कि इस समय गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम साक्षात 'अमृत' के समान हो जाता है। तीर्थों का वास माघ मास में सभी देवता, ऋषि और सिद्ध पुरुष सूक्ष्म रूप में प्रयाग में निवास करते हैं।
केवल जल में डुबकी लगाना ही पर्याप्त नहीं है। वास्तविक स्नान वह है जिसमें 'सत्य, दया और इंद्रिय संयम' के माध्यम से आत्मा की शुद्धि की जाए। जो मनुष्य मन में द्वेष रखकर स्नान करता है, उसका फल क्षीण हो जाता है।
'षट्तिला' और वैज्ञानिक महत्व: शीतकाल का आरोग्य शास्त्र के अनुसार छठे अध्याय में 'तिल' के छह प्रयोगों (षट्तिला) का वर्णन है। भगवान विष्णु के पसीने से उत्पन्न होने के कारण तिल को दिव्य अन्न माना गया है। माघ मास में तिल का उबटन, तिल स्नान, तिल तर्पण, तिल का हवन, तिल का दान और तिल का भोजन—ये छह क्रियाएँ मनुष्य के मानसिक और शारीरिक विकारों को दूर करती हैं। कड़ाके की ठंड में तिल का प्रयोग शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) बढ़ाता है और त्वचा को सुरक्षा प्रदान करता है। पूर्वजों ने धर्म के कमाध्यम से स्वास्थ्य रक्षा का जो सूत्र दिया, वह माघ महात्म्य में स्पष्ट झलकता है। श्रद्धा ही सबसे बड़ी दक्षिणा है । आठवें और दसवें अध्याय में 'दान' को लेकर जो व्याख्या की गई है, वह समाज के हर वर्ग के लिए प्रेरणादायक है। राजा दिलीप के एक प्रश्न के उत्तर में वशिष्ठ जी कहते हैं कि दान के लिए स्वर्ण या धन का होना अनिवार्य नहीं है।
अन्न और वस्त्र दान में ठिठुरती ठंड में भूखे को अन्न और निर्धन को कंबल प्रदान करता है, वह साक्षात विष्णु की सेवा करता है। सुब्रत ब्राह्मण अत्यंत निर्धन थे, परंतु वे खेतों से अन्न के दाने चुनकर और दूसरों के लिए आग (ईंधन) का प्रबंध कर दान का पुण्य कमाते थे। यह हमें सिखाता है कि 'सेवा भाव' ही वास्तविक दान है।
पापी लुब्धक का हृदय परिवर्तन के संबंध में नौवें अध्याय में 'लुब्धक' नामक क्रूर शिकारी की कथा एक मनोवैज्ञानिक सत्य को उजागर करती है। शिकारी, जिसका पूरा जीवन हत्या और चोरी में बीता था, मात्र ऋषियों के समीप बैठकर भगवान विष्णु की कथा सुनने (सत्संग) और अनजाने में माघ जल के स्पर्श से बदल गया।
यह कथा सिद्ध करती है कि कोई भी मनुष्य जन्म से पापी नहीं होता, बल्कि उसकी संगति उसे वैसा बनाती है। माघ मास वह पावन अवसर है जो 'हृदय परिवर्तन' की संभावना खोलता है। पश्चाताप की अग्नि में जलकर पुराने पाप नष्ट हो जाते हैं और मनुष्य का नया जन्म होता है। यमराज का भय और प्रेत मुक्ति: मृत्यु पर विजय का मार्ग में ग्यारहवें अध्याय में वर्णित प्रेत मुक्ति का प्रसंग डराने के लिए नहीं, बल्कि मृत्यु के सत्य को समझाने के लिए है। एक तपस्वी ब्राह्मण द्वारा माघ जल की कुछ बूंदें एक प्रेत पर छिड़कने मात्र से उसे मुक्ति मिल गई। यह प्रसंग यह दर्शाता है कि माघ मास का पुण्य केवल वर्तमान जीवन के लिए नहीं, बल्कि परलोक के मार्गों को भी सुगम बनाने के लिए है।
यमदूतों के अनुसार, जो व्यक्ति माघ में सूर्योदय से पूर्व उठकर 'माधव' का स्मरण करता है, उसे मृत्यु के समय यमराज का कोप नहीं झेलना पड़ता। वह सीधे वैकुंठ की यात्रा करता है।
माघ मास की जीवन शैली में यह जानना आवश्यक है कि माघ स्नान के कुछ विशेष नियम हैं जो व्यक्तित्व निर्माण में सहायक हैं: ब्रह्ममुहूर्त स्नान: सूर्योदय से पहले उठना संकल्प शक्ति (Will Power) को बढ़ाता है। सत्य भाषण: पूरे मास सत्य बोलने का व्रत वाणी को सिद्ध करता है। भूमि शयन: विलासिता का त्याग कर जमीन पर सोना सादगी का प्रतीक है। इंद्रिय निग्रह: वासनाओं और क्रोध पर नियंत्रण पाना है।
माघ महात्म्य का निष्कर्ष यह है कि मनुष्य का जीवन एक नदी के समान है, जिसमें पाप और अज्ञान की काई जमती रहती है। माघ मास वह 'फिल्टर' है जो इस काई को साफ कर जीवन को पुनः निर्मल बना देता है। महर्षि वशिष्ठ कहते हैं कि जो व्यक्ति पूरे महीने स्नान नहीं कर पाता, उसे कम से कम तीन दिन (त्र्यह स्नान) या मकर संक्रांति और पूर्णिमा के दिन स्नान अवश्य करना चाहिए। यह पावन मास हमें 'स्व' से 'सर्व' की ओर ले जाता है—जहाँ हम केवल अपने लिए नहीं, बल्कि दान और सेवा के माध्यम से समस्त जगत के कल्याण की कामना करते हैं।
मकर संक्रांति, षटतिला एकादशी, मौनी अमावस्या और माघ पूर्णिमा। मंत्र: 'ॐ नमो नारायणाय' और 'माधव' नाम का जप। प्रमुख दान: तिल, गुड़, कंबल, अन्न, जूता और छाता है । माघ मास में, आइए हम भी अपने भीतर के 'विद्याधर' (अहंकार और भूलों) को धोकर भगवान माधव की भक्ति में लीन हों। याद रखें, माघ स्नान केवल जल की क्रिया नहीं, बल्कि चेतना की गहराई में उतरने का एक अनुष्ठान है।


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