विश्व हिंदी दिवस या शर्म दिवस?
- क्या आज भी भारत की कोई राष्ट्रभाषा नहीं होना हमारी राष्ट्रीय विडंबना नहीं है?
लेखक : डॉ. राकेश दत्त मिश्र
भारत! एक ऐसा राष्ट्र जिसकी सभ्यता पाँच हज़ार वर्षों से अधिक पुरानी है, जिसने विश्व को वेद, उपनिषद, योग, आयुर्वेद, गणित, शून्य, दर्शन और “वसुधैव कुटुम्बकम्” जैसी उदात्त अवधारणाएँ दीं—वही भारत आज इक्कीसवीं सदी में खड़ा होकर यह सोचने को विवश है कि उसकी अपनी कोई राष्ट्रभाषा है भी या नहीं। हर वर्ष 10 जनवरी को हम विश्व हिंदी दिवस मनाते हैं, बड़े-बड़े मंच सजते हैं, भाषण होते हैं, पोस्टर छपते हैं, सोशल मीडिया पर हिंदी-प्रेम उमड़ पड़ता है—पर अगले ही दिन वही हिंदी सरकारी दफ्तरों, न्यायालयों, उच्च शिक्षा संस्थानों और कॉरपोरेट जगत में फिर से उपेक्षा का शिकार हो जाती है। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि विश्व हिंदी दिवस वास्तव में गर्व का दिवस है या आत्ममंथन का, या फिर एक प्रकार से शर्म दिवस?
आज़ादी के बाद की अधूरी यात्रा
1947 में जब भारत आज़ाद हुआ, तब राष्ट्र के सामने अनेक चुनौतियाँ थीं—विभाजन का दर्द, शरणार्थियों की समस्या, आर्थिक बदहाली, रियासतों का एकीकरण, और एक लोकतांत्रिक संविधान का निर्माण। इन सबके बीच भाषा का प्रश्न भी था। यह प्रश्न केवल संवाद का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अस्मिता, सांस्कृतिक एकता और प्रशासनिक सक्षमता से जुड़ा हुआ था। दुर्भाग्यवश, भाषा का मुद्दा राजनीतिक स्वार्थों, क्षेत्रीय आग्रहों और सत्ता-संतुलन की भेंट चढ़ गया।
संविधान में हिंदी को “राजभाषा” का दर्जा तो मिला, पर “राष्ट्रभाषा” का साहसिक और स्पष्ट निर्णय नहीं हो सका। अंग्रेज़ी को अस्थायी रूप से सहायक भाषा कहा गया था, पर वह अस्थायी व्यवस्था आज तक स्थायी बनी हुई है। यह स्थिति केवल प्रशासनिक सुविधा का प्रश्न नहीं, बल्कि मानसिक गुलामी का प्रतीक भी बन चुकी है।
राष्ट्रभाषा और राजभाषा : एक जानबूझकर रचा गया भ्रम
आम नागरिक आज भी इस भ्रम में है कि हिंदी राष्ट्रभाषा है। विद्यालयों में, भाषणों में और सरकारी आयोजनों में यह बात बार-बार दोहराई जाती है, पर संवैधानिक सच्चाई इससे भिन्न है। भारत की कोई राष्ट्रभाषा नहीं है। हिंदी केवल संघ की राजभाषा है, वह भी कई अपवादों और शर्तों के साथ।
यह स्थिति अपने आप में प्रश्न खड़े करती है—
- क्या कोई भी राष्ट्र बिना राष्ट्रभाषा के अपनी पूर्ण सांस्कृतिक पहचान बना सकता है?
- क्या भाषा केवल संवाद का साधन है या वह राष्ट्र की आत्मा भी है?
अंग्रेज़ी : सुविधा या गुलामी?
अंग्रेज़ी का ज्ञान आज योग्यता, बुद्धिमत्ता और सामाजिक प्रतिष्ठा का पैमाना बन गया है। जो अंग्रेज़ी बोल ले, वह “एलिट” कहलाता है; जो नहीं बोल पाता, वह पिछड़ा समझा जाता है—चाहे उसके ज्ञान, अनुभव और नैतिकता का स्तर कितना ही ऊँचा क्यों न हो। यह मानसिकता औपनिवेशिक विरासत का सबसे खतरनाक अवशेष है।
आज भी हमारे उच्च न्यायालयों, सर्वोच्च न्यायालय, मेडिकल और इंजीनियरिंग शिक्षा, प्रबंधन संस्थानों और प्रशासनिक सेवाओं में अंग्रेज़ी का वर्चस्व है। प्रश्न यह है कि जिस देश की 60–65 प्रतिशत से अधिक आबादी हिंदी या हिंदी-समूह की भाषाएँ समझती है, वहाँ शासन और न्याय की भाषा बहुसंख्यक की भाषा क्यों नहीं है?
हिंदी : केवल भाषा नहीं, संस्कृति की वाहक
हिंदी केवल वर्णमाला और व्याकरण का ढांचा नहीं है। हिंदी में भारत की आत्मा बोलती है। इसमें कबीर का निर्गुण भक्ति दर्शन है, तुलसी की मर्यादा है, सूर की भावुकता है, प्रेमचंद की सामाजिक चेतना है, निराला का विद्रोह है, दिनकर की राष्ट्रीय गर्जना है। हिंदी ने सदैव जन-जन की पीड़ा, आशा और संघर्ष को स्वर दिया है।
इसके बावजूद हिंदी को “कमतर”, “ग्रामीण”, “अशिक्षितों की भाषा” बताने की एक साजिशन मानसिकता विकसित की गई। यह मानसिकता स्वयं भारतीयों ने अपनाई—और यही सबसे बड़ी त्रासदी है।
विश्व हिंदी दिवस : उत्सव या औपचारिकता?
विदेशों में बसे भारतीय, प्रवासी समुदाय और कुछ राजनयिक मंचों पर हिंदी को लेकर जो उत्साह दिखता है, वह सराहनीय है। पर क्या केवल विदेशों में हिंदी के कार्यक्रम आयोजित कर देने से हमारी जिम्मेदारी पूरी हो जाती है? क्या भारत के भीतर हिंदी को वह सम्मान, अधिकार और व्यवहारिक उपयोग मिल रहा है, जिसकी वह अधिकारी है?
विश्व हिंदी दिवस पर दिए गए भाषणों में बड़े-बड़े वाक्य होते हैं—“हिंदी विश्वभाषा बन रही है”, “हिंदी का भविष्य उज्ज्वल है”—पर जमीनी हकीकत यह है कि अपने ही देश में हिंदी आज भी संघर्ष कर रही है।
शिक्षा व्यवस्था और भाषा की राजनीति
आज की शिक्षा व्यवस्था में अंग्रेज़ी माध्यम को श्रेष्ठ और हिंदी माध्यम को मजबूरी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। माता-पिता अपने बच्चों को अंग्रेज़ी माध्यम में पढ़ाने को ही सफलता की कुंजी मानते हैं। परिणामस्वरूप, बच्चे न तो सही ढंग से अंग्रेज़ी सीख पाते हैं, न हिंदी में गहराई प्राप्त कर पाते हैं। यह दो नावों पर पैर रखने वाली स्थिति है, जिसमें सबसे बड़ा नुकसान बौद्धिक मौलिकता का होता है।
जब सोचने की भाषा पराई हो जाती है, तब चिंतन भी पराया हो जाता है। यही कारण है कि हम आज भी पश्चिमी अवधारणाओं की नकल में लगे हैं, अपनी परंपराओं और संदर्भों से कटते जा रहे हैं।
राजनीति और भाषा : साहस का अभाव
राजनीतिक दलों ने हिंदी को अक्सर भावनात्मक मुद्दा बनाया, पर नीतिगत स्तर पर ठोस निर्णय लेने का साहस नहीं दिखाया। क्षेत्रीय भाषाओं के सम्मान की आड़ में राष्ट्रभाषा के प्रश्न को टाल दिया गया। जबकि सच्चाई यह है कि राष्ट्रभाषा और क्षेत्रीय भाषाएँ परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हो सकती हैं।
दुनिया के अनेक देशों में एक राष्ट्रभाषा है, साथ ही क्षेत्रीय भाषाओं का संरक्षण भी है। फिर भारत में यह संतुलन क्यों नहीं बन सकता?
आत्मसम्मान का प्रश्न
भाषा केवल संवाद नहीं, आत्मसम्मान का प्रश्न है। जब कोई राष्ट्र अपनी भाषा में सोचने, काम करने और न्याय देने से हिचकता है, तो वह अनजाने में अपनी ही जनता को यह संदेश देता है कि उनकी भाषा पर्याप्त सक्षम नहीं है। यह मानसिक दासता किसी भी राजनीतिक स्वतंत्रता से अधिक खतरनाक होती है।
क्या यह शर्म की बात नहीं?
आज जब हम आज़ादी के सात दशक से अधिक पूरे कर चुके हैं, अंतरिक्ष, विज्ञान, तकनीक और अर्थव्यवस्था में प्रगति के दावे करते हैं—तो क्या यह सचमुच शर्म की बात नहीं कि हम अपनी भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा देने का साहस तक नहीं जुटा पाए?
क्या यह विडंबना नहीं कि हिंदी बोलने वाला व्यक्ति अपने ही देश में हीन भावना से ग्रस्त रहता है?
आत्ममंथन और संकल्प
समाधान टकराव में नहीं, संकल्प में है। हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का अर्थ अन्य भाषाओं को दबाना नहीं है। इसका अर्थ है—
- शासन और न्याय की भाषा जनभाषा बने
- शिक्षा में मातृभाषा और हिंदी को प्राथमिकता मिले
- अंग्रेज़ी को ज्ञान का साधन माना जाए, पहचान का नहीं
- हिंदी में उच्च स्तरीय तकनीकी, वैज्ञानिक और विधिक सामग्री विकसित हो
दिवस से दायित्व तक
विश्व हिंदी दिवस तब सार्थक होगा, जब वह केवल समारोह न रहकर दायित्व का बोध कराए। जब हम यह स्वीकार करें कि भाषा का प्रश्न केवल भाषाविदों का नहीं, राष्ट्र के आत्मसम्मान का प्रश्न है।
जब तक भारत अपनी भाषा को लेकर आत्मविश्वास से खड़ा नहीं होगा, तब तक उसकी स्वतंत्रता अधूरी रहेगी।
और तब तक यह प्रश्न हमें कचोटता रहेगा—
विश्व हिंदी दिवस, गर्व का दिवस या शर्म दिवस?
लेखक : डॉ. राकेश दत्त मिश्र, दिव्य रश्मि के सम्पादक है
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