न जाने कौन- कब यहाँ, नींद में सो जायेगा,
काल क्रूर हाथ लम्बे, जग से चला जायेगा।आस सबको ही यहाँ, हम सदा सर्वदा रहेंगे,
तन पुतला माटी का, सत्कर्म ही रह जायेगा।
देव दानव- नर किन्नर, सब आये और गये,
जन्म जिसमें भी लिया, मृत्यु का लक्ष्य गहे।
काल कवलित असमय, कुछ युगों तक रहे,
कोई घुट घुट कर मरे, कुछ आँसुओं में बहे।
क्या किया जी कर यहाँ, कुछ तो विचारिये,
खाया पिया मर गये, क्या किया विचारिये?
मानव जन्म सार्थकता, परोपकार कही गयी,
क्या दिया तुमने जगत को, इस पर विचारिये?
मृत्यु से पहले ही अपनी, एक संकल्प लीजिए,
मर कर भी काम आयें, देह दान संकल्प कीजिए।
जानते हैं हम सभी, यह तन माटी का पुतला,
मिट्टी में मिलने से अच्छा, जीवन किसी को दीजिए।
अ कीर्ति वर्द्धन
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