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नज़रिया

नज़रिया

मनोज कुमार मिश्र
वो एक चिड़िया
चोंच में तिनका दबाए
मेरे घर की बालकनी में
बार बार आये जाए
ढूंढती है ठौर अपना
बसाने को अपना जहाँ


मेरे पोते का कौतूहल
पाता है वह यह सब
मोबाइल टीवी से अलग
दुनिया की नई सी हलचल
निगाहें प्रश्नवाचक चिन्ह सी
क्यूँ है विहग यह इतनी तत्पर


गंदी हो गई ये बालकोनी फिर से
रहती इस घर मे कितनी
व्यर्थ की भारी उथल पुथल
लोग देखेंगे तो क्या कहेंगे
तिनके बिखरे यहां वहां
हे भगवान ये गंदा सा घर


छोड़ो न इन चिंताओं को
निकालो जो है ये मन का जहर
वो बसाना चाहती एक घर
उस पर न डालो बुरी नज़र
रह लेगी संग में वो भी हमारे
थोड़े समन्वय से होगी नई पहल


बात वही सुबह वही शाम भी
मुस्कुराया कितने भिन्न परिणाम हैं
नजर है नज़रिया है सबका
कहूँ किसे सही किसे गलत
किसी की खुशी किसी का गम
संवेदना उपेक्षा जीवन का क्रम- मनोज कुमार मिश्र
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