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चंवर

चंवर

जय प्रकाश कुवंर
बचपन की देखी हुई कुछ चीजें तथा व्यवहारिक जीवन में उनके उपयोग से संबंधित यादगारें ता उम्र मानसपटल पर बनी रहतीं हैं ,और वर्तमान समय में उन लुप्त चीजों का हम किसी रूप में व्यवहार देखते हैं तो उन चीजों के प्रति मन जिज्ञासु हो उठता है कि आखिर उन्हें इतना शुद्ध क्यों माना जाता है और ऐसी वस्तुयें कैसे निर्मित होती हैं। उन्हीं विलुप्त चीजों में से चंवर भी एक है, जिसे आज कल हमलोग भगवान के मंदिरों में पुजारियों द्वारा अक्सर भगवान के मुंख के सामने हिलाते डुलाते देखते हैं।
चंवर को हमने अपने परिवार में १९६०-७० के दशक में देखा था, जो चांदी के हैंडल युक्त था। इसका उपयोग उन दिनों परिवार में शादी ब्याह में दुल्हा दुल्हन के उपर झलने के काम में आता था । बिबाह शादी में उपयोग होने वाला चंवर श्रद्धा ,सम्मन और शीतलता का प्रतीक माना जाता था। इसे शुभ माना जाता था। यह प्रथा हमारे बुजुर्गों के समय से चली आ रही थी। उसके बाद यह प्रथा धीरे धीरे लुप्त होती चली गई। यहाँ तक की बाद के दिनों वह चंवर भी परिवार से गायब हो गया। उन दिनों हमलोग चंवर के उत्पति की कहानी नहीं जानते थे, की यह कैसे बनता है और यह कैसे व्यवहार में आया।
लेकिन आज कल मंदिरों में इसके व्यवहार को देखकर एवं अध्ययनों से मुझे जो जानकारी मिली है उसे मैं इस पोस्ट के माध्यम से आप सबसे साझा कर रहा हूँ, ताकि वर्तमान पीढ़ी भी इससे वाकिफ हो सके। यह याक अथवा सुरा गाय की पुंछ के लम्बे और मुलायम बालों को इकट्ठा करके उन्हें एक धागे या धातु के हत्थे में लाख की मदद से लगाकर बनाया जाता है। चांदी तथा सोने का हैंडल लगा कर इसकी सजावट होती है। आज कल चंवर बनाने के लिए नायलन के बाल भी इस्तेमाल होने लगा है।
चंवर की कथा बदरीनाथ भगवान से जुड़ी हुई है। वो एक बार नर नारायण रूप में तपस्या से उठकर घुमते हुए सूदूर तिब्बत की तरफ निकल गये। जब तिब्बतियों ने उन्हें देखा तो भगवान बुद्ध समझकर वे उनकी तरफ दौड़े। गंदे और चांडालों के वेष में रहने वाले तिब्बती उन्हें छुना चाहते थे। यह जान कर उनसे बचने के लिए भगवान बद्रीनाथ वहाँ से भागे। वो आगे और तिब्बती उनके पीछे दौड़ रहे थे। जब भगवान को उनसे छिपने के लिए कोई जगह नहीं मिली तो उन्होंने चंवरी गाय से कहा कि हे देवी मुझे अपवित्र होने से बचाओ। अगर ये चांडाल मुझे स्पर्श कर देंगे तो मेरा तप भंग हो जाएगा। चंवरी गाय ने तब भगवान विष्णु को अपने पुंछ के नीचे छुप जाने के लिए कहा। भगवान् बद्रीनाथ चंवरी गाय के पुंछ के नीचे छुप गए। तिब्बतियों ने उन्हें खोजा लेकिन वो नहीं मिले। इस तरह भगवान् ने ख़ुद को बचाया। तब भगवान् विष्णु ने प्रसन्न होकर चंवरी गाय को वरदान दिया कि हे देवी,आज के बाद बगैर तुम्हारे चंवर के मेरी पूजा अधुरी मानी जाएगी। मेरे मंदिरों में तुम्हारा चंवर भी मेरे जितना ही पवित्र माना जाएगा। उस दिन से हिन्दू धर्म में भगवान् को चंवर डुलाकर प्रसन्न किया जाता है। सफेद चंवर सर्वोत्तम माना जाता है।
इसी सत्यता के आधार पर चंवर का उपयोग आज कल मंदिरों में देवताओं और पवित्र पुस्तक ( गुरू ग्रंथ साहिब ) पर हवा करने तथा मक्खियों और पतंगों से बचाने के लिए किया जाता है।

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