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बाल साहित्य और वंदे मातरम: राष्ट्रीय चेतना के 150 वर्ष

बाल साहित्य और वंदे मातरम: राष्ट्रीय चेतना के 150 वर्ष

सत्येन्द्र कुमार पाठक
भारतीय इतिहास के पन्नों में कुछ शब्द ऐसे होते हैं जो समय की सीमाओं को लांघकर अमर हो जाते हैं। 'वंदे मातरम' ऐसा ही एक अमर मंत्र है। ऋषि बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा रचित यह गीत आज अपनी यात्रा के 150 वर्ष पूर्ण कर रहा है। यह केवल डेढ़ सदी का सफर नहीं है, बल्कि यह पराधीनता की बेड़ियों को काटने वाले संकल्प, बलिदान और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का जीवंत इतिहास है। जब हम बाल साहित्य के संदर्भ में वंदे मातरम की चर्चा करते हैं, तो यह विषय और भी संवेदनशील और महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि बच्चों के हृदय में रोपा गया राष्ट्रवाद का बीज ही भविष्य के सशक्त भारत का वटवृक्ष बनता है। बाल साहित्य का प्राथमिक उद्देश्य मनोरंजन के साथ-साथ चरित्र निर्माण होता है। 'बाल साहित्य शोध सृजनपीठ' जैसी संस्थाएं जब इस अवसर पर रचनाएं आमंत्रित करती हैं, तो उनका मूल लक्ष्य बच्चों के कोमल मन पर 'माँ भारती' की एक ऐसी छवि अंकित करना होता है जो केवल मानचित्र तक सीमित न हो।
बच्चों के लिए राष्ट्र एक अमूर्त धारणा हो सकती है, लेकिन 'माँ' एक जीवंत और आत्मीय सत्य है। वंदे मातरम इसी 'राष्ट्र-चेतना' को 'मातृ-चेतना' से जोड़ता है। जब बच्चा इस गीत के अर्थ को समझता है, तो उसे समझ आता है कि जिस धरती पर वह खेलता है, जिसकी नदियों का जल वह पीता है, वह केवल मिट्टी नहीं बल्कि साक्षात जननी है।
ऐतिहासिक धरोहर और 'आनंदमठ' की प्रेरणा 1882 में प्रकाशित उपन्यास 'आनंदमठ' से निकले इस गीत ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की दिशा बदल दी थी। बाल साहित्यकारों की यह जिम्मेदारी है कि वे बच्चों को उस कालखंड की वीरगाथाओं से परिचित कराएं। कहानियों और नाटकों के माध्यम से यह बताया जाना चाहिए कि कैसे एक गीत ने निहत्थे भारतीयों में अंग्रेजों के तोप-गोलों के सामने खड़े होने का साहस भर दिया था। क्रांतिकारी बिस्मिल, आज़ाद और भगत सिंह के होठों पर रहने वाला यह उद्घोष बच्चों को बलिदान का अर्थ समझाता है। ऐतिहासिक कहानियाँ बच्चों को यह अहसास कराती हैं कि आज हम जिस स्वतंत्र हवा में सांस ले रहे हैं, उसके पीछे वंदे मातरम का जयघोष करते हुए फाँसी पर झूलने वाले अनगिनत वीरों का त्याग है।
सेवा का व्यावहारिक स्वरूप में अक्सर यह माना जाता है कि देशभक्ति केवल सीमाओं पर लड़ने या विशेष अवसरों पर नारे लगाने का नाम है। लेकिन बाल साहित्य इस धारणा को एक नया विस्तार देता है। आपके द्वारा साझा किया गया विचार—"क्या ऐसा नहीं हो सकता कि सब मम्मी के हिसाब से चलें?"—बाल मनोविज्ञान की एक उत्कृष्ट उपलब्धि है।
यही वह बिंदु है जहाँ 'वंदे मातरम' का दर्शन व्यवहार में बदलता है। अनुशासन ही राष्ट्र सेवा है: एक बच्चा यदि घर में अपनी माँ के काम का बोझ कम करता है, फर्श पर कचरा नहीं फेंकता और बड़ों का सम्मान करता है, तो वह वास्तव में राष्ट्र की गरिमा बढ़ा रहा होता है। कर्तव्य बोध: घर एक लघु राष्ट्र है। जो बच्चा अपने घर की स्वच्छता और व्यवस्था के प्रति जागरूक है, वही आगे चलकर 'स्वच्छ भारत' और 'स्वस्थ भारत' के सपने को साकार करेगा। निम्मी और पापा के उदाहरण के माध्यम से बाल साहित्य यह समझाता है कि घर की 'माँ' की सेवा ही 'भारत माँ' की सेवा की पहली सीढ़ी है।
वंदे मातरम के 150 वर्ष पूर्ण होने पर सृजित होने वाला साहित्य विविध विधाओं में होना चाहिए ताकि वह हर आयु वर्ग के बच्चों को प्रभावित कर सके: ऐसी लयबद्ध कविताएँ जो "सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्" के भाव को सरल भाषा में समझा सकें। जिसमें प्रकृति, नदियों और पहाड़ों का वर्णन हो, ताकि बच्चे अपनी भौगोलिक विरासत से प्रेम करें।: ऐसी प्रेरक कहानियाँ जो केवल इतिहास न बताएं, बल्कि वर्तमान में भी 'देशसेवा' के छोटे-छोटे उदाहरण पेश करें। जैसे—पानी बचाना, पौधे लगाना या किसी जरूरतमंद की मदद करना। स्कूलों में ऐसे नाटकों का मंचन होना चाहिए जो 'आनंदमठ' के ऐतिहासिक दृश्यों के साथ-साथ वर्तमान सामाजिक समस्याओं पर प्रहार करें।
'सुजलां सुफलां' का संकल्प और पर्यावरण में वंदे मातरम का शाब्दिक अर्थ है "मैं माँ (भूमि) की वंदना करता हूँ।" यह गीत हमें अपनी धरती को 'सुजला' (अच्छे जल वाली) और 'सुफला' (अच्छे फलों वाली) बनाने की प्रेरणा देता है। आज के युग में जब पर्यावरण संकट गहरा रहा है, बाल साहित्य के माध्यम से बच्चों को यह समझाना अनिवार्य है कि प्रकृति की रक्षा ही वंदे मातरम का वास्तविक गान है। प्रदूषित नदियाँ और कटते वन 'माँ भारती' के आंचल को लहूलुहान करने के समान हैं।
बाल साहित्य और वंदे मातरम का संबंध केवल शब्दों का नहीं, बल्कि संस्कारों का है। यह संगम बच्चों को एक संवेदनशील, जागरूक और कर्तव्यनिष्ठ नागरिक बनाने का सशक्त माध्यम है। जब एक बच्चा अपनी माँ के परिश्रम का सम्मान करना सीखता है, तभी वह राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझ पाता है। वंदे मातरम के 150 वर्ष हमें अवसर देते हैं कि हम अपनी भावी पीढ़ी को एक ऐसा वैचारिक धरातल प्रदान करें, जहाँ वे अपनी जड़ों पर गर्व कर सकें और ऊंचे आसमान की ओर उड़ान भर सकें। राष्ट्र केवल भूगोल नहीं, भाव है—और यह भाव बाल मन में साहित्य के माध्यम से ही चिरस्थायी बनाया जा सकता है।
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