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सुंदरता तन की या मन की

सुंदरता तन की या मन की

अरुण दिव्यांश
मानव तो होते सभी हैं सुंदर ,
या सुंदरता भली है धन की ।
सुंदरता देख कौन भली है ,
सुंदरता तन की या मन की ।।
गोरा चिट्टा निज घर में बैठा ,
काला तैयारी किए रण की ।
गोरा पल का महत्व न देता ,
काला महत्व बनाए क्षण की ।।
धनी ऐंठा है धन के घमंड में ,
निर्धन बैठा उनके सत्कार में ।
घमंड में सारे टूट जाते रिश्ते ,
निर्धन खड़ा सबके प्यार में ।।
धन और गोराई समान होते ,
अंतर होते दोनों अरमान में ।
एक सेवार्थ खड़ा कर जोड़े ,
दूसरा व्यस्त रहे फरमान में ।।
फैला जग दोनों की ख्याति ,
विद्व रावण कुख्यात हुआ ।
बालक राम कूदा था रण में ,
नन्हा राम सुविख्यात हुआ ।।
राक्षस परिवार में था जन्मा ,
रामभक्त न्यायी एक थे संत ।
राक्षस संत दोनों निज भाई ,
राक्षस रावण का हुआ अंत ।।
सुंदर तन नहीं होता है भला ,
सुंदरता भली होत है मन की ।
धन तन गोरा न अधिक भला ,
सुंदरता तो होता भोलेपन की ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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