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संगम

संगम

अरुण दिव्यांश
आओ मिल जाऍं हम तुम संग में ,
दो दिलों का यह संगम हो जाए ।
बह जाए प्रेमाश्रुओं की ये धारा ,
प्रेमाश्रु विह्वल हो गंगम हो जाए ।।
जैसे हुआ गंगा यमुना का संगम ,
दो बैलों की जोड़ी प्यार दिखाए ।
मिल गईं जब दोनों को ही शक्ति ,
दुश्मन को भी वे मार भगाए ।।
दो दिलों का मिलन यह संगम ,
इस संगम की धारा दूर है जाती ।
आओ बह जाऍं संगम धारा में ,
नहीं धारा यह खौफ दिखाती ।।
आओ डूब जाऍं इस धारा हम ,
जमकर डूबकी हम भी लगाऍं ।
जितने नीचे लगाऍंगे हम गोता ,
उतना ही मणि रत्न हम पाऍं ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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