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"ठहराव का अनुरोध"

"ठहराव का अनुरोध"

पंकज शर्मा
वक्त,
कभी तो अपनी अनवरत चाल को
थामकर पीछे पलटकर देख—
अधूरी मुस्कानें, दबे हुए स्वर,
और वे हाथ, जो छूट गए
तेरी तेज़ी के संग।


तुम्हारी दौड़ में
कितने दिन शिकन बने रह गए,
कितनी रातें अपनी थकान
अंधेरे में छिपाती रहीं।
तुमने सुना पर समझा नहीं,
तुमने देखा पर ठहरा नहीं।


कभी-कभी लगता है
मानो जीवन का अर्थ
तुम्हारी गति में नहीं,
तुम्हारे विराम में छिपा है—
जहाँ एक साँस
एक उम्र की तरह लंबी हो जाती है।


देखो न,
एक अधखुला द्वार
अब भी प्रतीक्षा करता है
तुमसे बचे हुए क्षणों की;
उसके बाहर खड़ी हैं
कुछ अपूर्ण इच्छाएँ
जो अब भी धूप का सपना सँजोए हुए हैं।


लोग कहते हैं—समय सब सुलझा देता है,
पर वे नहीं जानते
कि कभी-कभी वही
सबसे उलझा हुआ धागा बन जाता है।
तुम्हारे कदमों की आहट
उन फाँकों को और चौड़ा कर देती है
जहाँ से स्मृतियाँ झरने लगती हैं।


थोड़ा और रुक जाओ,
कि कुछ कहानियाँ
अधूरी रह जाएँ तो उनका दर्द
हमेशा के लिए जम जाता है।
तुम्हारी रफ़्तार
उनके शब्दों को पकड़ने नहीं देती।


काश, तुम एक क्षण को
अपनी घड़ी उतारकर
मानव हृदय की धड़कन सुनते—
तुम्हें पता चलता
कि उसके भीतर
समय नहीं,
संबंधों की नमी बहती है।


तो ऐ वक्त,
कभी-कभी हठ छोड़कर
बस इतना कर दो—
मेरी हथेली पर एक क्षण रख दो
जो मेरा ही रहे,
ताकि मैं भी जान सकूँ
कि जीवन
तेरे गुजर जाने का नाम नहीं,
तेरे थम जाने की अनुभूति है।


. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️ "कमल की कलम से"
✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान
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