बच्चों का धर्म निभाये
कितनो के पुत्र आजकलकरते मां बाप की सेवा।
सब कुछ उन पर लूटकर
खुद बन जाते है भिक्षुक।
और पुत्र इन सब का
कैसे अदा करते है कर्ज।
भेज उन्हें बृद्धाश्रम में
फिर भी कहलाते पुत्र सदा।।
कलयुग की महिमा तो देखो,
बिना फर्ज भी पुत्र बने रहते है।
क्या ऐसे पुत्रो को भी,
आप पुत्रो की श्रेणी में रखते हो।
पुत्र मोह को त्याग करके,
अपने आप मे आप मगन रहो।
तभी स्वाभिमान से
हम आप जिंदगी को जी पायेंगे।।
पुत्र बधू को भी कर्तव्य
पुत्र नही निभाने देते है।
अपनी शान शौकत की खातिर
उन्हें रिश्तों से दूर कर देते है।
ऐसे पुत्र और पुत्रवधु को
आप किस तरह से देखते हो।
मेरे अनुसार तो ऐसे लोगों से
छीन लेना चाहिये उनके हक।
और उन्हें पुत्र पुत्रवधु के पद से
मुक्त कर देना चाहिए।।
जय जिनेन्द्र
संजय जैन "बीना" मुम्बई
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