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“सावित्री शक्तिपीठ” देवी सती का एड़ी (गुल्फ) गिरा था

“सावित्री शक्तिपीठ” देवी सती का एड़ी (गुल्फ) गिरा था

आभा सिन्हा, पटना

हरियाणा का कुरुक्षेत्र नाम सुनते ही मन में धर्म, युद्ध, गीता, कृष्ण और अर्जुन की छवियाँ तैर जाती हैं। यही वह भूमि है, जहाँ श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्मयोग का उपदेश दिया था, जहाँ धर्म और अधर्म के बीच निर्णायक युद्ध हुआ था। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इसी पुण्यभूमि में देवी सती का एक अंश भी विराजमान है “सावित्री शक्तिपीठ” के रूप में। यह स्थान न केवल आध्यात्मिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है, बल्कि यह भारत की शक्ति परंपरा का भी अत्यंत पवित्र केंद्र है। यहाँ माता सती की एड़ी (गुल्फ) गिरी थी। इसी कारण यह स्थान सावित्री शक्तिपीठ कहलाता है। यहाँ विराजमान देवी का नाम है ‘सावित्री’, और उनके भैरव का नाम है ‘स्थाणु’, जो भगवान शिव का एक विशेष रूप है।


देवी भागवत, कलिका पुराण और तंत्रचूड़ामणि जैसे ग्रंथों के अनुसार, जब सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में अपमान सहकर अग्नि में देह त्याग दी, तो भगवान शिव शोकविह्वल होकर उनका जला हुआ शरीर लेकर ब्रह्मांड में घूमने लगे। तब ब्रह्मा, विष्णु और देवताओं ने मिलकर शिव का मोह भंग करने के लिए भगवान विष्णु से प्रार्थना की। विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के टुकड़े कर दिए, जो पृथ्वी पर विभिन्न स्थानों पर गिरा। जहाँ-जहाँ माता के अंग, वस्त्र या आभूषण गिरा, वहीं-वहीं शक्तिपीठों का निर्माण हुआ। इन पीठों में से एक है कुरुक्षेत्र का “सावित्री शक्तिपीठ”, जहाँ माता की एड़ी गिरी थी। यह स्थान मातृशक्ति के उस चरण की प्रतीक है, जिसके नीचे समस्त ब्रह्मांड शरण पाता है।


“सावित्री शक्तिपीठ” हरियाणा राज्य के कुरुक्षेत्र जिला में स्थित है। यह स्थान न केवल एक धार्मिक स्थल है, बल्कि यह ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। कुरुक्षेत्र स्वयं को “धर्मभूमि” कहता है जहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने गीता का अमर उपदेश दिया था। इस पवित्र भूमि के मध्य में स्थित “सावित्री शक्तिपीठ” श्रद्धालुओं को यह संदेश देता है कि धर्म, कर्म और भक्ति, इन तीनों की जड़ें शक्ति में ही हैं। यह शक्तिपीठ सरस्वती नदी के प्राचीन प्रवाह क्षेत्र के निकट माना जाता है। स्थानीय परंपरा के अनुसार, यहाँ माता सती की एड़ी गिरने के कारण यह स्थान स्वयंमंत्रित (स्वयं प्रकट) है।


माता सावित्री का स्वरूप अत्यंत कोमल, दयामयी और तेजस्वी माना जाता है। देवी के चरण जहाँ पड़े, वहाँ भूमि ने शक्ति का संचार किया। शास्त्रों में एड़ी या गुल्फ का प्रतीक है स्थिरता और संबल। जिस प्रकार शरीर का भार एड़ी संभालती है, उसी प्रकार समस्त सृष्टि का भार शक्ति संभालती है। इस दृष्टि से कुरुक्षेत्र का यह पीठ नारी की स्थिरता, सहनशीलता और सृजनशक्ति का प्रतीक है। यहाँ की देवी सावित्री ब्रह्मा की अर्धांगिनी के रूप में भी जानी जाती हैं। वे सृजन की अधिष्ठात्री हैं, जिन्होंने वेदों की रचना में ब्रह्मा की प्रेरणा बनीं।


हर शक्तिपीठ में देवी के साथ उनके भैरव की उपस्थिति अनिवार्य होती है। सावित्री शक्तिपीठ के भैरव हैं “स्थाणु”। ‘स्थाणु’ शब्द का अर्थ है जो अचल, अडिग और अटल हो। यह रूप भगवान शिव की उस अवस्था का प्रतीक है, जब वे ध्यानस्थ होकर संपूर्ण सृष्टि के कंपन को स्थिर कर देते हैं। भैरव स्थाणु यहाँ देवी सावित्री की रक्षा करते हैं और भक्तों को जीवन में धैर्य, स्थिरता और आत्मसंयम का संदेश देते हैं।


शक्ति पुराण के अनुसार, जब सती के शरीर के अंग पृथ्वी पर गिरे, तो जहाँ माता की एड़ी गिरी, वहाँ भूमि में दिव्य कंपन हुआ। देवताओं ने इस स्थान को सावित्री क्षेत्र घोषित किया। कुरुक्षेत्र के संतों और तीर्थपुराणों में उल्लेख मिलता है कि पांडव काल में भी यहाँ पूजा-अर्चना होती थी। कहा जाता है कि युधिष्ठिर ने धर्मराज से वरदान प्राप्त करने के बाद इसी स्थान पर सावित्री की आराधना की थी। यह भी कहा जाता है कि महर्षि मार्कंडेय, जिन्होंने देवी महात्म्य की रचना की, उन्होंने भी सावित्री पीठ में तपस्या की थी।


‘सावित्री’ शब्द ‘सविता’ से निकला है, जिसका अर्थ है सूर्य या प्रकाश का स्रोत। देवी सावित्री को वेदों में ब्रह्मशक्ति कहा गया है। वे सृजन की मूल प्रेरणा हैं। ब्रह्मा की सृष्टि का कार्य तभी पूर्ण हुआ जब सावित्री ने उन्हें अपनी शक्ति प्रदान की। इस प्रकार सावित्री को ज्ञान, वेद, सृष्टि और सत्य की अधिष्ठात्री देवी कहा गया है। कुरुक्षेत्र की यह सावित्री उसी ब्रह्मशक्ति का स्थलीय रूप हैं, जिन्होंने इस धरती पर सत्य की ज्योति प्रज्वलित की।


कुरुक्षेत्र की पहचान केवल युद्धभूमि की नहीं है, बल्कि साधना की भूमि की भी है। यहाँ सूर्य कुंड, भीष्म कुण्ड, शेखर तीर्थ, कर्ण क्षेत्र और ज्योतिसर जैसे पवित्र स्थल हैं। इन सबके मध्य सावित्री शक्तिपीठ वह स्थान है, जहाँ धर्म और शक्ति का अद्भुत संगम होता है। कहते हैं, गीता का उपदेश देते समय जब भगवान कृष्ण ने कहा “योगस्थः कुरु कर्माणि”, तो इस भूमि की शक्ति वही थी, जो सावित्री देवी के चरणों से प्रवाहित हुई थी।


“सावित्री शक्तिपीठ” का मंदिर अत्यंत प्राचीन है। इसका मूल गर्भगृह प्राचीन शैव और शाक्त स्थापत्य का सुंदर संगम है। मुख्य मंदिर के गर्भगृह में देवी सावित्री की दिव्य प्रतिमा विराजमान है, जिनके चरणों के नीचे गुल्फ-चिह्न अंकित है। माता के दोनों ओर नित्य सहचर गणेश और कार्तिकेय की मूर्तियाँ हैं। मंदिर परिसर में भैरव स्थाणु का भी एक छोटा किंतु शक्तिशाली मंदिर है। यहाँ की आरती के समय बजने वाली घंटियों और डमरू की ध्वनि से वातावरण शक्ति से भर उठता है।


भक्तों का विश्वास है कि जो व्यक्ति श्रद्धा से सावित्री पीठ में माता के चरणों में प्रणाम करता है, उसे जीवन में स्थिरता, सफलता और मानसिक शांति प्राप्त होती है। विशेषकर वे लोग जो जीवन में अस्थिरता, मानसिक भ्रम या दिशा-भ्रष्टता से पीड़ित हैं, उन्हें यहाँ की साधना से संतुलन मिलता है। यह भी कहा जाता है कि जिन दंपतियों के वैवाहिक जीवन में मतभेद हैं, वे यदि सावित्री-स्थाणु की संयुक्त पूजा करें तो सौहार्द और प्रेम पुनः स्थापित होता है।


नवरात्र के अवसर पर सावित्री शक्तिपीठ में अत्यंत भव्य मेला लगता है। शारदीय और चैत्र नवरात्र दोनों में हजारों श्रद्धालु यहाँ पहुँचते हैं। देवी का घट स्थापना, चंडीपाठ, हवन, और रात्रिजागरण विशेष आयोजन होते हैं। श्रद्धालु रात्रि में भैरव स्थाणु की आरती में भाग लेते हैं, जिसे “स्थिर भाव की आरती” कहा जाता है। इसके अतिरिक्त वट सावित्री व्रत के अवसर पर महिलाएँ यहाँ पूजा करने आती हैं, क्योंकि माता सावित्री को सत्यव्रता नारी की प्रतीक माना गया है।


वेदों और पुराणों में सावित्री का उल्लेख सत्यवान की पत्नी के रूप में भी मिलता है, जिन्होंने यमराज से अपने पति को पुनः जीवन दिलाया था। कुरुक्षेत्र का सावित्री पीठ उसी आत्मबल और सत्यनिष्ठा का प्रतीक है। इस कारण वट सावित्री व्रत पर महिलाएँ यहाँ आकर वट वृक्ष की परिक्रमा करती हैं और माता से अपने पतियों के दीर्घायु होने की प्रार्थना करती हैं।


तांत्रिक साधना के लिए यह पीठ अत्यंत उपयुक्त माना गया है। यहाँ की भूमि गंधर्व क्षेत्र कहलाती है, जहाँ देवी के चरणों की गंध अब भी वायु में व्याप्त मानी जाती है। तांत्रिक परंपरा के अनुसार, एड़ी स्थान पीठ पर की गई साधना से साधक को भूमि तत्व की सिद्धि प्राप्त होती है। भूमि तत्व जीवन में स्थायित्व, स्थिरता और सहनशीलता का प्रतीक है। कई साधक यहाँ ध्यान करके मानसिक संतुलन और ऊर्जा का अनुभव करते हैं।


स्थानीय लोगों में यह मान्यता है कि कभी एक ग्वाला अपने मवेशियों को लेकर इस क्षेत्र से गुजर रहा था। अचानक एक गाय एक स्थान पर बार-बार रुककर भूमि को चाटने लगी। ग्वाले ने जब उस स्थान को खोदा, तो वहाँ से देवी का चरणचिह्न निकला। तभी से यह क्षेत्र सावित्री पीठ कहलाया। एक अन्य कथा में कहा गया है कि महाभारत युद्ध के बाद, पांडवों ने इसी स्थल पर देवी से क्षमा याचना की थी, जिससे उनकी आत्मा को शांति मिली।


आज यह पीठ कुरुक्षेत्र के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है। मंदिर परिसर का जीर्णोद्धार हरियाणा सरकार और स्थानीय समितियों ने कराया है। यहाँ एक विशाल सभागार, ध्यानकक्ष, यज्ञशाला और रसोईघर भी बनाए गए हैं। साल भर देशभर से श्रद्धालु यहाँ दर्शन हेतु आते हैं। नवरात्र, सावन और कार्तिक मास के दौरान यहाँ श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है।


सावित्री शक्तिपीठ का आध्यात्मिक संदेश यह है कि शक्ति का आधार स्थिरता है। जीवन में जब तक मनुष्य के भीतर स्थाणु भैरव जैसी अडिगता और सावित्री जैसी शुद्धता नहीं होगी, तब तक वह आत्मिक शांति नहीं पा सकता। माता की एड़ी जहाँ गिरी है, वह यह सिखाती है कि शक्ति का अर्थ केवल बल नहीं, बल्कि धैर्य भी है।


जो भी श्रद्धालु कुरुक्षेत्र में तीर्थयात्रा करता है, वह ब्रह्मसरोवर, ज्योतिसर और सावित्री शक्तिपीठ तीनों का दर्शन अवश्य करता है। कहते हैं कि जो भक्त इन तीनों स्थानों की परिक्रमा कर ले, उसे त्रिगुणातीत फल प्राप्त होता है। ब्राह्मणों का मानना है कि बिना सावित्री पीठ के दर्शन के कुरुक्षेत्र यात्रा अधूरी मानी जाती है।


यह पीठ केवल एक देवी मंदिर नहीं है, बल्कि स्त्रीशक्ति के आदर्श का जीवंत प्रतीक है। सावित्री नाम स्वयं सत्य, सृजन और सविता (प्रकाश) का पर्याय है। कुरुक्षेत्र की यह भूमि उस चेतना का केंद्र है, जहाँ धर्म, शक्ति और ज्ञान एकाकार होते हैं।


कुरुक्षेत्र का सावित्री शक्तिपीठ यह स्मरण कराता है कि सृष्टि के हर कण में मातृशक्ति का अंश विद्यमान है। माता की एड़ी जहाँ गिरी, वहाँ धरती को स्थायित्व मिला और यही स्थायित्व जीवन का मूल तत्व है। सावित्री पीठ श्रद्धा की वह भूमि है, जहाँ हर भक्त अपने जीवन की अस्थिरताओं को छोड़कर माता के चरणों में स्थिरता पाता है।


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