बिहार की राजनीति - सकारात्मक ऊर्जा, नया जोश, नई उम्मीद की किरण
दिव्य रश्मि के उपसम्पादक जितेन्द्र कुमार सिन्हा की कलम से |
वक्त ऐसी महान शक्ति है जो इंसान को कभी अंबर की ऊँचाइयों पर पहुँचा देती है और कभी अधोलोक की अंधेरियों में। लेकिन यही सफर व्यक्तित्व को गढ़ता है, समाज को दिशा देता है और प्रदेशों की तकदीर लिखता है। जब परिस्थितियों का परिणाम मनोभावों के अनुकूल होता है, तब व्यक्ति ही नहीं, पूरा समाज उत्साह, आशा और सकारात्मकता से भर उठता है। योग्यता, पात्रता, क्षमता और प्रतिभा अपने चरम पर खिलने लगती हैं। जैसे हिरनी की तरह स्फूर्ति शरीर में दौड़ने लगती है और ग्रिफ़ॉन पक्षी की तरह मनोबल आसमान छूने लगता है।
बिहार आज ठीक इसी मनोस्थिति से गुजर रहा है। यूँ कहें कि एक ऐसी सकारात्मक ऊर्जा, एक ऐसा नया जोश, एक ऐसी उम्मीद की किरण बिहार के माहौल में घुलने लगी है जो वर्षों से मानो कहीं दब सी गई थी। नई सरकार के गठन के बाद बीते पाँच दिनों में जिस प्रकार से फैसले सामने आ रहे हैं, जिस तरह से कार्यशैली और प्रशासनिक सक्रियता दिखाई दे रही है, उसने सामान्य लोगों से लेकर राजनीतिक विश्लेषकों तक को चौंकाया है। ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे वर्षों से रुकी हुई नदी को किसी ने नया मार्ग दे दिया हो और वह फिर से प्रवाहमान हो उठी हो।
परन्तु हर तेज शुरुआत के साथ एक आशंका भी जन्म लेती है। क्या बिहार की यह उड़ान लंबे समय तक कायम रहेगी? या यह उत्साह कुछ ही दिनों में धीमी पड़ जाएगी?
बिहार भारत का वह प्रदेश है जिसकी ऐतिहासिक और सभ्यतागत धरोहर विश्व में अद्वितीय है। बुद्ध, महावीर, चाणक्य, आर्यभट्ट जैसी महान विभूतियों का जन्मस्थल रहे इस राज्य ने ज्ञान, संस्कृति और राजनीति के क्षेत्र में स्वर्णिम अध्याय लिखा है। परन्तु वर्तमान समय का बिहार अक्सर विकास, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं की कमी के कारण चर्चा में रहा है।
पिछले दो दशकों में बिहार ने कई राजनीतिक उतार-चढ़ाव देखा है। गठबंधन बनना और टूटना, नेताओं के बार-बार पाला बदलना, चुनावी वादों का अधूरा रह जाना, इन सबने जनता के मन में एक तरह का अविश्वास पैदा किया है। लोगों की सबसे बड़ी शिकायत यही रहती है कि सरकारें बदलती रहती हैं पर विकास की गति वही की वही ठहरी रहती है।
बिहार का एक दुर्भाग्य यह भी रहा है कि योजनाएँ कागजों में बहुत बनती हैं, घोषणाएँ खूब होती हैं लेकिन क्रियान्वयन में सुस्ती रहती है। निचले स्तर तक योजनाएँ सही तरीके से पहुँच ही नहीं पाती। इसका परिणाम यह हुआ कि चाहे शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग या रोजगार हो, हर क्षेत्र में बिहार अपने संभावित स्तर से नीचे रह गया है।
बिहार के पास किसी भी विकसित प्रदेश की तरह जल, भूमि, श्रमशक्ति, सांस्कृतिक धरोहर, कृषि शक्ति और युवा ऊर्जा सब कुछ है। परन्तु इसका संगठित और दूरदर्शी उपयोग कम ही हो पाया है। यही कारण है कि राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के बावजूद, आर्थिक रूप से बिहार हमेशा पिछड़ा दिखाई दिया है।
नयी सरकार का गठन मानो एक नई हवा लेकर आया है। मात्र पाँच दिनों में कई फैसले, कई घोषणाएँ और कई तेजी से लिए जा रहे प्रशासनिक कदम देखकर लोग आश्चर्य में हैं कि क्या सच में बिहार बदल सकता है? जो मशीनरी वर्षों से सुस्त थी, उसमें एकाएक तेजी देखी जाने लगी है। अधिकारियों की तात्कालिक बैठकें, फील्ड विजिट, योजनाओं की समीक्षा, इन सबने संदेश दिया है कि नई सरकार ढीलेपन को बिल्कुल पसंद नहीं करती है।
नई सरकार की पहली प्राथमिकताओं में जनता से सीधा संवाद रहा है। सोशल मीडिया पर सक्रियता, प्रेस कॉन्फ्रेंस और अधिकारियों को ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुँचने के निर्देश, यह सब दर्शाता हैं कि सरकार जनता का विश्वास पुनः जीतना चाहती है।
कुछ ऐसे निर्णय, जो लंबे समय से अटके हुए थे, अचानक गति पकड़ते दिख रहा है, शिक्षा प्रणाली में सुधार की घोषणा। स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने की योजना। सड़क और कनेक्टिविटी परियोजनाओं पर फोकस। उद्योग और निवेश को बढ़ाने के नए प्रस्ताव। इन सबने लोगों को ऐसा महसूस कराया है कि "कुछ तो बदल रहा है।"
बिहार का सबसे बड़ी समस्या रही है कि यहाँ बड़े उद्योग नहीं आते हैं। इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी, बिजली की समस्या, पुरानी नीतियाँ, सबने निवेशकों को दूर रखा है। अगर नई सरकार उद्योग-हितैषी नीति लाए और भ्रष्टाचार को न्यूनतम करे, तो हजारों करोड़ का निवेश यहाँ आ सकता है। युवाओं के लिए रोजगार का सबसे बड़ा स्रोत उद्योग ही है, और यह आंदोलन बिहार के भाग्य को बदल सकता है।
बिहार एक समय शिक्षा का केंद्र था। नालंदा, विक्रमशिला जैसे विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय यहाँ था। आज स्थिति यह है कि बच्चे कोचिंग के लिए बाहर जाते हैं और यहीं से पलायन होता है। यदि शिक्षा में वास्तविक सुधार हो तो, सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता, कॉलेजों में इंफ्रास्ट्रक्चर, तकनीकी शिक्षा, तो बिहार पुनः ज्ञानभूमि बन सकता है।
बिहार की मिट्टी बेहद उपजाऊ है। अगर सरकार कोल्ड स्टोरेज, आधुनिक खेती, फूड प्रोसेसिंग यूनिट्स, ग्लोबल मार्केट से कनेक्टिविटी जैसे कदम उठाए, तो हर किसान की आय दोगुनी ही नहीं, तिगुनी हो सकती है।
बिहार का स्वास्थ्य तंत्र बेहद कमजोर माना जाता है। लेकिन अगर सरकार जिला अस्पतालों से लेकर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों तक सुधार पर जोर दे, तो यहाँ की दशा बदल सकती है। बिहार के विकास में सबसे बड़ी बाधा अवैध वसूली और भ्रष्ट तंत्र रहा है। अगर नई सरकार इस पर अंकुश लगा पाती है, तो बाकी सभी योजनाएँ अपने आप सफल हो जाएँगी।
हर तेज शुरुआत के साथ एक खतरा भी जुड़ा रहता है। जिस प्रकार कोई नया धावक शुरुआती दौड़ में बहुत तेज भागता है पर थोड़ी देर बाद थक जाता है, वैसे ही सरकारों में भी यह पैटर्न देखा गया है। शुरू में सब अच्छा दिखता है, सब जोश से भरे होते हैं, परंतु समय बीतने के साथ ऊर्जा कम होने लगती है। बिहार में समस्याएँ इतनी गहरी हैं कि सिर्फ पाँच दिन का उत्साह इन्हें नहीं बदल सकता है। प्रशासनिक भ्रष्टाचार, ढांचा कमजोर, राजनीति में अस्थिरता और वित्तीय सीमाएँ, अगर दीर्घकालिक योजना नहीं बनी तो सब पहले जैसा हो जाएगा। आज लोग आशावादी हैं। लेकिन अगर आशा टूटी, तो निराशा और भी गहरी होगी। नई सरकार को यह समझना होगा कि लोगों की अपेक्षाएँ बहुत ऊँची हैं और उन्हें पूरा न करना राजनीतिक नुकसान पहुँचा सकता है।
यह प्रश्न हर किसी के मन में दिखता है। बदलाव संभव है या नहीं? उत्तर हाँ में होता है, बिल्कुल संभव है। लेकिन शर्तें है कि बिहार को ऐसा नेतृत्व चाहिए जो तेज निर्णय लेने वाला हो, व्यक्तिगत हितों से ऊपर उठकर काम करे, जनता से सीधे जुड़े और प्रशासनिक अनुशासन ला सके। नई सरकार ने शुरुआत अच्छी की है लेकिन वास्तविक चुनौती इसे बनाए रखने की है। सिर्फ शुरुआती प्रदर्शन नहीं, बल्कि आने वाले डेढ़ साल में सरकार कैसी कार्ययोजना बनाती है, यही असली विकास तय करेगा। एक मजबूत और रचनात्मक विपक्ष विकास को बेहतर बनाता है। अगर विपक्ष सिर्फ विरोध न करके constructive सुझाव दे, तो बिहार को और लाभ होगा।
बिहार की जातीय राजनीति, सामाजिक विभाजन, पलायन और परंपरागत सोच, यह सब चुनौतियाँ भी हैं और अवसर भी। बिहार में दशकों से जातीय समीकरण राजनीति को दिशा देते रहा है। अगर नई सरकार ‘सबका विकास’ मॉडल अपनाए, तो इस समझ को बदला जा सकता है। बिहार की महिलाओं ने हाल के वर्षों में सामाजिक बदलाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्यमिता, हर क्षेत्र में उनकी भागीदारी बढ़ रही है। सरकार यदि इस ऊर्जा को दिशा दे, तो बिहार को नई ऊँचाइयाँ मिल सकती हैं। देश में सबसे युवा जनसंख्या बिहार में है। यदि इन्हें सही शिक्षा, कौशल और रोजगार मिले, तो बिहार आर्थिक क्रांति ला सकता है।
बिहार का भविष्य निर्भर करेगा, चार लेन सड़कें, ग्रामीण सड़क नेटवर्क, रेल कनेक्टिविटी, एयरपोर्ट अपग्रेड, आईटी पार्क, टेक्सटाइल हब, फूड प्रोसेसिंग जोन, एग्री-टेक सेंटर, सरकारी स्कूलों का आधुनिकीकरण, शिक्षक प्रशिक्षण, स्मार्ट क्लास और विश्वविद्यालयों में शोध संस्कृति, मोबाइल हेल्थ यूनिट, जिला अस्पतालों की उन्नति, डॉक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ की नियुक्ति।
बिहार एक मोड़ पर खड़ा है, जहाँ एक ओर नई सरकार की स्फूर्ति उत्साह जगाती है, वहीं दूसरी ओर अतीत के अनुभव सावधान भी करता है। बिहार का यह सफर भी कुछ ऐसा ही रहा है। लेकिन आज जो ऊर्जा दिख रही है, वह इस बात का संकेत है कि बिहार एक नई दिशा में कदम बढ़ा चुका है। अब देखना यह है कि क्या यह तेज शुरुआत स्थायी बनेगी? या कुछ दिनों बाद यह उत्साह थम जाएगा? --------------
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