चलती राहें
अरुण दिव्यांशये चलती हुई राहें ,
सूनसान सा डगर ,
कहीं जाना अंजाना ,
चलती राहें न बहाना ।
ये चलती हुई राहें ,
अनिश्चित सा है दूरी ,
कहाॅं मंजिल अपनी ,
पहचान करना जरूरी ।
भली हो या हो बुरी ,
सबकी अपनी मजबूरी ,
किधर कैसी मेरी राहें ,
आलिंगन को फैलाए बाॅंहें ।
किस राह को इंतजार मेरी ,
कौन सी राह मुझे प्रिय है ,
कहाॅं कौन सी चलती राहें ,
कौन सी राह निष्क्रिय है ।
करें उन राहों से परिचय ,
जो मंजिल तक पहुॅंचा दे ।
वैसा मार्ग है चुनना नहीं ,
हमको जो भी धोखा दे ।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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