शक्ति की उपासना का महापर्व: नवरात्रि और शाक्त धर्म
सत्येन्द्र कुमार पाठक
शांति की तलाश में भटकते मानवीय जीवन की अशांति की रेखा पर नवरात्रि शांति का एक अद्भुत पर्व है। यह सृष्टि और प्रकृति के समन्वय का प्रतीक है, जहाँ सभी साधनों के मूल रूप शक्ति की उपासना की जाती है। भारतीय संस्कृति में, शक्ति की आराधना का यह पर्व धार्मिक परम्पराओं को अक्षुण्ण रखने वाला एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान है।
भारतीय सभ्यता के उद्भव में सौर धर्म, शाक्त धर्म , शैव धर्म, वैष्णव धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म, पारसी धर्म , यहूदी धर्म , ईसाई धर्म, यवन धर्म , इस्लाम धर्म , सिख धर्म अनेक धर्मों का प्रादुर्भाव हुआ। इनमें से एक अत्यंत प्राचीन और महत्वपूर्ण धारा है शाक्त धर्म, जिसका मूल शक्ति की आराधना में निहित है। शाक्त धर्म में, जन्म देने वाली और पालन करने वाली माता की पूजा वर्ष में चार बार की जाती है: वासंतीय नवरात्र (चैत्र मास, शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से नवमी तक)। वर्षायी नवरात्र (आषाढ़ मास)।शारदीय नवरात्र (आश्विन मास, शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से नवमी तक)।माघीय नवरात्रि पर्व न केवल भारत में बल्कि विश्व की विभिन्न संवतों और मन्वंतरों में भी शक्ति की उपासना और शाक्त धर्म के सिद्धांतों पर आधारित है।
शाक्त धर्म में, शारदीय नवरात्रि (आश्विन शुक्ल पक्ष) शक्ति की उपासना का सबसे प्रमुख समय है। इन नौ दिनों में आदिशक्ति के नौ अलग-अलग स्वरूपों की आराधना की जाती है, जिन्हें नवदुर्गा कहा जाता है प्रथम शैलपुत्री पहाड़ों की पुत्री, दृढ़ता की प्रतीक।द्वितीय ब्रह्मचारिणी ब्रह्मचारीणी, तप और साधना की मूर्ति।तृतीय चन्द्रघंटा चाँद की तरह चमकने वाली, शांति और वीरता का समन्वय।चतुर्थ कूष्माण्डा पूरा जगत जिनके चरणों में है, ब्रह्मांड को उत्पन्न करने वाली।पंचम स्कंदमाता कार्तिकेय (स्कंद स्वामी) की माता, ममता की प्रतीक।षष्टी कात्यायनी कात्यायन ऋषि के आश्रम में जन्मी, दुष्टों का संहार करने वाली।सप्तमी कालरात्रि काल का नाश करने वाली, शुभंकरी।अष्टमी महागौरी सफेद रंग वाली माँ, पवित्रता और शांति की मूर्ति।नवमी सिद्धिदात्री सर्व सिद्धि देने वाली, सभी मनोकामनाएँ पूर्ण करने वाली है।
शक्ति उपासना का इतिहास 2000 ईसा पूर्व से भी पुराना है। वैदिक काल में भी मातृ देवी की पूजा अर्चना की जाती रही थी। ऋग्वेद के दशम मंडल में तांत्रिक देवी सूक्त में शाक्त धर्म की रूपरेखा मिलती है। सिंधु घाटी सभ्यता में भी मातृपूजन की प्रधानता थी, जो शाक्तवाद के प्राचीन मूल को दर्शाती है। शाक्तवाद की चर्चा प्रमुख धार्मिक ग्रंथों जैसे देवी महात्म्य, देवी भागवत, देवी उपनिषद्, दुर्गा सप्तशती और दुर्गा चरित्र चंडी शतक में विस्तार से मिलती है।
शाक्त धर्म में तंत्रवाद और मंत्रवाद का भी प्रादुर्भाव हुआ। कौलमार्गी संप्रदाय शाक्त तंत्रवाद का एक रूप है, जिसमें विशेष अनुष्ठानों जैसे पंचमकार (मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा एवं मैथुन) को साधना के रूप में शामिल किया गया था, हालाँकि आज यह परंपरा विवादास्पद और कम प्रचलित है।
शक्ति के सबसे महत्वपूर्ण पूजा स्थलों को शक्तिपीठ कहा जाता है, जिनकी स्थापना दक्ष प्रजापति के यज्ञ कुंड में माता सती के आत्मदाह की पौराणिक कथा से जुड़ी है। अपने पति भगवान् शिव के अपमान से दुखी होकर सती ने यज्ञ अग्नि कुंड में कूदकर आहूति दे दी थी। भगवान् शिव जब सती के मृत शरीर को लेकर तांडव करने लगे, तो भगवान् विष्णु ने सृष्टि को बचाने के लिए अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के 108 टुकड़े कर दिए। ये टुकड़े जहाँ-जहाँ गिरे, वहाँ 51 सिद्ध पीठ और 108 देवी पीठों की स्थापना हुई, जिससे शिव का रौद्र रूप शांत हुआ।
प्रमुख शक्तिपीठों के कामाख्या शक्तिपीठ (असम): जहाँ माता सती की योनि गिरी थी।नयना देवी (हिमाचल प्रदेश): जहाँ माता सती के नयन गिरे थे। मंगला गौरी (गया, बिहार): जहाँ माता सती के स्तन गिरे थे। नवरात्रि केवल पूजा नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों की शक्ति का प्रादुर्भाव काल है। चैत्र मास का वासंतीय नवरात्र मानव सृष्टि का प्रारंभ काल माना जाता है, जबकि शारदीय नवरात्र शक्ति काल का है।
शारदीय नवरात्र का समापन दशमी तिथि को होता है, जिसे विजया दशमी या दशहरा के नाम से जाना जाता है। इसी दिन भगवान राम ने लंकापति रावण पर विजय प्राप्त की थी, जो अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक है।
नवरात्रि का प्रारंभ कलश स्थापना और पूजन से होता है। भक्तजन इस दौरान उपवास रखते हैं और दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं। यह पाठ देवी की स्तुति और उनके महात्म्य का वर्णन करता है। दुर्गा सप्तशती के विभिन्न अध्याय अलग-अलग कामनाओं की पूर्ति के लिए किए जाते हैं:प्रथम अध्याय: हर प्रकार की चिंता मिटाने के लिए।द्वितीय अध्याय: मुकदमा, झगड़ा आदि में विजय पाने के लिए।सप्तम अध्याय: हर कामना पूर्ण करने के लिए।एकादश अध्याय: व्यापार और सुख-संपत्ति की प्राप्ति के लिए। जो लोग पूरा पाठ नहीं कर पाते, वे सप्तश्लोकी दुर्गा या सिद्धकुंजिका स्तोत्रम् का पाठ करते हैं, जिसका माहात्म्य भी सप्तशती के बराबर माना जाता है। श्रीदुर्गा उपासना के दौरान व्रती को ब्रह्मचर्य का पालन करना, भूमि पर सोना, और मन, कर्म, वचन की शुद्धता बनाए रखना अनिवार्य है। सात्विक भोजन या फलाहार का सेवन किया जाता है। शुद्ध घी का दीपक पाठ के दौरान जलाए रखना चाहिए।
नवरात्रि का महापर्व भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग ढंग से मनाया जाता है, जो इसकी सांस्कृतिक विविधता को दर्शाता है: गुजरात: यहाँ नवरात्रि समारोह डांडिया और गरबा के रूप में प्रसिद्ध है, जो पूरी रात चलता है और भक्ति प्रदर्शन का एक अनूठा तरीका है। पश्चिम बंगाल: बंगाली कैलेंडर में दुर्गा पूजा सबसे अलंकृत और प्रमुख त्यौहार है, जिसे शरदोत्सव या अकलबोधन भी कहा जाता है।दक्षिण भारत: मैसूर में, इस उत्सव को मनाने के लिए राजसी क्वार्टर को पूरे महीने प्रकाशित किया जाता है।बांग्लादेश: यहाँ इसे भगवती पूजा के नाम से जाना जाता है। नवरात्रि उत्सव हमें मातृ शक्ति की सर्वोपरि शक्ति, अंबा (विद्युत), की अवधारणा से जोड़ता है। यह भक्ति, समर्पण और परमात्मा की परम रचनात्मक ऊर्जा (शक्ति) की पूजा का सबसे शुभ और अनूठा काल है। यह त्योहार हमें सिखाता है कि जब-जब धर्म धरा पर राक्षसी प्रवृत्ति ने जन्म लिया है, सृष्टि के कल्याण के लिए माँ दुर्गा ने दानवों का संहार किया है, और अपने भक्तों को आशीर्वाद और संबल प्रदान किया है।
शक्तिपीठ शाक्त धर्म में अत्यंत पवित्र और पूजनीय स्थल हैं, जिनकी अपनी विशेष पहचान है। प्रत्येक शक्तिपीठ में माता सती के शरीर का एक विशिष्ट अंग या आभूषण गिरा था, जिसके परिणामस्वरूप वहाँ माता का एक विशिष्ट स्वरूप स्थापित हुआ और उस स्वरूप के साथ भगवान शिव के एक भैरव स्वरूप की भी पूजा की जाती है।प्रमुख शक्तिपीठों के विशिष्ट स्वरूप में शक्तिपीठ (स्थान) सती का अंग/आभूषण देवी का विशिष्ट स्वरूप (शक्ति) भैरव का स्वरूप मुख्य विशेषताएँ कामाख्या (गुवाहाटी, असम) योनि भाग कामाख्या (सृजन शक्ति) उमानंद तंत्र साधना का सबसे बड़ा केंद्र। यहाँ देवी के मासिक धर्म के प्रतीक के रूप में अंबुबाची मेला लगता है। नैना देवी (बिलासपुर, हिमाचल) नयन (आँख) महिषमर्दिनी (दुष्टों का संहार) क्रोधीश यह शक्तिपीठ पहाड़ी पर स्थित है और क्रोधीश भैरव को देवी का रक्षक माना जाता है। ज्वालामुखी (कांगड़ा, हिमाचल) जीभ सिद्धिदा (या अंबिका) उन्मत्त यहाँ किसी मूर्ति की पूजा नहीं होती, बल्कि पृथ्वी के भीतर से निकलती नौ ज्वालाओं की पूजा की जाती है, जो देवी का स्वरूप मानी जाती हैं। विशालाक्षी (वाराणसी, उत्तर प्रदेश) दाहिने कान की मणि विशालाक्षी (विशाल आँखों वाली) काल भैरव काशी के मीरघाट पर स्थित, यह मोक्षदायिनी शक्तिपीठ है। काल भैरव यहाँ काशी के कोतवाल के रूप में प्रसिद्ध हैं। कालीघाट (कोलकाता, पश्चिम बंगाल) दाहिने पैर के अंगूठे को छोड़कर चार उँगलियाँ कालिका (या काली) नकुलेश देवी काली के उग्र रूप की पूजा का प्रमुख केंद्र। यह कोलकाता का सबसे प्रसिद्ध मंदिर है। मंगला गौरी (गया, बिहार) स्तन सर्वमंगला (या मंगला गौरी) महोदर (या महोदर भैरव) यह शक्तिपीठ पोषण और शांति की देवी का प्रतिनिधित्व करता है। पितृ पक्ष में पिंड दान के लिए भी यह स्थान महत्वपूर्ण है। कात्यायनी (वृन्दावन, उत्तर प्रदेश) केशपाश (बालों का गुच्छा) कात्यायनी भूतेश यह शक्तिपीठ मथुरा-वृन्दावन क्षेत्र में स्थित है और देवी के कात्यायनी स्वरूप को समर्पित है। हिंगलाज (बलूचिस्तान, पाकिस्तान) , ब्रह्मरंध्र (सिर का ऊपरी भाग) , कोट्टरी (या कोटरी) ,भीमलोचन यह भारत के बाहर स्थित एक प्रमुख शक्तिपीठ है और यहाँ की यात्रा अत्यंत दुर्गम मानी जाती है । शक्तिपीठों की विशिष्टता निम्नलिखित कारणों से प्रत्येक शक्तिपीठ सीधे माता सती के शरीर के एक भाग से जुड़ा है, जिससे वह स्थान दिव्य स्त्री ऊर्जा (शक्ति) का एक अत्यंत शक्तिशाली केंद्र बन जाता है। प्रत्येक शक्तिपीठ पर स्थापित देवी स्वरूप की रक्षा के लिए भगवान शिव का एक भैरव स्वरूप भी विराजमान है। यह भैरव, शक्ति की पूजा में संतुलन और पूर्णता लाता है। तंत्र साधना का केंद्र में कामाख्या जैसे कई शक्तिपीठ तंत्रवाद और तांत्रिक साधना के मुख्य केंद्र माने जाते हैं। पीठों में माता के तीन सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं की पूजा होती है: सृजन (कामाख्या), पोषण (मंगला गौरी), और संहार सनातन धर्म की शाक्त सम्प्रदाय का शक्तिपीठमें आस्था के जीवंत प्रतीक हैं, जहाँ जाने से भक्तों को अपार शांति, शक्ति और मनोकामनाओं की पूर्ति का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

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