भगवान का निवास
जय प्रकाश कुवंर
अपने वनवास के समय जब भगवान श्री राम अपनी पत्नी सीता और भाई लक्षमण सहित बाल्मीकि ऋषि के आश्रम में आते हैं और उनसे वनवास की अवधि में अपने ठहरने के लिए उपयुक्त जगह के बारे में पुछते हैं तो बाल्मीकि जी उन्हें उनके निवास के लिए इस प्रकार जगह बतलाते हैं।
अस जिय जानि कहिअ सोइ ठाऊं।
सिय सौमित्रि सहित जहं जाऊँ।।
तहं रचि रुचिर परन तृन साला।
बासु करौं कछु काल कृपाला।।
हे मुनिवर मुझे ऐसा जगह बतलाइये जहाँ मैं सीता और लक्षमण के साथ जाऊँ और वहाँ एक घासपात की कुटिया बनाकर कुछ समय के लिए निवास करूँ।
इस पर बाल्मीकि जी, जो श्री राम को पूर्ण परमात्मा के रूप में जानते थे, कहते हैं कि :-
पूछेहुं मोहि कि रहौं कहं, मैं पूंछत सकुचाऊं।
जंह न होहु तंह देहु कहि, तुम्हंहि देखावौं ठाऊं।।
हे प्रभु आप अपने रहने के बारे में मुझसे जगह के लिए पुछ रहे हैं । लेकिन मैं तो आपसे यह पुछने में भी सकुचा रहा हूँ कि हे प्रभु आप कृपा कर मुझे वह जगह बताइये जहाँ आप नहीं हैं, फिर मैं आपको निवास के लिए स्थान बताऊँ। ऋषि बाल्मीकि की इस भक्ति भाव प्रेम वार्ता को सुनकर भगवान श्री राम मन ही मन मुस्काने लगे।
श्री रामचरितमानस के इस प्रकरण को पढ़ने और समझने से यह साफ झलकता है कि भगवान अपने भक्तों को कितना मान सम्मान और उंच्चा स्थान देते हैं। ऋषि बाल्मीकि परम भगवान भक्त थे। वो श्री राम को परमब्रह्म परमेस्वर के रूप में जानते थे। भगवान् सर्वव्यापी होते हुए भी वनवास की अवधि में एक साधारण मानव जैसा व्यवहार कर रहे हैं और अपने भक्त ऋषि बाल्मीकि जी से वन में अपने रहने के लिए स्थान पुछ रहे हैं।जिसे अंत में बाल्मीकि जी ने मंदाकिनी नदी के किनारे पर चित्रकुट बतलाया है। वहाँ वनवास की अवधि में श्री राम ने बहुत समय बिताया था।
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