बुझते हुए दीएक को तनिक स्नेह चाहिए।
डा रामकृष्ण मिश्रबुझते हुए दीएक को तनिक स्नेह चाहिए।
संतोष शान्ति प्रेम का इक गेह चाहिए।।
आशा प्रयत्न जोश हों सच्चे सहज पथिक।
फिर लक्ष्य साधने में न संदेह चाहिए।।
संसार कर्मक्षेत्र का खलिहान समझिए।
हो ठीक से दमाही पुष्ट मेह चाहिएः।।
अब बन गया है आधुनिक तकनीक का शहर।
फिरभी जमीन से जुडा़ भदेस चाहिए।।
हल्ला हुआ कि गाँव में उतरा है देवदूत ।
धन -मान स्वर्ग लोक का अशेष चाहिए।। 4
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