"संस्कृति की पुकार"
रचनाकार ---डॉ. रवि शंकर मिश्र "राकेश"
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करते कमाई करोड़ों की,
पर रिश्ते सब धो डाले,
बेटे परदेसी हो गए,
बुज़ुर्ग रह जाते अकेले।
भाषा भूले, रीति भूले,
न भूले तो बस पैसा,
संस्कार थे जो थामे हमें,
अब लगते जैसे को तैसा।
दादी की कहानी सूनी नहीं,
अब टैबलेट ही सुलाता है,
संस्कृति का दीपक धीरे-धीरे
टिमटिमाता, बुझता जाता है।
बचपन यदि आया की गोद में,
तो जड़ें कहाँ से पाओगे?
मूल को काटकर क्या कभी
वृक्ष से फल-फूल पाओगे?
सुनो, अभी भी वक़्त है,
संभाल लो घर-संस्कार,
वरना रह जाएगी विरासत,
सिर्फ एक वीरान विचार।
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