“चोरों को चोर ही दिखाई देते हैं, परंतु लोकतंत्र में जनता का फैसला ही सबसे बड़ा सत्य होता है।”
✍️ डॉ. राकेश दत्त मिश्र
यह बयान केवल एक राजनीतिक हमला नहीं है, बल्कि यह उस मानसिकता को दर्शाता है जहाँ विरोध केवल नकारात्मकता तक सिमट जाता है। इस संदर्भ में सहज ही यह कहावत याद आती है— “चोरों को चोर ही दिखाई देते हैं।” अर्थात्, जो स्वयं संदेह और अविश्वास की मानसिकता में जीता है, उसे हर जगह वही दृष्टिगोचर होता है।
1. राजनीति में भाषा और मर्यादा का प्रश्न
भारतीय राजनीति में सदैव वैचारिक मतभेद रहे हैं। पंडित नेहरू और डॉ. राम मनोहर लोहिया, अटल बिहारी वाजपेयी और इंदिरा गांधी—इन सबके बीच तीखी वैचारिक लड़ाइयाँ लड़ी गईं। लेकिन भाषा की मर्यादा बनी रही।
आज के दौर में "चोर", "गद्दार", "देशद्रोही" जैसे शब्द प्रचलन में आ गए हैं। यह केवल शब्दों की गरिमा का ह्रास नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की स्वस्थ परंपरा पर भी प्रश्नचिह्न है। प्रधानमंत्री जैसे पद पर बैठे व्यक्ति को बार-बार "वोट चोर" कहना राजनीति में गिरते स्तर का संकेत है।
2. मौन की राजनीति – चुप्पी भी उत्तर है
- प्रधानमंत्री की चुप्पी को विपक्ष “स्वीकारोक्ति” मान रहा है। परंतु भारतीय संस्कृति में मौन का अपना महत्व है।
- महात्मा गांधी ने कहा था—“मौन भी वाणी का एक रूप है।”
- कबीर लिखते हैं— “बोली एक अनमोल है, जो कोई बोले जानि। हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि।”
- कभी-कभी मौन का अर्थ यह होता है कि तुच्छ आरोपों का उत्तर देने से बेहतर है उन्हें जनता के विवेक पर छोड़ दिया जाए। यदि हर राजनीतिक नेता हर कटाक्ष का जवाब दे, तो शासन चलाना असंभव हो जाएगा।
3. आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति के खतरे
लोकतंत्र में आलोचना आवश्यक है। लेकिन जब आलोचना के स्थान पर केवल आरोप और कटाक्ष रह जाएं, तो उसका प्रभाव गंभीर होता है—
- जनता का ध्यान भटकता है – रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था जैसे मूल मुद्दे हाशिए पर चले जाते हैं।
- राजनीतिक संस्थाओं की विश्वसनीयता घटती है – जनता सोचती है कि यदि नेता सिर्फ झगड़ा कर रहे हैं तो विकास कौन करेगा।
- समाज में नकारात्मकता फैलती है – आम लोग भी एक-दूसरे को गाली देने में संकोच नहीं करते।
4. मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण – प्रक्षेपण (Projection)
मनोविज्ञान में “प्रक्षेपण” (Projection) नामक सिद्धांत है। इसके अनुसार, व्यक्ति अपनी आंतरिक कमजोरी, डर या अपराधबोध को दूसरों पर थोप देता है।
- जो व्यक्ति स्वयं भ्रष्टाचार से ग्रस्त है, उसे हर जगह भ्रष्टाचार दिखता है।
- जो व्यक्ति असुरक्षित महसूस करता है, वह हर जगह साजिश देखता है।
- जो व्यक्ति हार से डरता है, वह जीतने वाले को "चोर" कहता है।
इस दृष्टिकोण से देखें तो यह कहना गलत नहीं होगा कि विपक्ष जब बार-बार "वोट चोर" की रट लगाता है, तो यह उसके आंतरिक असुरक्षा भाव का ही प्रतिबिंब है।
5. ऐतिहासिक सन्दर्भ
भारतीय राजनीति में विपक्ष ने कई बार सरकार पर धांधली और हेराफेरी के आरोप लगाए हैं।
- 1975 में इंदिरा गांधी के चुनाव को न्यायालय ने रद्द किया था।
- 1989 में बोफोर्स घोटाले ने सत्ता पलट दी।
- 2014 और 2019 में कांग्रेस ने लगातार चुनाव आयोग और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन पर सवाल उठाए।
लेकिन सवाल उठाना और सबूत देना अलग बात है। आरोप लगाना सरल है, परंतु सबूत देना कठिन। लोकतंत्र में आरोप तभी सार्थक होते हैं जब वे ठोस प्रमाणों पर आधारित हों।
6. “चोरों को चोर ही दिखाई देते हैं” – गहरी सच्चाई
यह कहावत केवल व्यंग्य नहीं, बल्कि गहरी जीवन-दृष्टि है।
नैतिक दृष्टिकोण से – जो व्यक्ति स्वयं स्वच्छ है, उसे दूसरों में अच्छाई दिखाई देती है। जो व्यक्ति दूषित है, उसे हर जगह दोष ही नजर आते हैं।
राजनीतिक दृष्टिकोण से – जो दल जनता से कट चुका है, उसे हर चुनाव में हार "चोरी" लगती है।
सामाजिक दृष्टिकोण से – जो समाज संदेह और अविश्वास में जीता है, वह विकास नहीं कर सकता।
7. जनता का विवेक – अंतिम निर्णायक
लोकतंत्र में अंतिम न्यायाधीश जनता है। जनता यह अच्छी तरह समझती है कि कौन केवल आरोप लगा रहा है और कौन वास्तविक कार्य कर रहा है।
यदि कोई दल सिर्फ “चोर-चोर” की रट लगाएगा, तो जनता उसके उद्देश्य को पहचान लेगी।
यदि कोई दल ठोस नीतियों और योजनाओं से जनता का विश्वास जीतेगा, तो वही सत्ता में आएगा।
जनता का विवेक ही लोकतंत्र का सबसे बड़ा आधार है।
8. सकारात्मक राजनीति की आवश्यकता
आज भारत एक महत्वपूर्ण दौर से गुजर रहा है। जनसंख्या, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और वैश्विक प्रतिस्पर्धा जैसे विषय असली चुनौतियाँ हैं। विपक्ष का दायित्व है कि वह सरकार की गलतियों को उजागर करे, लेकिन साथ ही ठोस विकल्प और समाधान भी प्रस्तुत करे।
यदि विपक्ष केवल “चोर-चोर” कहने तक सीमित रहेगा, तो यह उसकी अपरिपक्वता ही मानी जाएगी।
निष्कर्ष
भारतीय राजनीति का वर्तमान परिदृश्य हमें सोचने पर विवश करता है। क्या लोकतंत्र केवल कटाक्ष और अपशब्दों तक सीमित रह जाएगा? क्या जनता का विश्वास केवल आरोपों के सहारे जीता जा सकता है?
उत्तर स्पष्ट है—नहीं।
लोकतंत्र में जनता सब देख रही है। वह समझ रही है कि कौन केवल भ्रम फैला रहा है और कौन वास्तविक कार्य कर रहा है। इसीलिए कहा गया है—
“चोरों को चोर ही दिखाई देते हैं, परंतु लोकतंत्र में जनता का फैसला ही सबसे बड़ा सत्य होता है।”
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews #Divya Rashmi News, #दिव्य रश्मि न्यूज़ https://www.facebook.com/divyarashmimag
0 टिप्पणियाँ
दिव्य रश्मि की खबरों को प्राप्त करने के लिए हमारे खबरों को लाइक ओर पोर्टल को सब्सक्राइब करना ना भूले| दिव्य रश्मि समाचार यूट्यूब पर हमारे चैनल Divya Rashmi News को लाईक करें |
खबरों के लिए एवं जुड़ने के लिए सम्पर्क करें contact@divyarashmi.com