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"स्वीकृति से साधना तक”

"स्वीकृति से साधना तक”

जो मनुष्य अपने अज्ञान के गर्त में निमग्न होते हुए भी स्वयं को ज्ञानवान मान बैठते हैं, वे वास्तव में आत्मविकास की प्रथम सीढ़ी से भी कोसों दूर रहते हैं। अंधकार की स्वीकृति ही प्रकाश की ओर गमन का आरम्भ है। यदि व्यक्ति यह बोध ही न कर पाए कि वह अंधेरे में है, तो प्रकाश की खोज उसके लिए अप्रासंगिक ठहर जाती है। यह जीवन का गहन सत्य है कि आत्मचेतना की अनुपस्थिति में मनुष्य निरंतर भ्रमित मार्गों पर भटकता रहता है, किंतु जागरूकता का क्षण मात्र ही उसे दिव्यता की ओर उन्मुख कर देता है।


अतः आवश्यक है कि हम आत्मपरीक्षण के दर्पण में निरंतर अपने अंतःकरण को निहारें और अपनी सीमाओं, दुर्बलताओं तथा अज्ञान को पहचानने का साहस उत्पन्न करें। यही साहस हमें अंधकार के मोहजाल से बाहर निकालकर ज्ञान, सत्य और विवेक के ज्योतिर्मय पथ की ओर अग्रसर करता है। जो साधक अपने भीतर के अंधकार को स्वीकार कर उसे पराजित करने का प्रयत्न करता है, वही अंततः आत्मदीप जलाकर समस्त जीवन को आलोकित कर देता है।


. "सनातन"
(एक सोच , प्रेरणा और संस्कार) पंकज शर्मा (कमल सनातनी)
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