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"बंधन और मुक्ति"

"बंधन और मुक्ति"

मनुष्य का समस्त जीवन
एक दीर्घकालिक द्वंद्व है—
बंधनों की ठोस दीवारें
और
मुक्ति का अनन्त आकाश।


हम अक्सर
प्रेम के नाम पर
सुरक्षा के नाम पर
मर्यादा के नाम पर
रचते जाते हैं
अदृश्य पिंजरे,
जहाँ संबंधों के पंख
सिर्फ फड़फड़ाहट तक सीमित हो जाते हैं।


परंतु, क्या सचमुच
बंधन ही सुरक्षा हैं?
क्या पिंजरा
प्रेम का पर्याय हो सकता है?
या यह केवल
हमारी अपनी आशंकाओं का
कठोर वास्तु है,
जिसमें हम दूसरों की उड़ान को
बंधक बना देते हैं?


जब पंखों की चोटें
रक्त के अक्षरों से लिखती हैं
आज़ादी का गीत,
तब समझ में आता है—
घाव बाहर की हवाओं से भले ही मिलें,
पर आत्मा की विराटता
कभी भी आहत नहीं होती।


मुक्ति का अर्थ
घावों से बचना नहीं है,
बल्कि घावों को सहकर भी
आकाश की नीलिमा को
स्पर्श कर लेना है।


इस प्रकार
हर उड़ान
केवल पक्षी की कथा नहीं,
बल्कि मनुष्य की शाश्वत यात्रा है—
जहाँ
बंधन बार-बार जन्म लेते हैं,
और मुक्ति
उन्हें तोड़कर
फिर से अनन्त में विलीन हो जाती है।


. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
 ✍️ "कमल की कलम से"✍️
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