अपना-अपना होता है
राम नगर में प्रमोद नाम का एक नवयुवक अपनी बहन के ससुराल घर के आसपास डेरा लेकर रहता था। उसी शहर में वह प्राइवेट नौकरी कर अपना परिवार चला रहा था।
एक दिन प्रमोद की बड़ी बहन कौशल्या देवी अपने भाई से बोली कि तुम्हारे नजर में राम प्रवेश के लायक कोई सुन्दर लड़की हो तो हमें बताना।
प्रमोद ने अपने दूर के रिश्ते में एक भाई की एकलौती बेटी प्रीति से यह सोचकर शादी करवा दी कि जब मैं अपनी बहन के घर जाऊँगा तो यह मेरी सेवा-सत्कार करेगी एवं अच्छी चाय से स्वागत करेगी।
एक बार की बात है कि प्रीति के चाचा प्रवीण प्रीति के ससुराल आये। प्रीति ने अपने चाचा का खूब आदर- सत्कार किया। उसी समय प्रमोद भी अपनी बहन के घर पहुँचा। प्रीति ने प्रवीण के साथ-साथ प्रमोद को भी फुल क्रीम दूध की बनी बेहतरीन चाय पिलायी। चाय पीते हुये प्रमोद वाह,वाह कर बैठा ।
वाह,वाह सुनकर चौंकते हुये प्रवीण प्रमोद से पूछ बैठा "आखिर वाह,वाह,वाह करने के पीछे क्या बजह है भैया।
प्रमोद ने मुस्कुराते हुये कहा कि जिन्दगी में पहली बार मैं प्रीति के हाथों का बना हुआ इतना बेहतरीन व लाजवाब चाय पी रहा हूँ ।आज के पहले तक तो इसके हाथ का वाहियात व पनजोझर चाय पीते-पीते मैं बोर हो चुका था।
तभी पास में हीं खड़े प्रीति के देवर रामकरण ने कहा मामा जी 'अपना खुन अपना होता है'।
अब प्रवीण को सारा माजरा समझते देर नहीं लगती है।
----000--- अरविन्द अकेला
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