स्वाधीनता संग्राम का गुमनाम सेनानी तेलंगा खड़िया-अशोक “प्रवृद्ध”
भारतीय सभ्यता- संस्कृति, स्वाभिमान और स्वायत्तता अर्थात स्वाधीनता के लिए अनेक वीर बलिदानियों ने अपने प्राणपण अर्पित कर दिए, लेकिन विभाजित भारत के सत्ताधीशों और सत्तापालित इतिहासकारों द्वारा ऐसे स्वातंत्र्यचेता राष्ट्रभक्त वीर बलिदानियों को इतिहास में समुचित स्थान नहीं दिए जाने के कारण वे आज भी उपेक्षित, गुमनाम हैं। ऐसे ही वीर बलिदानियों में प्रथम स्वाधीनता संग्राम 1857 के पूर्व ही झारखण्ड के बड़े इलाके में स्वतंत्रता के प्रति अलख जगाने वाले तेलंगा खड़िया भारतीय स्वाधीनता संग्राम के एक ऐसे गुमनाम सपूत हैं, जिन्होंने सम्पूर्ण जिन्दगी आंग्ल शासकों एवं देशीय जयचंदों के साथ संघर्ष करते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। तेलंगा खड़िया छोटानागपुर के ऐसे वीर सपूत थे, जिन्होंने ब्रिटिश अर्थात अंग्रेजी शासन को नकार दिया था। उन्होंने ब्रिटिश शासन को ललकार कर हुंकार भरते हुए कहा था - जमीन हमारी, जंगल हमारे, मेहनत हमारी, फसलें हमारी, तो फिर हमसे लगान और मालगुजारी वसूलने वाले जमींदार और अंग्रेज कौन होते हैं ? अंग्रेजों के पास अगर गोली-बारूद हैं, तो हमारे पास भी तीर-धनुष, कुल्हाड़ी, फरसे हैं। बस फिर क्या था, स्वाधीनता सेनानियों की तेज हुंकार से आसमान तक कांप उठा। उन्होंने सभी धर्म, जाति, वर्ग से अपील की कि देश की स्वतन्त्रता के लिए अंग्रेजों को मार बाहर भगाओ। वह जमीदारों, साहूकारों को अत्याचार करने से मना करते थे। अंग्रेजों से संग्राम के लिए तेलंगा ने जोड़ी (जुड़ी) पंचैत संगठन की स्थापना की। यह एक ऐसा संगठन था, जिसमें स्वाधीनता सेनानियों अर्थात अंग्रेजी शासन के विरोधियों,विद्रोहियों को समस्त प्रकार की युद्ध विद्याओं सहित रणनीति बनाने का प्रशिक्षण दिया जाता था। रणनीतिक दस्ता युद्ध की योजनाएं बनाता और लड़ाके जंगलों, घाटियों में छिपकर सामयिक अनुकूलानुसार गुरिल्ला युद्ध करते। 1857 के पूर्व ही नया भू कर कानून के खिलाफ तेलंगा खड़िया ने आंदोलन शुरू कर दिया था, जिसके संगठित विरोध के आगे अंग्रेज जमींदार गठजोड़ के छक्के छूट गए थे, और इससे खफा होकर इस गठजोड़द्वय के द्वारा उनकी हत्या कर दी गई। परन्तु खेद की बात है कि ऐसे वीर स्वाधीनता सेनानी का इतिहास में कोई जिक्र नहीं है। हाँ, खड़िया लोकगीतों व स्थानीय कथाओं में तेलंगा आज भी अवश्य जीवित व अमर हैं। खड़िया लोकगीतों के अनुसार मुरूनगुर इलाके में सन 1840-60 के आस-पास तेलंगा खड़िया के नेतृत्व में जमींदारों, महाजनों तथा अंग्रेजी शासन के खिलाफ एक जबरदस्त आंदोलन हुआ था । यह आंदोलन मूल रूप से जमीन वापसी और जमीन पर झारखंडी समुदाय के परंपरागत हक की बहाली के लिए था। तेलंगा के अभ्युदय के बाद कर्ज से दबे और जमींदार-पुलिस की मार से उत्पीड़ित समुदाय में नयी चेतना आयी। शोषण के विरूद्ध लोग संगठित होने लगे। तेलंगा के सांगठनिक कौशल व साहसी नेतृत्व ने लोगों में अंग्रेजी राज के विरुद्ध विद्रोह की आग भर दी। देखते-ही-देखते समूचे इलाके में तेलंगा का संगठन जोड़ी पंचैत खड़ा हो गया और जोड़ी पंचैत के लड़ाकू सदस्यों ने सुनियोजित तरीके से अंग्रेजों पर हल्ला बोलना शुरू कर दिया ।
तेलंगा खड़िया का जन्म 9 फ़रवरी सन 1806 ई० को झारखंड प्रदेश के गुमला जिले के सर्वाधिक प्राचीन ग्राम सिसई प्रखंड के मुरूनगुर वर्तमान मुरगू ग्राम में एक साधारण किसान के परिवार में हुआ था। तेलंगा के पिता का नाम ठुईया खड़िया तथा माँ का नाम पेती (पेतो) खड़िया था और इनकी पत्नी का नाम रत्नी खड़िया था। ये खड़ियाओं के प्राचीन गढ़ अर्थात खड़ियागढ़ के नाम से स्मरण किये जाने वाले मुरूनगुर के प्रथम रैयत सिरु खड़िया और उनकी धर्मपत्नी बुची खड़िया के वंशज थे, हालांकि अज्ञानता वश लोग तेलंगा खड़िया के दादा का नाम सिरू खड़िया तथा दादी का नाम बुच्ची खड़िया बतलाया करते हैं । अथवा यह भी हो सकता है, जैसा कि अनेक जनजातीय व अन्य भारतीय समुदायों में पूर्वजों के नाम पर संतानों के नाम रखे जाने की परिपाटी प्रचलित है, के अनुसार खड़ियाओं के पूर्वज सिरु - बुच्ची के नाम पर तेलंगा के दादा - दादी का नाम संयोगवशात सिरु व बुच्ची खड़िया रखे गये हों और उनके मध्य विवाह सम्बन्ध कायम हो गये हों । खैर कुछ भी हो तेलंगा खड़िया मुरगू ग्राम के जमींदार तथा पाहन परिवार के थे। पैतृक परम्परानुसार तेलंगा के पिता छोटानागपुर के राजवंश नागवंशी महाराजाओं के भंडारी थे । उनके दादा सिरू खड़िया अत्यंत सामाजिक, धार्मिक, सरल तथा साहित्यिक विचार के व्यक्ति थे। वीर साहसी और अधिक बोलने वाले को खड़िया भाषा में तेऽबलंगा कहते हैं। इसीलिए बाल्यकाल में ही बाघ से लड़ जाने वाले तथा मुंह पर सत्य बात कहने वाले ठुईया खड़िया के वीर व साहसी पुत्र को तेऽबलंगा के नाम से जाना जाने लगा, बाद में यही तेऽबलंगा तेलंगा के नाम से प्रसिद्ध हुआ और क्षेत्र के आदिवासी व गैर आदिवासी सदान समाज के लोगों को संगठित कर देश को स्वाधीन करने के लिए जगह-जगह जन अभियान चलाकर अंगेजों का जीना मुहाल कर दिया । उनका शरीर हट्ठा-कट्ठा, रंग सांवला तथा उनकी ऊंचाई पांच फीट 8 इंच थी। 40 वर्ष की आयु में तेलंगा के माता-पिता ने उनका विवाह उनकी पसंद की रतनी नामक एक खड़िया युवती से कर दी । जिससे तेलंगा को एक पुत्र की प्राप्ति हुई । उसका नाम बलंगा खड़िया था । बलंगा भी बड़ा होकर अपने पिता का अनुगामी सिद्ध हुआ और पिता से कंधा से कंधा मिलाकर अंग्रेजों के दांत खट्टे करने में साथ निभाने लगा। तेलंगा की पत्नी रत्नी खड़िया ने भी हर मोर्चे पर अपने पति का साथ दिया। तेलंगा की अनुपस्थिति में रत्नी ने कई स्थानों पर अकेले ही नेतृत्व संभालते हुए अंग्रेजों से लोहा लिया। 23 अप्रैल 1880 को अंग्रेजों के दलाल बोधन सिंह के द्वारा गोली मारकर तेलंगा खड़िया की हत्या कर दिए जाने के बाद भी रत्नी खड़िया ने अपने पुत्र बलंगा व उसके सहयोगियों के माध्यम से पति के अधूरे कार्यां को पूरा किया। वह अपनी सादगी, ईमानदारी और सत्यवादिता से लोगों में जीवन का संचार करती रहीं।
तेलंगा खड़िया सहृदय समाजसेवी थे, और जाति-धर्म से ऊपर उठकर काम किया करते थे। उनका अपने पिता ठुईया खड़िया के साथ नागवंशी राजाओं की राजधानी रातुगढ़ भी आना -जाना लगा रहता था और वे क्षेत्र व देश के राजनीतिक - सामाजिक गतिविधियों से भी अवगत होते रहते थे। वे समाज के सभी समुदाय के लोगों के साथ समान व्यवहार किया करते थे। तेलंगा को अपने सनातन सरना धर्म पर अटूट विश्वास था। एक सुयोग्य सैनिक, सफल कृषक, सुरीला बांसुरीवादक होने के साथ-साथ तेलंगा अस्त्र-शस्त्र चलाना भी भली- भांति जानते थे तथा लोगों को इन विद्याओं की शिक्षा भी देते थे। तेलंगा समाज के सभी अंगों के लोगों को संगठित कर भारत को स्वतंत्र करने के लिए जगह-जगह बैठक किया करते थे। देश के अन्य क्षेत्रों की भांति ही छोटानागपुर के इस क्षेत्र पर भी उस समय अंग्रेजों ने अपना शिकंजा कश कहर बरपाना शुरू कर दिया था। तेलंगा के जन्म के पूर्व 1793 से ही लागू 1793 परमानेंट सेटेलमेंट एक्ट ने क्षेत्र में बसे आदिवासियों -गैरआदिवासियों का जीना हराम कर दिया। अंग्रेज लोगों को मानसिक शारीरिक रूप से प्रताड़ित कर टैक्स वसूल किया करते थे। इस दौरान छोटानागपुर के लोगों में एकता का सर्वथा अभाव था और वे आसानी से अंग्रेजों के फूट डालों शासन करो की नीति का शिकार हो जाया करते थे। अंग्रेजों के इस अत्याचार व शोषण को देख तेलंगा से रहा नहीं गया और उन्होंने अग्रेजों के विरुद्ध आंदोलन का शंखनाद कर दिया । तेलंगा खड़िया ने अंग्रेजों से लोहा लेने के लिए गांव-गांव जाकर लोगों को संगठित व गोलबंद किया और जंग के मैदान में दुश्मनों के गोलियों का मुकाबला तीर-धनुष से करने के लिए तैयार किया । देखते ही देखते नया भू कर अधिनियम के विरोध में तेलंगा के नेतृत्व में संगठित विद्रोह फूट पड़ा और हर गांव में जोड़ी अर्थात जुड़ी पंचैत बनने लगे। अखाड़े में युवा युद्ध का अभ्यास करने लगे। हर जोड़ी पंचैत एक दूसरे से रणनीतिक तौर पर आपस में जुड़े हुए थे और उनमें परस्पर संवाद और तालमेल बेहद सुलझा हुआ था। जमींदारों के लठैतों और अंग्रेजी सेना के आने के पहले ही उन्हें उसकी सूचना मिल जाती थी। विद्रोही सेना पहले से ही तैयार रहती और दुश्मनों के आने पर उन पर अकस्मात टूट पड़ती थी और उनकी जमकर धुनाई करती। तेलंगा ने छोटे स्तर पर ही सही, मगर अंग्रेजों के समानांतर सत्ता का विकल्प खोल दिया था। तेलंगा ने अपने संग्राम की शुरूआत अपने जन्म स्थल मुरूनगुर वर्तमान मूरगू गांव से की, जहां उन्होंने मालगुजारी वसूली करने आये सिपाहियों और दलालों पर आक्रमण कर उन्हें गांव से खदेड़ डाला। यह तेलंगा का अंग्रेजों पर पहला सीधा आक्रमण था। कोड़े और बंदूक की मार से पिटे- सहमे रहने वाले ग्रामीणों से ऐसी हिम्मत की अंग्रेजों के पिट्ठुओं ने कल्पना भी नहीं की थी, लेकिन जब बार-बार उनके कारिंदों और सिपाहियों पर हमले होने लगे और उन्हें मुंह की खानी पड़ी तो उन्हें तेलंगा के जुड़ी पंचैत की शक्ति और व्यापकता का अहसास हुआ । दरअसल उस समय अधिकतर गांव जमींदारी और अंग्रेजी शोषण से पीडि़त थे। इसलिए उनकी लड़ाई को ग्रामीणों का भारी समर्थन मिल रहा था। गुरिल्ला युद्ध में दुश्मनों को पछाड़ने के बाद विद्रोही जंगलों में भूमिगत हो जाते। इस संग्राम की व्यापकता की भनक लगने के पूर्व ही तेलंगा जमींदारों और अंग्रेजी शासन के लिए एक भय खौफ बन चुके थे। इसलिए अंग्रेज सरकार ने तेलंगा को पकड़ने का फरमान जारी कर दिया और उन्हें पकड़ने के लिए इनाम का जाल बिछाया गया। कई लोग इनाम के इस लालच में आ गए और गुप्त सूचना पर तेलंगा को बसिया प्रखंड के कुम्हारी गांव में बैठक करते हुए बंदी बना लिया गया। खड़िया लोकगीत के अनुसार तेलंगा को गिरफ्तार कर जोड़ा भर बेड़ियों में बांध कर लोहरदगा लाया गया। जहां उन पर मुकदमा चलाया गया और चौदह वर्ष की कैद की सजा सुनाई गई। तेलंगा खड़िया को गिरफ्तार कर कोलकाता के सेंट्रल जेल में रखा गया। उन्हें वर्षों तक अमानवीय यातनाएं दी गयीं। चौदह वर्ष पश्चात जेल से छूटने के बाद तेलंगा के विद्रोही तेवर और भी तल्ख हो गये और उन्होंने फिर से लोगों को संगठित करना शुरू किया। जंगल की जमीन से अंग्रेजों को हटाने के लिए युवा वर्ग को पुनः गदका, तीर और तलवार चलाने की शिक्षा दी जाने लगी । तेलंगा खड़िया के नेतृत्व में खड़िया विद्रोह 1880 में इस क्षेत्र में प्रयाप्त विस्तार को प्राप्त हुआ। यह आंदोलन अपनी धरती की रक्षा के लिए शुरू हुआ। तेलंगा व उनके सहयोगियों की दहाड़ से जमींदारों के बंगले कांप उठे। जोड़ी पंचैत फिर से जिन्दा हो उठा और युद्ध प्रशिक्षणों का दौर पुनः प्रारंभ हो गया। सिसई , बसिया से कोलेबिरा, बानो, सिमडेगा तक विद्रोह की लपटें शीघ्र ही फैल गईं। बच्चे, बूढ़े, महिलाएं, हर कोई अंग्रेजों -जमींदारों के विरूद्ध उस लड़ाई में भाग ले रहा था। तेलंगा जमींदारों और ब्रिटिश सरकार के लिए एक घायल शेर की भांति चुनौती बन चुका था। उससे बचने के लिए उनके पास एकमात्र विकल्प अर्थात रास्ता तेलंगा को येन- केन- प्रकारेण मार डालने के रूप में ही बची थी । 23 अप्रैल 1880 को तेलंगा समेत उनके कई प्रमुख शिष्यों को अंग्रेजी सेना ने सिसई के समीप एक बगीचे में, जब वे जुड़ी पंचैत के प्रतीक सफ़ेद रंग के झंडे को नमन व प्रार्थना कर रहे थे, घेर लिया। प्रार्थना समाप्त करने पर अपने को दुश्मनों से घिरता देख तेलंगा गरज उठे - हिम्मत है तो सामने आकर लड़ो। खड़िया गीतों के अनुसार तेलंगा की उस दहाड़ से समूचा इलाका थर्रा गया था। युद्ध कौशल से प्रशिक्षित जुड़ी पंचैत के सदस्यों से सीधी टक्कर लेने की हिम्मत दुश्मनों में नहीं थी। अंग्रेजों के दलाल सिसई प्रखंड के बरगाँव गाँव निवासी जमींदार बोधन सिंह ने झाडि़यों में छिपकर तेलंगा की पीठ पर गोली चला दी। गोली लगने पर वे गिर पड़े, परंतु बेहोश तेलंगा के पास आने की भी हिम्मत दुश्मनों में नहीं थी। मौके का फायदा उठाकर उनके शिष्यों ने तेलंगा को ले जंगल में गायब हो गए और उनके पार्थिव शरीर को गुमला प्रखंड के सोसो गाँव के नीमडीह नामक स्थान में दफना दिया । तेलंगा फिर कभी नजर नहीं आए। खडि़या लोकगीतों में आज भी तेलंगा जीवित हैं। तेलंगा खड़िया के स्मरण में प्रतिवर्ष 9 फरवरी को मुरगू गांव में विशाल जयंती सह जतरा का आयोजन किया जाता है। इसका आयोजन मयूरी युवा क्लब मुरगू के तत्वावधान में किया जाता है। स्वातंत्र्यचेता वीर बलिदानी तेलंगा खड़िया को स्वाधीनता के अमृत महोत्सव वर्ष में सादर नमन।
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