अतृप्त पूर्वजोंद्वारा कष्टसे मुक्ति देनेवाले भगवान दत्तात्रेय
भगवान दत्तात्रेय की जयंती इस वर्ष मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष चतुर्दशी अर्थात १८ दिसंबर काे है । इस निमित्त भगवान दत्तात्रेय के बारे में संक्षेप में शास्त्रीय जानकारी जान लेते हैं......
दत्तात्रेय देवता में ब्रह्मा , विष्णु एवं महेश, इन त्रिदेवों के तत्त्व हैं । उनके हाथ में ब्रह्मदेव के कमंडल एवं जपमाला हैं, विष्णु के शंख एवं चक्र हैं तथा शिवजी के त्रिशूल एवं डमरू हैं । इन में से प्रत्येक वस्तु का विशिष्ट भावार्थ है, उदा. कमंडल त्याग का प्रतीक है ।
दत्तात्रेय देवता के कंधेपर एक झोली भी होती है । उसका भावार्थ इस प्रकार है । झोली, मधुमक्खी का प्रतीक है । जिस प्रकार मधुमक्खी विभिन्न स्थानोंपर जाकर शहद जमा करती है, उसी प्रकार दत्तात्रेय दर-दर घूमकर झोली में भिक्षा जमा करते हैं । दर-दर जाकर भिक्षा मांगने से अहं शीघ्रता से कम होता है । इसलिए झोली, अहं नष्ट होने का प्रतीक है ।
दत्त एवं उनके परिवार का क्या अर्थ है ?
दत्तात्रेय देवता की विशेषता है कि, वे कभी भी अकेले नहीं दिखाई देते, सहपरिवार होते हैं । परिवार का आध्यात्मिक अर्थ इस प्रकार है ।
अ. दत्तात्रेय देवता के पीछे जो गाय है, वह पृथ्वी एवं कामधेनु का प्रतीक है ।
आ. चार कुत्ते, चार वेदों के प्रतीक हैं । गाय एवं कुत्ते, एक प्रकार से दत्तात्रेय देवता के अस्त्र भी हैं । गाय अपने सींग मारकर एवं कुत्ते काटकर शत्रु से रक्षण करते हैं ।
इ. औदुंबर यानी गूलर का वृक्ष दत्तात्रेय का पूजनीय रूप है; क्योंकि उसमें दत्त तत्त्व अधिक होता है ।
दत्तात्रेय देवताद्वारा किए गुणगुरूओं का स्मरण करना : जगत् की प्रत्येक विषय-वस्तु ही गुरु है; क्योंकि अनिष्ट विषय-वस्तु से कौन से दुर्गुण छोडने चाहिए तथा उचित विषय-वस्तु से कौन से सद्गुण लेने चाहिए, यह सीख सकते है । इसलिए दत्तात्रेय देवताने २४ गुरु एवं अनेक उपगुरु किए । हम भी इसका स्मरण रख विविध गुणगुरु बनाकर, अपने दुर्गुणों का भागाकार एवं सद्गुणों का गुणाकार करनेपर ईश्वरप्राप्ति शीघ्र होने में सहायता होगी ।
अतृप्त पूर्वजों के कारण होनेवाले कष्ट से रक्षा हेतु उपासना करें !
भगवान दत्तात्रेय गुरुतत्त्वका कार्य करते हैं, इसलिए जबतक सभी लोग मोक्ष प्राप्त नहीं कर लेते, तबतक दत्त देवताका कार्य चलता ही रहेगा । भगवान दत्तात्रेयने प्रमुखरूपसे कुल सोलह अवतार धारण किए । प.पू. वासुदेवानंद सरस्वतीकृत ‘श्री दत्तात्रेय षोडशावताराः ।’ में इन अवतारों की कथाएं हैं ।
मूर्तिविज्ञान
प्रत्येक देवता एक तत्त्व है । यह देवता-तत्त्व प्रत्येक युगमें होता है एवं कालानुरूप सगुण रूपमें प्रगट होता है, उदा. भगवान श्रीविष्णुद्वारा कार्यानुमेय धारण किए हुए नौ अवतार । मानव, कालानुसार देवताको विविध रूपोंमें पूजने लगता है । वर्ष १००० के आसपास दत्तकी मूर्ति त्रिमुखी हो गई; इससे पूर्व वह एकमुखी थी । दत्तकी त्रिमुखी मूर्तिमें प्रत्येक हाथमें धारण की गई वस्तु किस देवताका प्रतीक है, यह आगेकी सारणी में दिया है ।
हाथमें धारण की गई वस्तुएं
किस देवताका प्रतीक ?
१. कमंडलु एवं जपमाला
ब्रह्मदेव
२. शंख एवं चक्र
श्रीविष्णु
३. त्रिशूल एवं डमरू
शंकर
वर्तमान काल में पूर्व की भांति कोई श्राद्ध-पक्ष इत्यादि नहीं करता और न ही साधना करता है । इसलिए अधिकतर सभी को पितृदोष (पूर्वजों की अतृप्ति के कारण कष्ट) होता है । आगे पितृदोष की संभावना है या वर्तमान में हो रहा कष्ट पितृदोष के कारण है, यह केवल उन्नत पुरुष ही बता सकते हैं । किसी उन्नत पुरुष से भेंट संभव न हो, तो यहां पितृदोष के कुछ लक्षण दिए हैं – विवाह न होना, पति-पत्नी में अनबन, गर्भधारण न होना, गर्भधारण होने पर गर्भपात हो जाना, संतान का समय से पूर्व जन्म होना, मंदबुद्धि अथवा विकलांग संतान होना, संतान की बचपन में ही मृत्यु हो जाना आदि । व्यसन, दरिद्रता, शारीरिक रोग, ऐसे लक्षण भी हो सकते हैं ।
दत्त के नामजप से पितृदोष से रक्षा कैसे होती है ?
अ. सुरक्षा-कवच निर्माण होना
दत्त के नामजप से निर्मित शक्ति से नामजप करनेवाले के सर्व ओर सुरक्षा-कवच का निर्माण होता है ।
आ. पूर्वजों को गति प्राप्त होना
अधिकांश लोग साधना नहीं करते । अतएव वे माया में अत्यधिक लिप्त होते हैं । इसलिए मृत्यु के उपरांत ऐसे व्यक्तियों की लिंगदेह अतृप्त रहती है । ऐसे अतृप्त लिंगदेह मत्र्यलोक में (मृत्युलोक में) अटक जाते हैं । (मृत्युलोक भूलोक एवं भुवर्लोक के मध्य है ।) दत्त के नामजप के कारण मृत्युलोक में अटके पूर्वजों को गति मिलती है और वे अपने कर्म के अनुसार आगे के लोक में जाते हैं । इससे स्वाभाविक रूप से उनसे व्यक्ति को होनेवाले कष्ट की तीव्रता घट जाती है ।
दत्तात्रेय के नामजपद्वारा पूर्वजों के कष्टोंसे रक्षण कैसे होता है ?
अतृप्त पूर्वजों से होनेवाले कष्ट पर उपाय
१. किसी भी प्रकार का कष्ट न हो रहा हो, तो भी आगे चलकर कष्ट न हो इसलिए, साथ ही यदि थोडा सा भी कष्ट हो तो ‘श्री गुरुदेव दत्त ।’ नामजप १ से २ घंटे करें । शेष समय प्रारब्ध के कारण कष्ट न हो इस हेतु एवं आध्यात्मिक उन्नति हो इसलिए सामान्य मनुष्य अथवा प्राथमिक अवस्था का साधक कुलदेवता का अधिकाधिक नामजप करे ।
२. मध्यम कष्ट हो तो कुलदेवता के नामजप के साथ ‘श्री गुरुदेव दत्त ।’ नामजप प्रतिदिन २ से ४ घंटे करें । गुरुवार को दत्तमंदिर जाकर सात परिक्रमाएं करें एवं बैठकर एक-दो माला जप वर्षभर करें । तत्पश्चात तीन माला नामजप जारी रखें ।
३. तीव्र कष्ट हो तो कुलदेवता के नामजप के साथ ही ‘श्री गुरुदेव दत्त ।’ नामजप प्रतिदिन ४ से ६ घंटे करें । किसी ज्योतिर्लिंग में जाकर नारायणबलि, नागबलि, त्रिपिंडी श्राद्ध, कालसर्पशांति आदि विधियां करें । साथ ही किसी दत्तक्षेत्र में रहकर साधना करें अथवा संतसेवा कर उनके आशीर्वाद प्राप्त करें ।
जब कोई व्यक्ति ‘श्री गुरुदेव दत्त ।’ यह नामजप करता है, उस समय उसके किस अतृप्त पितर को इस नामजप से सर्वाधिक लाभ होता है ?
कोई व्यक्ति जब ‘श्री गुरुदेव दत्त ।’ यह नामजप करता है, उस समय जिस पितर में, अगले लोकों में जाने की तीव्र इच्छा होती है, उस पितर को इस नामजप से सर्वाधिक लाभ होता है । ‘यदि ऐसा है, तो अधिकतर पूर्वज नामजप करनेवाले उत्तराधिकारी को ही लक्ष्य क्यों बनाते हैं’, यह प्रश्न किसी के भी मन में आ सकता है । इसका कारण इस प्रकार है – ‘मेरी आध्यात्मिक प्रगति हो’, यह इच्छा करनेवाले पितर साधना करनेवाले वंशज से सहायता लेते हैं, तो जिन पितरों की इच्छा भौतिक विषयों से (खाना-पीना आदि से) संबंधित होती है, वे पितर उसी प्रकार की वासनावाले अपने वंशज से सहायता लेते हैं ।
संदर्भ : सनातन का ग्रंथ ‘भगवान दत्तात्रेय’
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