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दत्त जयंती

दत्त जयंती

‘मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्दशी इस तिथि अर्थात18 दिसंबर को भगवान दत्तात्रेय जी की जयंती है । दत्तजयंती के निमित्त हम भगवान दत्तात्रेय के विषय में शास्त्रीय ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करेंगे ।
१. दत्तात्रेय के नाम एवं उनका अर्थ
अ. दत्त : दत्त अर्थात ‘मैं आत्मा हूं’,इसकी अनुभूति देनेवाला !
आ. अवधूत : जो अहं को धो डालता है, वह अवधूत !
इ. दिगंबर : दिक् अर्थात दिशा ! दिशा ही जिनका ‘अंबर’ है, अर्थात जिनका वस्त्र है! जो स्वयं सर्वव्यापी हैं, अर्थात जो सारी दिशाओं में व्याप्त हैं, वही दिगंबर है !
२. भगवान दत्तात्रेय के जन्म का इतिहास
अ. ब्रह्मा, विष्णु एवं महेशद्वारा महापतिव्रता माता अनसूया की परीक्षा लेने का निर्णय लेना तथा आश्रम में जाकर उनके पति की अनुपस्थिती में उन्हें निर्वस्त्र होकर भोजन परोसने के लिए कहना :अत्रि ऋषि की पत्नी अनसूया महापतिव्रता थीं ।वे धर्म के अनुसार आचरण, अर्थात किसी भी कठिन प्रसंग में भगवानजी को अपेक्षित, ऐसा ही वर्तन (आचरण) करती थीं । उनका आचरण धर्म के विरुद्ध कदापि नहीं होता था ।एक समय की बात है, ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश को जब यह ज्ञात हुआ तो उन्होंने एक बार माता अनसूया की परीक्षा लेने का निर्णय लिया । वे अतिथि का रूप लेकर माता अनसूया के पास भोजन करने के लिए आ गए । उस समय उसके पति अत्रिऋषि तप करने के लिए बाहर गए थे । तब अनसूया ने उनसे कहा, ‘‘मेरे पतिदेव को आने दें, तब आपको भोजन परोसती हूं ।’’ परंतु तीनों ने कहा, ‘‘उनके आनेतक हमारा रुकना संभव नहीं है । हमें तुरंत भोजन परोसा जाए । हमने ऐसा सुना है कि आपके घर आया अतिथि कदापि भूखा नहीं लौटता है, किंतु हमारी एक बात माननी पडेगी और वह है कि, ‘शरीरपर किसी भी प्रकार का वस्त्रपरिधान किए बिना हमें भोजन परोसें ।’’
आ. माता अनसूयाद्वारा पति का स्मरण करना एवं ऐसा भाव रखना, ‘तीनों देवता मेरे ही बालक हैं’; तथा उनका बालकों में रूपांतर होना : माता अनसूया अपने पति को परमेश्वर का प्रतीक मानती थीं। उन्होंने विचार किया, ‘मैं मन से निर्मल हूं। मेरे मन में अनिष्ट विचार नहीं हैं ।’ उन्होंने कुछ क्षण अपने पति का स्मरण किया ।तदुपरांत उन्होंने, ‘ये अतिथि मेरे ही बालक हैं’,ऐसा भाव रखा । इससे उन अतिथियों का बालकों में रूपांतर हो गया ।
इ. तीनों देवताओंद्वारा प्रकट होकर वर मांगने के लिए कहना तथा अनसूयाद्वारा बालकों का पालन करने की इच्छा प्रकट करना । वर प्राप्त होनेपर ब्रह्मदेव से चंद्र,विष्णु से दत्त एवं शिव से दुर्वासा, ये तीन बालक प्राप्त होना : इसके उपरांत अत्रिऋषि, अर्थात अनसूया के पति आश्रम में आ गए । तभी उन्हें आश्रम में तीन तेजस्वी बालकों के दर्शन हुए । माताने ऋषि को पूरी घटना बताई । ऋषिने पहचान लिया कि ‘ये तीन बालक कौन हैं ?’अगले क्षण ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश प्रकट हुए एवंउन्होंने मनचाहा वर मांगने के लिए कहा ।उसपर दोनों पति-पत्नी ने कहा, ‘‘इन बालकों को हमारे पास ही रहने दें’’ उनके अनुसार वर प्रदान कर देवता अपने-अपने लोकों में लौट गए । ब्रह्मदेव से चंद्र, विष्णु से दत्त एवं शिव से दुर्वासा आदि तीन बालक माता अनसूया को प्राप्त हुए । उनमें से चंद्र एवं दुर्वासा तप करने के लिए निकल गए । केवल भगवान दत्तात्रेय विष्णु कार्य के लिए पृथ्वीपर रहे । इस प्रकार भगवान दत्तात्रेय का जन्म हुआ ।
३. भगवान दत्तात्रेय का कार्य
भगवान दत्तात्रेय स्वयं विष्णु के अवतार हैं । उनका कार्य है पालन करना, लोगों में भक्ति की लगन उत्पन्न करना तथा आदर्श तथा आनंदमयी जीवन व्यतीत कैसे करना है, यह सिखाना ।
४. भगवान दत्तात्रेय के परिवार का अर्थ
अ. गाय : भगवान दत्तात्रेय के पीछे खडी हुई गोमाता पृथ्वी एवं कामधेनू का प्रतीक होती है । कामधेनू हमें इच्छित वस्तू प्रदान करती है । पृथ्वी एवं गोमाता भी हमें सभी इच्छित प्रदान करती है।
आ. श्वान (कुत्ता) : यह ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद, इन वेदों का प्रतीक हैं ।
इ. औंदुबर का वृक्ष : भगवान दत्तात्रेय का पूजनीय स्वरूप ! इस वृक्ष में भगवान दत्तात्रेय का तत्त्व सर्वाधिक रहता है ।

५ . मूर्तिविज्ञान

भगवान दत्तात्रेय के मूर्ति में चित्रित अन्य वस्तुओं का भावार्थ आगे दिए अनुसार है ।

अ. कमंडलू एवं जपमाला : माला ब्रह्मदेव का प्रतीक है ।
आ. शंख एवं चक्र : श्रीविष्णु का प्रतीक हैं ।
इ. त्रिशूला एवं डमरू : शिव का प्रतीक है ।
ई. झोली : यह अहं का लय हुआ है, इसका प्रतीक है । झोली लेकर घर-घर घूमकर भिक्षा मांगने से अहं नष्ट होता है ।
६. प्रमुख तीर्थस्थल
अ. माहूर : तहसील किनवट, जनपद नांदेड, महाराष्ट्र.
आ. गिरनार : यह सौराष्ट्र में जूनागढ के समीप है । यहां १०सहस्र सीढियां हैं ।
इ. कारंजा : श्री नृसिंह सरस्वती का जन्मस्थान ! काशी के ब्रह्मानंद सरस्वतीजीने यहां सर्वप्रथम दत्तमंदिर की स्थापना की थी।
ई. औदुंबर : श्री नृसिंह सरस्वतीजीने चातुर्मास के काल में यहां निवास किया था । यह स्थान महाराष्ट्र के भिलवडी स्थानक से १०कि.मी. की दूरीपर कृष्णा नदी के तटपर है ।
उ. नरसोबा की वाडी : यह स्थान महाराष्ट्र में है । श्री नृसिंहसरस्वतीने यहांपर १२ वर्ष व्यतीत किए ।यहां कृष्णा एवं पंचगंगा नदियों का मिलन है ।
ऊ. गाणगापुर : यह स्थान पुणे-रायचूर मार्गपर कर्नाटक में है । यहां भिमा एवं अमरजा नदियों का मिलन है । यहांपर नृसिंहसरस्वतीने अपने २३ वर्ष व्यतीत किए थे ।
७. भगवान दत्तात्रेय की आराधना कैसे करें ?
अ. गंध : भगवान दत्तात्रेय को अनामिकाद्वारा (छोटी उंगली के समीपवाली उंगली से) तिलक लगाएं ।
आ. फूल : जाई एवं निशीगंधा के फूल सात अथवा सात की गुणा में अर्पित करें ।
इ. उदबत्ती : चंदन, केवडा, चमेली, जाई अथवा अंबर इन गंधों की उदबत्तियां लगाएं ।
ई. इत्र : भगवान दत्तात्रेय को ‘खस’ इस गंध का इत्र अर्पण करें।
उ. प्रदक्षिणा : भगवान दत्तात्रेय की प्रदक्षिणा करें ।
संदर्भ : सनातन का ग्रंथ ‘भगवान दत्तात्रेय’
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